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''लघु पत्रिका आन्दोलन''- ''कुछ सार्थक पत्रिकाएँ''-

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on रविवार, अक्तूबर 10, 2010 | रविवार, अक्तूबर 10, 2010

 "पाण्डुलिपि"

पत्रिका : पाण्डुलिपि, अंक : जुलाईसितम्बर 2010(प्रवेशांक), स्वरूप : त्रैमासिक, प्रमुख संपादक : अशोक सिंघई, कार्यकारी संपादकः जयप्रकाश मानस, पृष्ठ : 380, मूल्य : 25रू.(.वार्षिक 100रू.), ई मेल : pandulipatrika@gmail.com , वेबसाईट/ब्लॉग : http://www.pramodvarma.com/ , फोन/मो. 094241.82664, सम्पर्क : सिंघई विला, 7 बी, सड़क 20, सेक्टर 5, भिलाई नगर, 490006(छतीसग़)
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर ( CG) का प्रकाशन
पाण्डुलिपि पत्रिका के प्रवेशांक को देखकर यह कहा जा सकता है कि शीघ्र ही यह पत्रिका देश की प्रथम पंक्ति की साहित्यिक पत्रिका होगी। यद्यपि प्रवेशांक में वे सभी कमियां है जो किसी भी पत्रिका के प्रवेशांक में होती हैं। लेकिन इससे पत्रिका के स्तर में कोई कमी नहीं आई है। रचनात्मक रूप से पत्रिका समृद्ध है व उसकी सामग्री उपयोगी तो है ही पठनीय व संग्रह योग्य भी है। अंक में धरोहर के अंतर्गत ख्यात आलोचक लेखक प्रमोद वर्मा का आलेख हम कूं मिल्या जियावनहारा में ख्यात व्यंग्यकार परसाई जी पर संस्मरण में वर्मा जी ने उस दौर की वस्तुस्थितियों पर प्रकाश डाला है। विरासत के अंतर्गत पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी, हजारी प्रसाद द्विवेदी के आलेख पुनः पॄकर साहित्य का नवीन पाठक हिंदी के प्रति अपनी सही राय बनाने में सफल रहा है। रवीन्द्र नाथ टैगोर, अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, प्रमोद वर्मा एवं हरि ठाकुर की कविताएं साहित्य के अतीत में ले जाती हैं। सुदर्शन की कहानी हार की जीत, फैज अहमद फैज की ग़ज़लें, हरिशंकर परसाई तथा लतीफ घोघी का व्यंग्य पत्रिका के भविष्य की योजनाओं पर संकेत करता है। नोम चामस्की का आलेख गैर टिकाऊ अविकास तथा खगेन्द्र ठाकुर का लेख पहला गिरमिटिया : जीवन की कला संग्रह योग्य हैं। पाब्लो नेरूदा, हेराल्ड प्रिंटर, स्तेफान स्पेण्डर, ओल्गा खर्लामिनोवा तथा रानी जयचंद्र की कविताओं का अनुवाद भी कुछ कमियों के साथ स्वीकार किया जा सकता है। अशोक वर्मा, रंजना जायसवाल, राजकुमार कुम्भज, लाला जगदपुरी, कुमार नयन, अनामिका, श्याम अविनाश, मोहन राणा, नवल किशोर शर्मा, भास्कर चौधुरी, प्रेमशंकर रघुवंशी, विनोद शर्मा, केशव तिवारी, निर्मल आनंद, विश्वजीत सेन, सुनील श्रीवास्तव, महेश चंद्र पुनेठा, युगल गजेन्द्र, त्रिलोक महावर, केशव शरण, अशोक सिंह, जयश्री राय, खनीजा खानम, रमेश सिन्हा, सरजू प्रकाश राठौर, सौमित्र महापात्र, वीरेन्द्र सारंग, वसंत त्रिपाठी, जनार्दन मिश्र, सुनीता जैन, रमेश प्रजापति एवं संजय अलंग की कविताएं पत्रिका का स्वरूप विस्तृत बनाती हैं तथा इस बात के लिये आस्वस्त करती हैं कि पाण्डुलिपि भविष्य में काव्य विधा पर विशेष सामग्री प्रकाशित करेगी। डॉ. ओम प्रभाकर, ज्ञानप्रकाश विवेक, इब्राहम खान गौरी अश्क, डॉ. श्याम सखा श्याम की ग़ज़लें अच्छी व पठनीय हैं। ख्यात कवि अशोक वाजपेयी, गीतकाल निदा फाजली, प्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले, ह्षिकेश सुलभ से साक्षात्कार स्तरीय हैं। प्रकाश कांत, राजेश झरपुरे, नरेन्द्र पुण्डरीक, संतोष श्रीवास्तव, संदीप कुमार, विनोद साब, विक्रम शाह ठाकुर, राधा कृष्ण सहाय, वासुदेव, सीतेश कुमार द्विवेदी, भगवती प्रसाद द्विवेदी, शैलेन्द्र तिवारी एवं आशा पाण्डेय की कहानियां अच्छी व गहन अध्ययन की मांग करती है। चीड़ों पर बिखरी हुई निर्मल चांदनी(अखिलेश शुक्ल) तथा कारमेल बीच यू.एस. ए.(रमणिका गुप्ता) डायरियां भी इस विधा में अपनी बातें बहुत अच्छी तरह से कह सकीं हैं। श्रीलाल शुक्ल, शंकर पुणतांबेकर, प्रेम जनमेजय के व्यंग्य तथा विनोद शंकर शुक्ल का व्यंग्य आलेख पॄने में रूचिकर हैं। डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी का व्यंग्य आलोचना लेख व्यंग्य कविताओं के जीवन मूल्यों की फिर से व्याख्या सफलतापूर्वक कर सका है। डॉ. अनिल कुमार, कृष्ण कुमार यादव व दिनेश माली के विविध विषयों पर लेख प्रभावित करते हैं। अश्विनी कुमार पंकज की कहानी गाड़ी लोहारदगा मेल में उन्होंने इस विधा के साथ कुछ नवीन प्रयोग किए हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं तथा समीक्षाएं भी अपेक्षित स्तर की हैं। पत्रिका का यह प्रवेशांक है इसलिए इसमें जो भी कमियां हैं उम्मीद की जाना चाहिए कि अगले अंकों में वे दूर हो जाएंगी। केवल यह कहकर की पाण्डुलिपि में ेर सारी कमियां हैं इसके महत्व व साहित्य मे सार्थकता को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। पाठकों को पत्रिका के आगामी अच्छे अंकों की प्रतीक्षा अवश्य रहेगी।

