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अरुण चन्द्र रॉय की कविता:'अधूरी रह गयी दिवाली '

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, अक्तूबर 30, 2010 | शनिवार, अक्तूबर 30, 2010

दीपक 
खरीद लाये 
बाज़ार से
कर आये मोल भाव
कुम्हार से 
ले आये 
गुल्लक
सिखाने को 
बचत
बच्चे को अपने
मिठाइयाँ भी
पटाखे भी
नए कपड़े भी
दिला दिए
बच्चों को
रटा दिया 
अभिवादन 
'हैप्पी दिवाली' आदि आदि 
भूल गया मैं
बताना  
कैसे समर्पण करते हैं 
तेल और बाती  
एक दूसरे के लिए 
कैसे जलती है बाती 
अकेली 
रोशनी के लिए
अधूरी रह गयी
दिवाली 
मिटा जो नहीं 
भीतर  का अँधेरा 
इस बार भी . 
(अरुण चन्द्र रॉय वर्तमान में अपने ब्लॉग सरोकार के साथ ही ब्लॉग्गिंग जगत के ज़रिए कविता लेखन के इलाके में बहुत नवाचारी विधा से लिखने वालों में हैं. उनकी कविताओं में सभी तरह का रचनाकर्म देखने को मिल जाएगा.-सम्पादक )

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15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा सन्देश देती अच्छी रचना ..

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  2. Bahut sahi likha aapne arun jii, EK DEEYA UNKO DEEYA JINKO NAHI DEEYA KUDRAT KEE MAAR NE , TABHI SACHHE ARTHO MAI DEEPAWALI MANANA SARTHAK HOGA ASHOK KHATRI

    उत्तर देंहटाएं
  3. समाज के सामान्यीकृत नज़रिए को एक बार फिर से नज़र में लाती कविता ,जहां काम की दौड़ में मंझिल कब बदल जाती है भान भी नहीं रहता है.वक़्त के साथ कई बार हुए मज़ाक में नकली सफलता ही आभासी आनंद दे रही होती है और ये जात-समाज के लोग बरगला दिए जाते हैं पता तक नहीं चलता .कविता भा गई
    सादर,

    माणिक;संस्कृतिकर्मी
    17,शिवलोक कालोनी,संगम मार्ग, चितौडगढ़ (राजस्थान)-312001

    and some other comments sent me by E-mails

    रवि कुमार, रावतभाटा


    अधूरी रह गयी
    दिवाली
    मिटा जो नहीं
    भीतर का अँधेरा
    इस बार भी .....

    बेहतर कविता...


    समीर लाल commented on अरुण चन्द्र रॉय की कविता:\'अधूरी रह गयी

    - http://www.apnimaati.com/

    :

    अधूरी रह गयी
    दिवाली
    मिटा जो नहीं
    भीतर का अँधेरा

    rkrish commented on अरुण चन्द्र रॉय की कविता:\'अधूरी रह गयी

    - http://www.apnimaati.com/

    :

    अधूरी रह गयी
    दिवाली
    मिटा जो नहीं
    भीतर का अँधेरा
    इस बार भी ..Bahut khoob

    rasprabha commented on अरुण चन्द्र रॉय की कविता:\'अधूरी रह गयी

    - http://www.apnimaati.com/

    :

    भूल गया मैं
    बताना
    कैसे समर्पण करते हैं
    तेल और बाती
    एक दूसरे के लिए
    कैसे जलती है बाती
    अकेली
    रोशनी के लिए
    bahut badhiya

    डॉ.शास्त्री "मयंक" commented on अरुण चन्द्र रॉय की कविता:\'अधूरी रह गयी

    - http://www.apnimaati.com/

    :

    भूल गया मैं
    बताना
    कैसे समर्पण करते हैं
    तेल और बाती
    एक दूसरे के लिए
    कैसे जलती है बाती
    अकेली
    रोशनी के लिए...
    --
    यही तो प्राण हैं इस रचना के!


    digamber commented on अरुण चन्द्र रॉय की कविता:\'अधूरी रह गयी

    - http://www.apnimaati.com/

    :

    अधूरी रह गयी
    दिवाली
    मिटा जो नहीं
    भीतर का अँधेरा
    इस बार भी ....

    kaash is andhere ko door kar saken apne dilon se ... bahut achee rchna ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सटीक विषय पकड़ा है सही समय पर। फास्‍ट फूड संस्‍कृति में खोये लोग अक्‍सर ये भूल जाते हैं कि बच्‍चों में संस्कार धीरे-धीरे विकसित होते हैं और उनकी जड़़ों में परिवार का व्‍यवहार बहुत मायने रखता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. deewali ke utsav pe ek achchhi sandesh deti rachna.............badhai!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. .

    जिसमें संस्कार हैं, वो आज भी सही दिशा निर्देश कर रहे हैं अपने बच्चों का , लेकिन अफ़सोस आज के माता -पिता स्वयं नहीं जानते क्या सिखाया जाए।

    .

    उत्तर देंहटाएं
  7. अधूरी रह गयी
    दिवाली
    मिटा जो नहीं
    भीतर का अँधेरा
    इस बार भी ...
    आपकी कलम कितने ही दिलों की बात कह गई. काश किसी की दिवाली अधूरी न रहे.

    उत्तर देंहटाएं
  8. अच्छा रचनाकार वही हो सकता है जिसके पास अच्छा जीवनानुभव हो. यही बात अरुणजी पर भी लागू होती है. दिवाली को लेकर लिखी बेह्तरीन कविता. बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  9. maanik jee
    arun jee
    namaskaar !
    samaj me visamta jo aaj faili hue hai us aor aap ne dhayan aakarshit karane ka achcha praaas kiye hai . sadhuwad
    saadar

    उत्तर देंहटाएं
  10. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 02-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  11. "मिटा जो नहीं
    भीतर का अँधेरा
    इस बार भी"

    उसी को मिटाना जरुरी है - बहुत अच्छा सन्देश

    उत्तर देंहटाएं

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