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अरुण चन्द्र रॉय की कविता - मेरे भीतर एक पशु है

Written By Arun Roy on मंगलवार, अक्तूबर 26, 2010 | मंगलवार, अक्तूबर 26, 2010

मेरे भीतर एक पशु है


************************
मेरे भीतर 
एक पशु है 
जी हाँ 
एक पशु 
जिसे अक्षर ज्ञान नहीं 
दुनियादारी का पता नहीं
सामाजिकता नहीं पता
हाँ 
आदमी की तरह 
व्यवहार भी नहीं करता वह ,
पशु है किन्तु 
भरोसे का है. 

अपने भाव और 
संवेदना के प्रति
ईमानदार है
आदमी होता तो
शायद छल गया होता 
मुझे कब का लेकिन नहीं
साथ है मेरे सभी उतार चढ़ाव में 
मेरे भीतर का पशु 

अच्छा लगता है
मुझे अपने भीतर के पशु के साथ
बैठ कर
वार्तालाप कर
बहुत अपनी सी लगती है
उसकी आत्मीय बातें 
जो इन दिनों बाहर नहीं मिलती

मुझ पर 
बहुत दवाब है 
चारों ओर से 
कि विस्थापित कर दूं 
अपने भीतर के पशु को
और आदमी हो जाऊं 
बाजार का हो जाऊं 
थोड़ी राजनीति सीख जाऊं 
थोड़ी दुनियादारी भी 

मेरा भीतर का पशु
प्रेम करता है
जिसमें दुनियादारी नहीं
आस्था है ईश्वर सी, इसलिए 
करने दो मुझे प्रेम
मेरे भीतर के पशु से 
प्रार्थना करो
मेरे भीतर के पशु के लिए
रहने दो उसे
मेरे भीतर
खतरा नहीं मुझे 
मेरे भीतर के पशु से, 
आदमी से जरुर है . 
************************
अरुण चन्द्र रॉय  : एक परिचय - 
पेशे से कॉपीरायटर तथा विज्ञापन व ब्रांड सलाहकार. दिल्ली और एन सी आर की कई विज्ञापन एजेंसियों के लिए और कई नामी गिरामी ब्रांडो के साथ काम करने के बाद स्वयं की विज्ञापन एजेंसी तथा डिजाईन स्टूडियो का सञ्चालन. अपने देश, समाज, अपने लोगों से सरोकार को बनाये रखने के लिए कविता को माध्यम बनाया है. 


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13 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sahi kaha...

    प्रार्थना करो
    मेरे भीतर के पशु के लिए
    रहने दो उसे
    मेरे भीतर
    खतरा नहीं मुझे
    मेरे भीतर के पशु से,
    आदमी से जरुर है .

    pashu ko ham shant kar sakte hai lkein insaan ko ham pahchan kaha pate hai

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरा भीतर का पशु
    प्रेम करता है
    जिसमे दुनियादारी नहीं
    आस्था है ईश्वर सा .. apne bhitar ke pashu ko kab pahchanne ki koshish ki hai admi ne. lekin yadi bhitar ka pashu prem karta hai to pashu rah hi nahi jata. shubhkamna ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. अरुण बाबू ने इस कविता के ज़रिए फिर से मानव जीवन से जुडी किसी ख़ास विसंगती की तरफ इशारा किया है अभी भी अगर आदमी अपनी आजकल की दिखावटी आदमीयत से विलग अन्दर में छूपी असल आदमीयत को पाने की चेष्टा ना करे तो फिर क्या बाकी रहा. लेखन के ज़रिए इंसानों को सुधारने या सोचने के लिए एक थपकी भर देने का ये तरिका बहुत अछा लगा.अरुण बाबू बहुत दिन बाद अपनी माटी के पाठकों के लिए उपस्थित हुए स्वागत है.वैसे हम आपको पढ़ते रहते हैं.आप की सभी कविताओं को एक साथ किसी संग्रह में पढ़ना इक बड़ी सी कहानी अगेगा. इस बात का मुझे तो इंतज़ार रहेगा. शुभकामनाएं

    --
    सादर,

    माणिक;संस्कृतिकर्मी
    17,शिवलोक कालोनी,संगम मार्ग, चितौडगढ़ (राजस्थान)-312001
    Cell:-09460711896,http://apnimaati.com
    My Audio Work link http://soundcloud.com/manikji

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छा लगता है
    मुझे अपने भीतर के पशु के साथ
    बैठ कर
    वार्तालाप कर
    बहुत अपना सा लगता है
    उसकी आत्मीय बातें
    जो इन दिनों बाहर नहीं मिलता

    bahut sundar kavita

    उत्तर देंहटाएं
  5. अरुण बाबू ने इस कविता के ज़रिए फिर से मानव जीवन से जुडी किसी ख़ास विसंगती की तरफ इशारा किया है

    उत्तर देंहटाएं
  6. कमाल की लेखनी है अरुण बाबू
    आपकी लेखनी को नमन बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रेम करता है
    जिसमें दुनियादारी नहीं
    आस्था है ईश्वर सी, इसलिए
    करने दो मुझे प्रेम
    मेरे भीतर के पशु से
    प्रार्थना करो
    मेरे भीतर के पशु के लिए
    रहने दो उसे
    मेरे भीतर
    खतरा नहीं मुझे
    मेरे भीतर के पशु से,
    आदमी से जरुर है .

    वाह कहकर सिर्फ़ खानापूर्ति नही की जा सकती इस कविता के लिये……………एक ऐसा भाव है जहाँ शायद कुछ कहने की गुंजाइश ही नही बची ………………अरुण जी ने कितनी गहनता और सूक्ष्मता से ये बात कही है और ये सिर्फ़ वो ही कर सकते हैं यही उनकी लेखनी का कमाल है जो वहाँ देखती है जिसे आम इंसान देख नही पाता।

    उत्तर देंहटाएं
  8. ये पशु तो आम पशुओं से भिन्न है. पढना लिखना जानता है और ऊपर से गहन चिन्तन भी. बहुत गहरी सोच और समाज का सामीप्य साफ़ नज़र आ रहा है कमाल की लेखनी.......

    उत्तर देंहटाएं
  9. @ सखी जी / मेरे भाव जी/ मानिक जी/ पंकज जी / वंदना जी/ संजय भास्जकर जी

    मेरे भीतर के पशु को स्वीकार करने के लिए बहुत बहुत आभार.. स्नेह बनायें रखें !

    उत्तर देंहटाएं
  10. asshok jamnani to me

    "Aapke bheetar rachnatmakta ka samudr hai"..

    उत्तर देंहटाएं
  11. arun jee
    namaskar !
    ek achchi rachna padhane ka soubhagya prapr hua .
    sadhuwad !

    उत्तर देंहटाएं
  12. अच्छा लगता है
    मुझे अपने भीतर के पशु के साथ
    बैठ कर
    वार्तालाप कर
    बहुत अपनी सी लगती है
    उसकी आत्मीय बातें
    जो इन दिनों बाहर नहीं मिलती
    gr8

    उत्तर देंहटाएं
  13. @रचना दीक्षित जी/ रश्मी प्रभा जी
    मेरी कविता पसंद करने और पढने के लिए बहुत बहुत आभार !

    उत्तर देंहटाएं

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