‘नागफनी’ का प्रवेशांक

पत्रिका: नागफनी, अंक: अगस्त-अक्टूबर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: सपना सोनकर, पृष्ठ: 60, मूल्य: 15 रू.(.वार्षिक 60रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0135.6457809, सम्पर्क: दून ब्ल्यु कार्टेज, मसूरी 248.179 उत्तराखण्ड
साहित्यिक पत्रिका नागफनी का यह प्रवेशांक है। किसी पत्रिका के प्रवेशांक में अमूमन जो कमियां होती हैं वही सब इसमें भी है। लेकिन यह उत्तराखण्ड से प्रकाशित हो रही है व संपादक तथा अन्य सहयोगियों का प्रवेशांक के रूप मेें पहला कदम है इसलिए इसकी कमियों पर विचार न कर खूबियों को ध्यान में लाना आवश्यक हो जात है। अंक में रूपनारायण सोनकर, सुधीर सागर, मूलचंद सोनकर, मुकेश मानस, बी.एल. सोनकर, आर.एल. वणकर एवं अनिता भारती के आलेखों को स्थान दिया गया है। ख्यात कथाकार प्रेमचंद के नाम के आगे मंुशी का इस्तेमाल अब नहीं किया जाता है, पत्रिका ने पता नहीं क्यों पुरातन परंपरा का उपयोग किया है। रूपनारायण सोनकर की कहानी में ऐसा क्या है? जिसकी वजह से वह प्रेमचंद की ख्यात कहानी कफन के आगे की कहानी है। ओमप्रकाश वाल्मिकी की आत्मकथा जूठन एक ऐसी रचना है जिसमें समाज के दलित व शोषित वर्ग की पीढ़ी व्यक्त की गई है। जूठन जैसी रचनाएं हिंदी साहित्य में गिनी चुनी ही हैं। मूलचंद सोनकर, रजनी अनुरागी, रूपनारायण सोनकर व ओम प्रकाश वाल्मिकी की कविताएं प्रभावित करती हंैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं अभी प्रारंभिक अवस्था में है। फिर भी साहित्य जगत में एक और पत्रिका का आगमन हुआ है यह आश की जाना चाहिए कि भविष्य में नागफनी में अच्छी रचनाएं पढ़ने में आएंगी। पत्रिका की अनुक्रमणिका व विवरण के फोंट साइज में वृद्धि की जाना चाहिए। कलेवर तथा साज सज्जा के लिहाज से अभी काफी कुछ किया जाना शेष है।

