पालीवाल देवदत्त की रचना - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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पालीवाल देवदत्त की रचना

तुम  ऐसे   पहरेदार बदल  दो  


 मैं अवधपूरी का रामलला हूँ
  सरयू तट से बोल रहा हूँ
 अब मेरा दिल भर आया है
 उर की  काठी खोल रहा हूँ (1)
 मैंने राम राज्य सौंपा था
 पर तुमने चौपट कर डाला
 मैंने न्याय व्यवस्था सौपीं
 तुमने नरक बना डाला (2)
 मैं राजपाठ से दूर रहा था
 तुमने सबकुछ मन लिया
 मैंने सबको सम्मान दिया  था
तुमने  सबको अन्याय दिया (3)
 मैंने अबतक जो देखा है
 उसका खाका खोल रहा हूँ
 अब मेरा दिल भर आया है
 उर के काठी खोल रहा हूँ (4)
 मेरे रहते छवि बनी थी
 तुमने धूमिल कर डाली
 इस कुर्सी के खातिर तुमने
 जनता भी बटवा डाली (5)


 जब भी होता है चुनाव
 मुद्दा वही पुनः होता है
 मंदिर हम वहीँ बनायंगे
 सुनकर दिल मेरा रोता है (6)
 अब उठ मेरा विश्वास रहा है
 दिल के वाणी बोल रहा हूँ
 अब मेरा दिल भर आया है
 उर के काठी खोल रहा हूँ (7)


 आशएं सब ख़त्म हो गई
 धूमिल सब उम्मीद हुई है
 देख देख परिद्रश्य तुम्हारे
 द्रष्टि नेत्रों की क्षीण हो गई (8)
 आसूं आखों मैं चालक पड़े थे
 जब नाली मैं कंकाल मिले थे
 तुम सत्ता की चकाचोंध मैं
 सब होकर के मदहोश पड़े थे (9)


 जब जब तुमने विषय उठाया
 मेरा कद तबतब  घटवाया
 जग हम बदनाम हुए हैं
 कितनों का सिंदूर मिट्वाया (10)
 अब तक जो भी देखा हैं
 पढ़ उसका भूगोल रहा हूँ
 अब मेरा दिल भर आया है
 उर की काठी खोल रहा हूँ (11)


 अब जीवन दुष्कर लगता हैं
 मुझको अब आजाद कराओ
 जनता को जो वचन दिया था
 उसको अब करके दिखलाओ (12)
 मैंने क्या अपराध किया है
 जो तुमने मुझको कैद किया है
 मैंने सुख सम्मान दिया था
 पर तुमने भ्रष्ठाचार दिया है (13)


 यह मेरा ही चमत्कार हैं
 जो ऐसा निर्णय करवाया है
 कर इसका उपयोग पूर्ण लो
 जो ऐसा अवसर आया है (14)
 तुमने जो भी कर्म किये हैं
 उनका दर्पण दिखा रहा हूँ
 अब मेरा दिल भर आया है
 उर के काठी खोल रहा हूँ (15)


 आधा जीवन बीत चुका है
 अब शेष स्वतः ही जायगा
 अबतक जो न बनपाया है
 वह क्या अब बन पायेगा (16)
 देश वासियों आँखों खोलो
 अब निर्णय अपना   कर दो
 रक्षा मैं जो न समर्थ हों
 तुम ऐसे पहरेदार बदल दो (१७)
राजनीति के दलदल में फंस
मैं पा निज को मजबूर रहा हूँ
मेरा दिल अब भर आया है
उर की   काठी खोल रहा हूँ (18 )

पहले जो कर दिखलाया था
करके अब फिर दिखलादो
जनता को हनुमान बनाकर
मेरा सुन्दर भवन बनबादो (19 )

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