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''लघु पत्रिका आन्दोलन''- ''कुछ सार्थक पत्रिकाएँ''

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, अक्तूबर 26, 2010 | मंगलवार, अक्तूबर 26, 2010

‘वागर्थ’ 


पत्रिका: वागर्थ, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 120, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 200 रू.),वेबसाईट/ब:http://www.bhartiyabhasaparishad.com/ , फोन/मो. 033.329306, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता

हिंदी साहित्य की अग्रणी पत्रिका के अक्टूबर अंक में विचार योग्य व अच्छी विश्लेषण सामग्री का प्रकाशन किया गया है। समीक्षित अंक में उदयप्रकाश जी अपने ब्लाॅग पर मेघा पाटकर की कविता ‘अंतर’ और ‘उत्तर पाठिकता’ को विशेष रूप से स्थान दिया है। कृष्ण कुमार रत्तू का लेख लौटेगा
क्या कभी डोलना का चेहरा पठनीय व जानकारीप्रद है। गांधी और हिंद स्वराज पर वीरेन्द्र कुमार वरनवाल तथा हितेन्द्र पटैल के लेख स्वराज पर नए सिरे से विचार करते दिखाई पड़ते हैं। लोक विमर्श के अंतर्गत लेख पर्यावरण एवं विकास(सुभाष शर्मा) व बड़े लोग बड़ा भ्रष्टाचार(गिरीश मिश्र) विमर्श के माध्यम से आम पाठक को भारतीय समाज की बुराईयों व उसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह भी करते हैं। मुद्राराक्षस का लेख ‘क्या सारे बड़े कवि एक ही बड़ी कविता लिख रहे है’ तथा कृपाशंकर सिंह ‘कविता का तिलिस्म’ आलेख में कवि एवं कविता पर आज के संदर्भ में विचार करते हैं। दिलीप शाक्य की लम्बी कविता तथा ज्ञानेन्द्रपति, सुनीता जोशी व मिथलेश कुमार की कविताएं ै बाज़ारवाद के दुष्परिणामों को पहचान चुकी हैं। यही कविता का एक प्रमुख उद्देश्य भी है कि वह तत्कालीन समाज को सचेत करता रहे। कहानियों में जिंदगी अफसाना नहीं(समाल बिन रजाक), तस्मैं श्री गुरूवै नमः(दामोदर दत्त दीक्षित), अर्जन्या(हरि मृदुल) एवं अर्जन्या(प्रमोद भार्गव) में भी आशावादी समाज के लिए संदेश दिया गया है। पत्रिका धर्मयुग पर पद्मा सचदेव को लेख व चित्रा मुदगल का आलेख कहानियां लिखतीं कहानियां प्रत्येक नव रचनाकार का मार्गदर्शन करती हैं। अकील अहमद अकील की उर्दू ग़ज़ल के साथ साथ जहीर कुरेशी, भारत यायावर, विनय मिश्र व महेश कटारे सुगम की ग़ज़लें प्रभावित करती हैं। कवि गोपाल सिंह नेपाली पर राजीव श्रीवास्तव के लेख में विवरण की अपेक्षा विस्तार अधिक आ गया है जिससे लेख बिखर सा गया है। अन्य अंकों की तरह पत्रिका का संपादकीय विचार व विश्लेषण युक्त है

‘शुभ तारिका’

पत्रिका:शुभ तारिका, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 34, मूल्य: 12रू.(वार्षिक 120 रू.), फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्ण दीप ए 47, शास्त्री कालोनी, अंबाला छावनी 133.001 हरियाणा

विगत 38 वर्ष से लगातार साहित्य की सेवा कर रही पत्रिका शुभ तारिका के इस अंक में अच्छी व विविधतापूर्ण रचनाओं को स्थान दिया गया है। अंक में महावीर उत्तरांचली, चंद्र भानु आर्य, पवन चैधरी मनमौजी, चेतन आर्य, किशनलाल शर्मा व लेखराम शर्मा की लघुकथाएं प्रकाशित की गई हैं। पत्रिका में इस बार लेखक परिशिष्ट के अंतर्गत दिलीप भाटिया को स्थान दिया गया है। हितेश शर्मा, कुलभूषण कालड़ा, अशोक सिंह व खत्री कुमार की कविताएं प्रभावित करती हैं। गुलनाज की कहानी बसेरा का कथ्य व शिल्प आज की समस्याओं पर विस्तार से प्रकाश डालता है। अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि भी पठनीय हैं ।

‘समय के साखी’


पत्रिका:समय के साखी, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डा. आरती, पृष्ठ: 60, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 220 रू.), फोन/मो. 09713035330, सम्पर्क: बी 308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हॉस्पिटल के पास, भोपाल 462003 म.प्र.