  ‘‘व्यंग्य यात्रा’’

पत्रिका: व्यंग्य यात्रा, अंक: अपै्रल-सितम्बर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: प्रेम जनमेजय, पृष्ठ: 120, मूल्य: 20 रू.(.वार्षिक 100रू.पांच अंक), ई मेल: vyangya@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25264227, सम्पर्क: 73, साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110.063
व्यंग्य साहित्य की प्रधान पत्रिका व्यंग्य यात्रा का यह अंक पंजाबी व्यंग्य साहित्य एवं ख्यात व्यंग्यकार शंकर पुणतांबेकर पर एकाग्र है। अंक में पंजाबी व्यंग्य पर संग्रह योग्य सामग्री का प्रकाशन किया गया है। इसके अंतर्गत के.एल. गर्ग, मंगल कुलजित, कन्हैया लाल कपूर, प्यारा सिंह दाता, गुरदेव चैहान, बलदेव सिंह व भगवान दास कहार के आलेख पंजाबी में लिखे गए व्यंग्य साहित्य व उसकी उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। शंकर पुणतांबेकर जी पर पत्रिका के संपादक प्रेम जनमेजय, सुधीर ओखवे, हरीश नवल, ओमप्रकाश शर्मा के लेख व पुणतांबेकर जी की व्यंग्य रचनाएं आज भी उतनी ही उपयोगी व समसामयिक हैं जितनी पूर्व में थीं। ख्यात व्यंग्यकार स्व. श्री जब्बार ढाकवाला को याद करते हुए ज्ञान चतुर्वेदी, लालित्य ललित व विनोद साब के लेख अच्छे हैं। अन्य व्यंग्यों में हरिपाल त्यागी, अनिल जोशी, मनोज श्रीवास्तव, ओम प्रकाश सारस्वत, गजेन्द्र तिवारी , अरविंद मिश्र, पिलकेन्द्र अरोड़ा व सुभाष राय में काफी अधिक गहराई व समाज के लिए कुछ न कुछ सकारात्मक संदेश है। शेष अन्य रचनाएं लगता है पत्रिका के पृष्ठ भरने के लिए प्रकाशित कर दी गई है। व्यंग्य विधा पर श्री शंकर पुणतांबेकर से तेजपाल चैधरी की बातचीत पत्रिका की सर्वश्रेष्ठ रचना कही जा सकती है जिसके माध्यम से पाठक को इस विधा पर उपयोगी जानकारी मिलती है। पत्रिक की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी अच्छी हैं। पत्रिका लगातार संयुक्त अंक के रूप में प्रकाशित हो रही है। इस महत्वपूर्ण पत्रिका को नियमित रूप से संपादक को प्रकाशित करना चाहिए भले ही इसके पृष्ठ कम ही हों।

‘‘वाङ्मय’’ 

