अशोक जमनानी की दीपावली विषयक कविताएँ -अंक-1 - अपनी माटी

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अशोक जमनानी की दीपावली विषयक कविताएँ -अंक-1


गांव की मिट्टी के दीपक हैं
गांव की ही तो बाती है 
फिर क्यों ये जगमग रोशनियां 
गांवों तक पहुँच न पाती हैं
हम रुके बहुत अब चलें ज़रा
अब रात वहां ना काली हो
जो राजमार्ग पर ठहरी है 
वो गांव की भी दीवाली हो  
(यहाँ हम आने वाले पर्व दीपावली के लिहाज़ से अशोक जमनानी की इसी विषय पर आधारित कविताएँ प्रकाशित करंगे-सम्पादक )

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही मार्मिक रूप से दिवाली की शुरुआत की है.. सुन्दर और सार्थक कविता... !

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