माणिक की कविता :-कभी तो कबूलें हकीक़त - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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माणिक की कविता :-कभी तो कबूलें हकीक़त



कभी तो कबूलें हकीक़त 
कभी तो फेंकें दूर झूंठ की चादर
जी लें कुछ देर 
नाटकबाजी के विरह में 
सोच कुछ ऐसा ही मन में 
आज दी है बचपन को शक्ल 
कवितानुमा शब्दों में ढाला है मैंने
इतिहास है ये साहित्य नहीं
पढ़ना ज़रा संभल के 
ठहरना कुछ देर अगर ज़रूरी लगे 
सोचना तनिक गांवों में धंसी उम्र को 
और लाना ख़याल मन में 
हो सके तो करना ज़िक्र 
कॉफ़ी  हाउसकल्चर में कहीं 
जैसे तैसे बड़े होते बच्चों के 
दमे से लदे फैंफड़ों का 
फसल कटे खेतों में 
बिना जूतों के बचपन ढूँढता था
मूंगफली,सोयाबीन के दाने
और अफीम के बचे-कूचे डोडे
बेचकर औने पौने दाम ही
खुशी हासिल थी मुठ्ठी में उनके
नदी,तालाब,पथवारी की ओर 
जाते रेले में जा रमते थे बचपनिया दिन
याद रही रामरेवाड़ी और नौरात्रि का नेजा
कुछ था धुंधला  इंतज़ार रातीजगे में
देवरे पर बँटने वाले कांसे का भी था 
ना कोई रोकता
ना कोई टोंकता था उन दिनों
खुद ही बनाते-बिगाड़ते जीवन की डगर
गूंथते थे बारम्बार
गीली मिट्टी बचपन की
मन मुताबिक़ शक्ल देते थे
पास या फेल से बड़ा 
कोई झंझट नहीं होता था
ना कोई प्रतिशत की मारा-मारी
निचले मौहल्ले  के कुछ संगी साथी
बच्चे जोत दिए जाते थे 
पूरा कार्तिक मास
खेत,खलिहान और मजूरी में हो तन्मय 
रख बस्ता टांड पर
वो भी भूल जाते थे
ढलान से होकर स्कूल को जाता रास्ता
स्कूली रिपसपट्टी से ज्यादा रुचते थे
जंगली बैर,सीताफल और सितौलिए 
सवेर की दस से गोधूली की छ; तक 
चोपते थे खेतों में लहसून
चूल्हे की खातिरदारी में
पिताजी पेड़ काटते थे
दीदी छूटके को पालती थी
मुर्गी, भैंस और बकरियों का ज़िम्मा
आ पड़ता था बूढ़ी दादी पर आख़िर
दड़बेदार  कांच वाले चश्में से देखती थी 
चलाती थी काम अपना जैसे तैसे 
कभी माँ फसल काटती थी
भूख बेचारी रातभर जागती थी कभी 
प्यास बार-बार गले को नापती थी 
और दिन कटते रहे यूंही
स्कूल की खिड़कियों से झांकने  में ही
कुछ तो उम्र निकल गई थी
बिता बचपन फुर्र सा
यूं लगा कभी आया और गया भी फुर्र से
सब कुछ वैसा ही रहा बरसों तलक 
वही स्कूली इमारत,वही किताबें
उसी कक्षा में उसी खाखी हाफेंट के साथ
पहनना था वही नीला शर्ट
वैसा ही  रहा बस्ता ठेगरेदार
वही खूंटी,वही टांड 
बनी रही सुख दुःख का सहारा 
बस्ते के हित 
साल दर साल मगर बदलते  रहे धंधे
घर,भूख और जीवन के जुगाड़ में
कभी बेचे अखबार,कभी गासलेटी चिमनियाँ
किराने की दूकान का मुनिमपना
तक दिखा लाया मेरा बचपन
याद है वो आलम
बस्तियों के कंधो पर रखी चिमनियाँ
इमारतें चमकाती थी अपनी रोशनी से
हमने रखे घंटों घंटों अपने कंधे पर कभी
रोशनी करते वे मेंटल वाले स्टोव
और बिन्दोली में नाचता उपरला मौहल्ला पूरा
चुभने वाले नजारों में
ऐसे ही कुछ दृश्य थे शामिल
मगर हम असमर्थ  ही रहे
कुछ  भी ना कर सके सीधा 
साइकिल,पैदल और पहियों के बूते
नापी दूरियां हज़ारों मील हमने
बीत गया बचपन का कुछ हिस्सा यूं
माईक मशीन लगाते हुए 
नांगल,मुंडन रातीजगे में
सपने तैरते रहे आँखों में  और दिल बैचेन
रातभर के गीत सुनने पर मिलने वाली
प्रसादी रही निशाने पर बरसों
यूं भरता रहा गीत गांवों में
और रीता रहा खुद ही 
उम्र अधियाने तक 
सोच सोचकर उसी दौर को
आज भी चलता हूँ ज़मीन के आस पास ही
  पुरानी आदत के चलते
बातों में उड़ना आज तक नहीं जान पाया
ना खुलता हूँ हल्केपन से
ना भागता हूँ आफत में आज भी
कुछ तो वैसा ही रहा
कुछ बदला हूँ कोने से
तसल्ली है मन में मेरे
 आज सच कबूलने की
बचपने में ही बुढापा पा गया
पिछे देखा आज मुड़कर फिर से
तो यही कुछ याद आया
जिसे आज जाकर लिखा है खरा-खरा 
उन दिनों के रोजनामचे के नाम 

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