पत्रिका: वाङ्मय, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. एम. फ़ीरोज़ अहमद, पृष्ठ: 72 , मूल्य:40रू.(.वार्षिक 150रू.), ई मेल: vagmaya2007@yahoo.co.in , वेबसाईट ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0941227331, सम्पर्क: बी-4, लिबर्टी होम्स, अब्दुल्लाह काॅलेज रोड़, अलीगढ़ 202002 उ.प्र.
शोध छात्रों एवं साहित्य के गंभीर पाठकों के लिए उपयोगी इस पत्रिका मंे गंभीर व ज्ञानवर्धक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं - देह और देश के दोराहे पर अज़ीजुन(डाॅ. परमेश्वरी शर्मा, राजिन्दर कौर), नगाड़े की तरह बजते शब्द(शांति नायर), रामचरित मानस की काव्य भाषा में रस का स्वरूप(वंदना शर्मा), साहित्य सम्राटःमंुशी प्रेमचंद्र(डाॅ. मजीद शेख), मीराकंात एक संवेदनशील रचनाकार(अंबुजा एन. मलखेडकर), काला चांदःएक विवेचन(मो. आसिफ खान, भानू चैहान) के आलेखों में हिंदी साहित्य की विचारधाराओं व चिंतन को संक्षिप्त किंतु सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया गया है। समसकालीन परिपे्रक्ष्य में हिंदी की दशा एवं दिशा(डाॅ. रिपुदमन सिंह यादव), डाॅ. राही मासूम रज़ा के कथा साहित्य में विवाह के प्रति बदलते दृष्टिकोण(सलीम आय मुजावर) एवं मन्नू भण्डारी की कहानियों में आधुनिक मूल्यबोध(डाॅ. एन.टी. गामीत) विवरण तथा विश्लेषण का अच्छा समन्वय दिखाई देता है। हालांकि यह आलेख विशुद्ध रूप से शोध आलेख नहीं हैं किंतु शोध छात्रों के लिए संदर्भ का कार्य अवश्य ही करेंगे। संजीव ठाकुर, अलकबीर, मधू अग्रवाल एवं विजय रंजन की कविताएं विशेष रूप से प्रभावित करती है। अशफाक कादरी एवं नदीम अहमद नदीम की लघुकथाएं सामान्य सी लगीं। जय श्री राय की कहानी ‘उसके हिस्से का सुख’ एक अच्छी व याद रखने योग्य कहानी है। आजकल जयश्री राय लगातार अच्छी कहानियां लिख रहीं हैं। मूलचंद सोनकर के लेख में तल्खी अधिक व समन्वय कम दिखाई देता है।

‘‘अरावली उदघोष’

पत्रिका: अरवली उदघोष, अंक: जून 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: बी.पी. शर्मा ‘पथिक’, अतिथि संपादक: हरिराम मीणा, पृष्ठ: 88, मूल्य: 20 रू.(.वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 0294.2431742, सम्पर्क: 448, टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर 313001 राजस्थान
विगत 22 वर्ष से लगातार देश भर के आदिवासियों के लिए संघर्षरत पत्रिका अरावली उद्घोष का यह अंक आदिवासी संस्मरण अंक है। देश के विभिन्न अंचलों में फैले आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में लाकर उनका कल्याण करना पत्रिका का ध्येय है। इसलिए पत्रिका समय समय पर आदिवासियों की पीड़ा व्यक्त कर उन पर विचार करने के लिए विशेषांक निकालती है। इसी श्रंखला में इस अंक मे आदिवासियों से संबंधित संस्मरणों, डायरियों तथा विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन किया गया हैै। सभी संस्मरण सहेज कर रखने योग्य हंै व प्रभावित करते हैं। मिजोरम में वे कुछ दिन(श्री प्रकाश मिश्र), दहकते बुलबुले(सुरेन्द्र नायक), मेरे लड़कपन के अविस्मरणीय नायक(भागीरथ), सावधान नीचे आग है(केदार प्रसाद मीणा), आदिवासियों की गोत्र भूमि....(मिनीप्रिया आर.) जैसे संस्मरणों में आदिवासियों से संबंधित विभिन्न रीति रिवाजों, परंपराओं तथा उनके संयमित-संतुलित जीवन पर विचारात्मक विश्लेषण किया गया है। अन्य संस्मरणों जैसे - लो आज गुल्लक तोड़ता हूं(राकेश कुमार सिंह), अंडमान की यात्रा 1 व 2 (नवजोत भनोत, बजरंग बिहारी तिवारी), मेरा सिंह भूमि का भ्रमण(विभूति भूषण महोपाध्याय), कितनी दूर है अभी रोशनी(स्वधीन) तथा अपातानियों के बीच एक शाम(राघवेन्द्र) में आदिवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली समस्याओं को उठाकर उनके समाधान सुझाने का प्रयास किया गया है। ऐस थे स्व. भैरोलाल कालाबादल(ख्यालीराम मीणा), जमीनी जंग के सहरिया(डाॅ. रमेश चंद्र मीणा) एवं प्रभाष जोशी एवं जनसत्ता का तीसरा पाठक(महादेव टाप्पो) में लेखक आदिवासियों को लेकर अति संवेदनशील हो जाता है व वह चाहता है कि किसी तरह से उनके कल्याण की तरफ सरकारें गंभीरता से ध्यान दें। उनसे मिला अपनापन(अखिलेश शुक्ल), काजू बादाम खाने वाली गांधी जी की बकरी(लक्ष्मणगायकवाड़), बस्तर में कुछ दिन(चंद्रकांत देवताले) के संस्मरण कथा से लगते हैं व आदिवासियों की निजी जिंदगी में झांककर उनके संस्कारों से आम पाठक को परिचित कराते हैं। श्रीमती रचना गौड़ एवं स्वामी वाहिद काजमी की कहानियां संस्मरणात्मक कहानियां हैं जिनमे आदिवासी जीवन व उनक संघर्ष के दर्शन होते हैं। अतिथि संपादक हरिराम मीणा जी का गहन विश्लेषण युक्त संपादकीय समीक्षित अंक का सार प्रस्तुत करता है। एक अच्छी पत्रिका का उत्कृष्ट अंक देने के लिए पत्रिका की टीम बधाई की पात्र है।

