अशोक जमनानी की दीपावली विषयक कविताएँ -अंक-2 - अपनी माटी

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सोमवार, अक्तूबर 25, 2010

अशोक जमनानी की दीपावली विषयक कविताएँ -अंक-2


(1)
रौशन खुशियों का आलम हो
घर मेरे घर तेरे भी
आंगन के दीपक से हारे
नभ के गहरे अंधेरे भी
इक आंगन के उजाले में
कहां बात निराली होती है
जब हर आंगन में दीप जले
तब रात दीवाली होती है
(2)
तिमिर पथ पर हूँ प्रतीक्षित 
तुम मुझे आलोक दे दो 
दीपक तुम्हारी सम्पदा वह 
रौशनी का लोक दे दो 

रौशनी के बीज बोकर 
पाऊं उजाले लहलहाते
ना द्वार कोई रिक्त हो
सब द्वार देखूं जगमगाते 
मैं शब्द में अग्नि भरूंगा 
तुम मुझे सामर्थ्य दे दो 
उज्ज्वल तुम्हारी चेतना का 
बस वो जागृत अर्थ दे दो 

तिमिर पथ पर मैं भ्रमित 
तुम मुझे आलोक दे दो 
दीपक तुम्हारी सम्पदा वह 
रौशनी का लोक दे दो 

- अशोक जमनानी

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