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मंगलवार, अक्तूबर 12, 2010

आयोजन रपट:-रचनाकार किसी जन्मजात प्रतिभा का मोहताज नहीं होता: नंद भारद्वाज

राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी द्वारा उदयपुर में नंद भारद्वाज पर केन्द्रित सृजन साक्षात्‍कार

विगत 7 अक्‍टूबर, 2010 को उदयपुर स्थित राजस्थान साहित्य अकादमी के सभागार में राजस्‍थान के चर्चित कवि-रचनाकार नंद भारद्वाज का ‘‘लेखक से मिलिए कार्यक्रम के अन्‍तर्गत उनकी सृजन वार्ता का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए श्री भारद्वाज ने कहा कि लेखन मेरे लिए शौक या हॉबी का सबब कभी नहीं रहा, बल्कि यही मेरे जीने का तरीका है। लिखना-पढ़ना मेरे लिए उतना ही सहज और जरूरी काम रहा है, जितने जीवन के दूसरे काम। यह बात अनुभव से ही जानी है कि रचनाकर्म किसी जन्मजात प्रतिभा का मोहताज नहीं होता, उसे अपने भीतर की आत्मिक संवेदना, सुरुचि और सतत अभ्यास से विकसित किया जा सकता है। इस अवसर पर उन्‍होंने अपनी चुनिन्दा कविताएं - आग की ग़रज़, चिडि़याघर, एक आत्‍मीय अनुरोध, हरी दूब का सपना, अपने बच्चे से, घर तुम्हारी छांव में, जो टूट गया है भीतर, आपस का रिश्ता आदि का पाठ किया। 
       कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार श्री सदाशिव श्रोत्रिय ने कहा कि साहित्य पढ़ने वाले वे ही लोग हैं जो स्वयं लिखते भी हैं। बाजार में असाहित्यिक साहित्य इतना उपलब्ध है कि श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ साहित्य में अन्तर कर पाना पाठकों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। साहित्य समाज के अन्दर एक मार्गदर्शक का काम करता है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री पुरुषोत्तम पल्लव ने नंद भारद्वाज की कविताओं के बारे में कहा कि उनका रचनाकर्म सहज और सुबोध है तथा उनकी रचनाएं सामाजिकता, सांस्कृतिक चेतना और अपने समय के यथार्थ को वाणी देती हैं। उदयपुर आकाशवाणी निदेशक श्री माणिक आर्य ने कहा कि श्री भारद्वाज मूलतः करुणा व वेदना के कवि हैं। आपका बचपन गाँव में बीता जिसकी झलक आपके रचनाकर्म में परिलक्षित होती है। 
       मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी ने कहा कि स्नेह के अमूल्य क्षण पूरी जिन्दगी को बदल देते हैं या नयी आशा से परिवर्तित कर देते हैं। कवि की कविता से परिचित होने के साथ ही उसके स्नेह से जुड़ जाना मैं और भी आवश्यक मानता हूं। भारद्वाज बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार हैं। अप्रस्तुत की प्रस्तुत द्वारा व्याख्या करना ही कविता है। कवि समय का व्याख्याकार होता है और समय ही कविता का सबसे बड़ा व्याख्याकार है। वरिष्‍ठ आलोचक डॉ. नवलकिशोर ने अपने उद्बोधन में कहा कि कविता को पढ़ते समय हम उसके सीमित रूप-अर्थ तक ही पहुंच पाते हैं लेकिन जब रचनाकार से प्रत्‍यक्ष सुनते हैं तो उसके नये-नये अर्थ हमारे सामने खुलते जाते हैं। 

       अकादमी सचिव डॉ. प्रमोद भट्ट ने अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर चित्तौड़गढ़ से आए कवि श्री अब्दुल जब्बार, पुष्कर गुप्तेश्वर, उदयपुर शहर के प्रबुद्ध साहित्यकार डॉ. राजेन्द्रमोहन भटनागर, किशन दाधीच, इन्द्रप्रकाश श्रीमाली, जगजीत सिंह निशात, इकबाल हुसैन इकबाल, मदन जोशी, मनोहरसिंह राठौड़, दर्शन सिंह रावत, विष्णु भट्ट, लक्ष्मणपुरी गोस्वामी, डॉ. हिमांशु पण्डया, नवीन नंदवाना, रजनी कुलश्रेष्ठ, रेणु सिरोया, वीना गौड़ आदि उपस्थित थे। 

ये रपट मनीषा कुलश्रेष्ठ जी ने भेजी है.

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