‘काफ़िया’ 

पत्रिका: काफिया, अंक: 05 वर्ष.2010, स्वरूप: मासिक, प्रबंध संपादक: फ़कीर चंद जालंधरी, प्रधान संपादक: मधुसूदन, पृष्ठ: 40, मूल्य: उपलब्ध नहीं(.वार्षिक उपलब्ध नहीं ), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 09815888058, सम्पर्क: काफ़िया भवन 5, रमेश कालोनी, जालंधर पंजाब,
ग़ज़ल विधा पर एकाग्र पत्रिका के इस अंक में प्रगतिशील विचारधारा से युक्त कुछ अच्छी ग़ज़लों का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका के इस अंक में तुली फकीर चंद जलंधरी, राजेन्द्र तिवारी, अखिलेश तिवारी, इक़बाल हुसैन इकबाल, ख्याल खन्ना एवं विपिन विहारी की ग़ज़लें प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पठनीय है।

‘पूर्वग्रह’

पत्रिका: पूर्वग्रह, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ: 132, मूल्य:30रू.(.वार्षिक 100रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bharatbhavan.org/ , फोन/मो. 0755.2660239, सम्पर्क: भारत भवन न्यास, जे. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स भोपाल म.प्र.

पत्रिका पूर्वग्रह ने संपादक श्री प्रभाकर श्रोत्रिय के मार्गदर्शन में नया आकार ग्रहण किया है। जिससे इसकी रचनात्मकता के साथ साथ पाठकों के द्वारा स्वीकार्यरता में वृद्धि हुई है। अंक में स्मरण के अंतर्गत ख्यात साहित्यकार संपादक विजय बहादुर सिंह का आलेख शमशेर की शमशेरियत तथा प्रयाग शुक्ल जी का लेख मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता(ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल के समग्र पर एकाग्र) पत्रिका की अत्यंत महत्वपूर्ण व संग्रह योग्य रचनाएं हैं। अन्य आलेखों में कबीर काव्य की उत्तर मीमांसा(श्रीकांत उपाध्याय), भाषिक संप्रेषण और कविता की संप्रेषणीयता(कृपाशंकर सिंह) एवं छद्म प्रगतिशीलता और तीसरी भक्ति का्रंति(विनोद शाही) में विषयों पर गहन गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। कृति विमर्श के अंतर्गत प्रकाशित आलेख संबंधित कृतियांे का विश्लेषण करने के साथ साथ उनकी पाठकों के लिए उपयोगिता भी स्पष्ट करते हैं जिसकी आज अत्यधिक आवश्यकता है। इसके अंतर्गत अपने अपने अजनबी(रमेश दवे), कबीर अध्ययन की एक नई दिशा(प्रभात त्रिपाठी), एक रक्षिता के जीवन में नारीवादी हस्तक्षेप(मोहन कृष्ण वोहरा), साम्राराज्यवादी शक्तियों के प्रतिरोध की दो क्लासिक्स(पुष्पपाल सिंह) एवं कभी अकेले में मुक्ति नहीं(कुमार विश्वबंधु) में वह सब कुछ है जो हिंदी के शोध छात्र से लेकर गंभीर पाठक के लिए उपयोगी है। ध्रुव शुक्ल, अनामिका, कुमार वीरेन्द्र एवं विस्वाव शिम्बोसर्का की कविताएं बदलते समाज की जरूरतों पर अपने विचार रखती हुई कुछ नया करने की अपेक्षा करती है। क्षमा कौल की कहानी, कमल वशिष्ठ का रंगमंच पर आलेख एवं वसंग निरगुणे का लोक कथाओें पर आलेख पत्रिका की उपलब्धि कही जा सकती है। अन्य रचनाएं एवं पुस्तक समीक्षाएं पठनीय होने के साथ साथ जानकारीपरक भी हैं।

