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माणिक की कविता :-किले की इमारतें

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on रविवार, अक्तूबर 10, 2010 | रविवार, अक्तूबर 10, 2010











चला जाता हूँ कभी वक्त निकालकर
भूले भटके याद करता हूँ
आम आदमी की तरह देर सवेर
पुरानी काम की चीजें,
किले,संस्कृति या हो सरोकार
आज फिर किले में हूँ अपने शहर के
झूठ बोल कर घर से
निकाला है वक्त थोड़ा सा
इन खंडहरों के हित
बाकी आना मुश्किल है
फ़िज़ूल भी तो लगता है
यूं समाज को  ये आना जाना बेमतलब का

नफे के सौदे सी नहीं लगती ये
इमारतों को निहारने की आदत
रोते फिरना बेकार लगता है सभी को आज
एकदम शांत माहौल और कबूतर की गुटरगूं
आवाजें सुनी मैंने तरह-तरह की चिखें सारी
युद्धों और ज़ोहरों की स्मृतियों से कुलांचे मारती
लपटों की तड़पड़  और आवाजों के चिंतन में डूबे
विचार अचानक ठहरे
कान जा लगे झट  से
तालाब में नहाते डुबकी मारते बच्चों की चिल्ल-पौं में 
माली दिखा बगीचे मेंएक आँख को
पसीने से चमकते शरीर से खोदता-रोपता
मंदिर अब आज़ाद थे
न पुजारी था न भक्त कोई
बीट लगी दीवारों पर  बैठे चमगादड़ ,उल्लू बैखोफ
टूटी फूटी मुंडेरें है और उबड़-खाबड़ पत्थर
हाँ यहीं करीने से बने बुर्जों से
झांकता है इतिहास नकली
लिखा हुआ है औरों ने  जो
झूठन सा लगता है कभी
फुरसत मिले तो
जांचे-परखें उसे
कुछ गुम्बद कुछ दरवाजें
कुछ झरोखें आलिशान हैं यहाँ
मगर सबकुछ ठहरा अब विरान
यहीं ताका-झांकी करता होगा
जूने कारीगरों का हूनर आज भी
लेता हूँ मैं भी यहाँ आकर ठंडी सांस
महसूसता हूँ आराम
जब कभी काटता है
शहर का कोलाहल
और फफूंद से लगते हैं रिश्ते
तो चला आता हूँ यहीं कुछ देर
दुःख बांटता है ये महलों-बावडियों का सफ़र
हकीकत यहाँ भी कुछ और है
लिखा है बहुत कुछ आड़ा-तिरछा
सामने की दीवार पर
काला,सफ़ेद,लाल जो भी मिला लिख डाला
कुछ घरउजाडूं छोरे थूंक गए पान यहाँ
शान से खोल गए ढक्कन
यहीं बोतलों के कांच बिखेर गए 
कोई आकर करता है कूकर्म यहाँ
सबकुछ सहती ये दीवारें आजकल
इनका भी अपना रोना ढोना है
ये भी दुखी है शायद मेरी तरह
दालान,आँगन,परकोटे 
इतने अकेले नहीं थे कभी

आज थोड़े चुप हैं लगता है
अब बतियाएंगें मुझसे अपना दुःख
हमदर्द सी लगी ये इमारतें आज फिर
ये भी सोचती है,जागती है
बनती है,बिगड़ती है
चला आता हूँ यहाँ इतवार के इतवार
हालचाल जान लेता हूँ
दे आता हूँ खबर उन्हें भी
मेरे शहर के नाटकबाजों  की
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