संस्मरण :बहुत याद आयेंगे रामकैलास - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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संस्मरण :बहुत याद आयेंगे रामकैलास

रामकैलास जी के बारे में यह निर्णय कर पाना कठिन है कि वह व्यक्ति बड़े थे या गायक। दुर्लभ सामंजस्य था। किसी व्यक्ति के लिये ऊँचाई प्राप्त करना आज के बुद्धिजीवी, नगरीया शिक्षा  के बगैर किस सहजता से संभव है, रामकैलास जी इसी बात के प्रतीक थे।
सर्वप्रथम मैंने रामकैलास जी को ’बीट ऑफ इण्डिया’ द्वारा प्रकाशित  विडियो  ’कलर्स ऑफ अर्थ’ में देखा था। गा रहे थे ’कवन रंग मुँगवा, कवन रंग मोतिया, कवन रंग ननदी तोहरे बिरना’। इस गाने को हमने रोशन  के संगीत निर्देशन  में सुमन कल्याणपुर के स्वर में सुन रखा था। परन्तु चेहरे का भाव और स्वर जिस प्रकार भाव प्रकट कर रहे थे, पहले अनुभव नहीं हुआ था। पं0 ओंकारनाथ ठाकुर याद आ गये, जो श्रोताओं का कहते थे चेहरे पर देखने के लिये। ठाकुर जी की बातें समझ में आने लगी थीं।

कई वर्षों बाद जब उनसे पहली बार साक्षात्कार हुआ तो फिर उन्होंने अनुरोध पर यह गाना सुनाया। इन बार इस गाने का अर्थ भी साथ-साथ समझा रहे थे। और वह मधुर स्वर, एक नई बात हो रही थी।स्नेह टपकता था उनके व्यक्तित्व से। मैंने उन्हें अपने सहयोगियों को फटकार लगते भी सुना है, वह भी स्नेह भरा। उनकी बोली भोजपुरी तो मीठी है ही।
एक बार अखबार के लिये उनसे बात कर रहा था। बिरहा को बिरहा क्यों कहते हैं, समझा रहे थे। उनका कहना था, चूँकि बात लौटकर विरह पर आ ही जाती है, इसलिये बिरहा कहते हैं। कई उदाहरण दिये, कहा जब कृष्ण गोपियों को छोड़ द्वारका चले गये तो विरह हुआ। जब रोपनी गाते हुये महिलायें धान का बिरवा उखाड़ती हैं तो उस बिरवे का जमीन से अलग होना विरह है। ऊपर धूप में शरीर जल रहा है, विरह है। नीचे पानी में पाँव गल रहा है, वो विरह है, और झुककर धान रोपते-रोपते कमर टूटी जा रही है, वह भी विरह है।
फिर कहा, जब पति शादी के बाद पत्नी को मायके छोड़ आता है, विरह है। जब गौने के बाद अपने घर पर छोड़ परदेस कमाने जाता है, विरह है। सैनिक जब सीमा पर लड़ाई लड़ने जाता है, नायिका के लिये विरह है, और अगर शहीद हो गया, तो जीवन भर विरह है। और मेरी आँखों में आँसू आ गये थे।
सितम्बर 2009 की बात है। बरसात का मौसम था पर सूखा पड़ा था। गाने से पहले कहने लगें, इस साल तो बरसात नहीं हुई, तो क्या कजरी गायेंगे? उत्तर में कहा, देखिये कैसी कजरी गायेंगे। ननद भौजाई का संवाद है। ननद पूछती है, तुम्हारा नईहर किधर है? भौजी जवाब देती है, पूरब तरफ। और ये बताओ कि बदरा किधर से आते हैं? जवाब देती है, पूरब से। ननद कहती है तब तो ये तुम्हारे नईहर से ही आते हैं। भौजाई कहती है, हाँ ये हमारे भईया हैं और पुर्वा हमारी बहन है। वही ठेलती है तो भईया इधर आते हैं। तो फिर अपने भईया से कहो, इधर बरसें, सूखा पड़ा है। और भौजी गाती है ’’हमरे नइहर से धुमड़ धुमड़ आवैं बदरा।’’ कार्यक्रम के अन्त में ’आज प्रभुजी के पावऽ दर्शनवाँ कि हम नाच गइलीं’ गाते हुये खूब नाचे थे। श्रोता बच्चे उत्साह से उछलने लगे थे।
आठ सितम्बर को बिहार के सिवान में कार्यक्रम था। यही जानकर मैंने आठ की सुबह फोन  किया, उनके पौत्र ने फोन उठाया और पता चला तीन सितम्बर को हृदय धात के बहाने महाप्रमाण कर गये। अन्तिम कार्यक्रम एक सितम्बर को पुणे में स्पिकमैके के लिये किया। डी0 पी0 एस0 पुणे की अन्विता भारती ने बताया, वे कह रहे थे, बच्चों के बीच गाकर मुझे लगता है मोक्ष मिल गया।
(ये संस्मरण स्पिक मैके मुज़फ्फरपुर के सक्रीय कार्यकर्ता यशवंत पाराशर ने लिखा है उनसे  yashwantparashar@gmail.com ,Kids Camp International School,Chakkar Road, Muzaffarpur - 842001,Phone: 9204655700 पर संपर्क कर सकते हैं.)

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