‘केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका’ 

पत्रिका: केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका, अंक: जनवरी2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. एस. चंद्रशेखर नायर, पृष्ठ: 22, मूल्य:20रू.(.आजीवन 1000रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0471.2541355, सम्पर्क: श्री निकेतन, लक्ष्मीनगर, पोस्ट पट्टम पालस, तिरूवनन्तपुरम, 615.004 केरल
यह जानकर अत्यधिक आत्मिक शांति मिलती है कि केरल से भी हिंदी साहित्य की कोई पत्रिका निकलती है। चंद्रशेखर नायर द्वारा संपादित पत्रिका के इस अंक में के.बी. पाजी द्वारा लिखित मार्मिक आलेख मधुर संकल्पों को पीछे छोड़कर प्रकाशित किया गया है। यह आलेख पत्रिका के आजीवन सदस्य शरतचंद्र पर एकाग्र है। पुष्पेन्द्र दुबे का आलेख पंत और बिनोबा के विचारों का तुलनात्मक आकलन अत्यधिक विचारवान लेख है। बद्रीनारायण तिवारी ने आचार्य रामानुज संक्षिप्त किंतु उपयोगी व पठनीय लेख लिखा है। दलित कहानीकार प्रेमचंद्र(चंद्रभान सिंह यादव), भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक ऋषि अगस्तय(एम.शेषन), सामाजिक स्तरीकरण एवं संबोधन शब्द(सिंधु एस.एल.), हिंदी साहित्य के विकास में सरस्वती का योगदान(आशाराणी), एक इंच मुस्कानःएक नया प्रयोग(सविता पी.एस.) गैर हिंदीभाषी लेखकों द्वारा हिंदी में मौलिक रूप से लिखे गए आलेख हैं इनका स्तर हिंदी की अच्छी व स्तरीय रचनाओं से कहीं अधिक स्तरीय है। बी.गोविंद शेनाय की लघुकथा, आचार्य विष्णुदत्त का आलेख व डाॅ. वीरेन्द्र शर्मा की अक्षरगीता प्रभावित करती है।

‘साहित्य सागर’

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 240रू.), ई मेल: kksaxenasahityasagar@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया भोपाल म.प्र.
पत्रिका का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार सुखदेव सिंह कश्यप पर एकाग्र है। अंक में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चंद्रसेन विराट, सूर्यकांत नागर, चंद्रभान भारद्वाज, सतीश दुबे, गिरेन्द्र सिंह भदोरिया प्राण ने सार्थक आलेख लिखे हैं। महेन्द्र अग्रवाल, सत्यनारायण सक्सेना एवं हर्षवर्धन पाठक के आलेख प्रभावित करते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व सामग्री उपयोगी है।

पाखी: 

पत्रिका: पाखी, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 240रू.), मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट/ब्लाग: www.pakhi.in , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर-61, नोएडा
पाखी का समीक्षित अंक अपूर्व जोशी के संपादन में प्रकाशित होने वाला अंतिम अंक है। उन्होंने संपादकीय में स्पष्ट किया है कि आगामी अंक से संपादन प्रेम भारद्वाज करेंगे। उनके मन में कुछ नई योजनाएं हैं जिसके चलते वे संपाकीय से मुक्त होना चाहते हैं। वे अपनी योजनाएं स्पष्ट कर देते तो पाठकों को अपार संतुष्टि मिलती।
समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में समाज से किसी वजह से छिटके हुए लोगों के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त की गई हैं। इस भाव को आदमी का बच्चा(जयश्री राय), सड़क जाम(दिलीप कुमार), सारी मां(स्मिता श्रीवास्तव) एवं केशव बाबू क्यों केशव बाबू हैं(उन्मेष कुमार सिन्हा) की कहानियों में महसूस किया जा सकता है। जयश्री राय ने कहानी आदमी का बच्चा में स्पष्ट किया है कि आज आम आदमी किस कदर बाजारवादी मानसिकता से बंधा हुआ है। स्मिता श्रीवास्तव ‘सारी मां’ के माध्यम से मां की ममता को अपने जन्म लेने की पीड़ा से व्यक्त करना प्रारंभ करती हैं। उसके पश्चात वे मां के माध्यम से इस ममता की मूर्ति के प्रति अपनी सद्भावनाएं प्रगट करती हैं। अमरकांत की कहानी ‘जिंदगी और जोंक’ उस दौर की कहानी है जब जीवन में पीड़ा जोंक के रूप में विद्यमान थी। तब से लेकर आज तक हालातों में कोई तब्दीली नहीं आई है। निशांत, मनोज कुमार झा, कुमार अनुपम, रोहित प्रकाश, आतुतोष चंदन, मृत्यंुजय प्रभाकर एवं मंजुलिका मिश्रा की कविताएं जीवन के संघर्ष एवं पीड़ा को नए ढंग से पेश करती दिखाई पड़ती हैं। इन कविताओं में न तो बाजारवाद की चमक है और न ही प्राचीन भारतीय परंपरा को तोड़ने की कोई महत्वाकांक्षा। इनमें समाज से जिंदगी में समय के अनुरूप रद्दोबदल करने की कामना है। कृष्ण बिहारी और स्वतंत्र मिश्र के आलेख राय प्रकरण पर आखों देखा हाल जैसे लगते हैं। अब इसे बिभूतिनारायण जी एवं रवीन्द्र कालिया जी की माॅफी के समाप्त माना जाना चाहिए। इसी में साहित्य और हिंदी भाषा की भलाई है। राजीव रंजन गिरी ने पल्लव जी के संपादन में प्रकाशित पत्रिका बनास की एक तरह से समीक्षा ही की है। जिसमें उपन्यास सृजन व उसकी ग्राहयता पर काफी कुछ लिखा गया है। इस बार पुण्य प्रसून वाजपेयी का आलेख ‘पीपली लाईव से लुटियन लाइव’ नए बोतल में पुरानी शराब जैसा लगा। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उल्लेखनीय हो। विनोद अनुपम ने अलबत्ता ‘सिनेमा के संत का अवसान’ नामक अच्छा लेख लिखा है। प्रेम भारद्वाज का आलेख ‘मेरी मुश्किलों का हल’ में वे भले ही कोई हल न ढूंढ सके हो लेकिन आने वाले समय में पाखी का संपादन करते हुए अच्छी वजनदार रचनाओं(नामी गिरामी नामों से प्रभावित हुए बगैर) का ढूंढना ही होगा। उप संपादक प्रतिभा कुशवाहा अब ब्लाग एक्सपर्ट हो गई है। उन्होंने ‘नारायण नारायण .. ’ जपते हुए विभूति नारायण राय प्रकरण का न्यायोचित समाधान दिया है।
पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी प्रभावित करती हैं। अब वन डाउन संपादक प्रेम भारद्वाज जी की धुआधार पारी का इंतजार है।

 ‘‘आसपास’’

पत्रिका: आसपास, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 16, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.dharohar.net/ , फोन/मो. 0755.2775129, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र.
सम्पर्क पत्रिका आसपास के इस अंक में वीरता के लिए पुलिस उप महानिरीक्षक एवं ख्यात साहित्कार अनुराधा शंकर सिंह को राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मान का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। विचारणीय स्तंभ के अंतर्गत साहित्य और विजुअल मीडिया पर लिखा लेख काफी गंभीर है व आज के सदर्भ में मीडिया की जिम्मेदारी तय करता है। भारत भवन में प्रथम अंतराष्ट्रीय संवाद का आयोजन संबंधी समाचार मध्यप्रदेश में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की जानकारी देता है। कवयित्री ममता तिवारी के कविता संग्रह के लोकापर्ण का समाचार उनके सृजन के संबंध में भी सार्थक व उपयोगी जानकारी देता है। मासिक साहित्यिक पत्रिका विचार आकलन के समाचार के साथ ही पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व संवाद हेतु प्रकाशित जानकारी आम पाठक के साथ साथ साहित्यकारों के लिए भी समान रूप से उपयोगी है। 

अखिलेश शुक्ल ,कथा-चक्र सम्पादक 

akhilsu12@gmail.com,


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सम्पादक:जितेन्द्र यादव

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