समय के साखी के समीक्षित अंक में कुछ अच्छी सार्थक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका का स्वर तो प्रगतिवादी है लेकिन पत्रिका बाज़ारवाद को पूरी तरह से खारिज भी नहीं करती है। यह इस पत्रिका के इस समीक्षित अंक में महसूस किया जा सकता है। अंक में सुधीर विद्यार्थी व अर्चना द्विवेदी के आलेख भी इसी बात की पुष्टि करते हैं। प्रेमशंकर रघुवंशी, कैलाश पचैरी, नरेन्द्र गौड़, जितेन्द्र धीर व राहुल आदित्य राय अब भूमंडलीकरण में प्रगति का स्वर ढूंढ रहे हैं। चित्रा मुदगल की कहानी ‘अपनी वापसी’ पुनः पढ़कर अच्छा लगा। अमलेन्द्रु उपाध्याय, कृष्ण कुमार यादव के लेख भी पत्रिका का स्वर प्रखर करते हैं । अन्य रचनाएं,समीक्षाएं भी ठीक ठाक हैं।

पत्रिका:समावर्तन, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 90, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल:samavartan@yahoo.com , फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.

साहित्य एवं नाटकों के लिए समर्पित पत्रिका के इस अंक में ख्यात कवि राजेश जोशी व प्रसिद्ध चित्रकार विष्णु चिंचालकर पर एकाग्र है। अंक में कवि राजेश जोशी के समग्र व्यक्तित्व व उनके जीवन संघर्ष पर गंभीर लेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें संपादक रमेश दवे, केदार नाथ सिंह, सुधीर रंजन सिंह के लेख प्रमुख ध्यान देने योग्य हैं। उर्मिला शिरीष व विजय कुमार से उनकी बातचीत साहित्य का गहन गंभीर विश्लेषण करती है। निरंजन श्रोत्रिय की कवि अमित मनोज की कुछ चुनी हुई कविताएं, सत्यमोहन शर्मा, सदाशिव कौतुक, व कुमार सुरेश की कविताएं अच्छी है। सतीश श्रोत्रिय व सुरेश शर्मा की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। चंद्रभान राही की कहानी ‘बेटा’ का शिल्प व कनक तिवारी का आलेख प्रभावित करते हंै। विष्णु चिंचालकर पर सूर्यकांत नागर, प्रभु जोशी, दिलीप विष्णुपंत, शाहिद मिर्जा के लेख विष्णु जी की कला का संतुलित व संश्लेषित विश्लेषण करते हैं। पिलकेन्द्र अरोड़ा, राग तेलंग, प्रेम शशांक व रमेश खत्री के लेख व विनय उपाध्याय का सतंीा अन्य पठनीय रचनाएं हैं।

पत्रिका: मानसरोवर, अंक: पावस अंक 2010, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: विनोद कुशवाहा, देवेन्द्र सोनी, पृष्ठ: 38, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 80रू.),फोन/मो. 9425043026, 9827624219, सम्पर्क: मानसरोवर साहित्य समिति, पर्व एल.आई.जी. 85, न्यास कालोनी, इटारसी म.प्र.
मध्यप्रदेश की रेलनगरी इटारसी से प्रकाशित पत्रिका मानसरोवर संभवतः एक ऐसी पत्रिका है जो ऋतुओं के आधार पर प्रकाशित की जाती है। पत्रिका के समीक्षित अंक मंे सावित्री शुक्ल, ब्रजमोहन सिं ठाकुर, विनय दुबे, श्रीराम निवारिया व कमलेश चैधरी की कविताएं प्रकाशित की गई हैं। अजय कुलश्रेष्ठ का लेख, कमलेश् ा बख्शी, मालती कुशवाहा व नीति अग्रिहोत्री की कहानियां पत्रिका को व्यापक बनाती है। ब्रजकिशोर पटेल व अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं तथा अजय गंगराडे की रचना पत्रिका का अन्य आकर्षण है।
पत्रिका: प्रगति वार्ता, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: सच्चिदानंद, पृष्ठ: 60, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240 रू.), ई मेल: pragativarta@yahoo.co.in , फोन/मो. 06436.222467, सम्पर्क: प्रगति भवन, चैती दुर्गा स्थान, साहिबगंज 816.109 झारखण्ड

साहित्य चिंतन की प्रमुख पत्रिका प्रगति वार्ता का समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- गंगा और बनारस(अरविंद कुमार सिंह), लोक संस्कृति की लय है कजरी(कृष्ण कुमार यादव), आस्था-अनास्था(प्रभात दुबे) एवं सामाजिक चेतना के प्रबुद्ध(प्रो. यशवंत कुमार लक्ष्मण) शामिल हैं। व्यक्तित्व के अंतर्गत रामनिहाल गंुजन का लेख सर्वाधिक सुरूचिपूर्ण व पठनीय है। राम अधीर व देवेन्द्र कुमार देवेश की कविताएं अच्छी व समसामयिक हैं। यू.एस. तिवारी का संस्मरण मेरे गुरू हरिशंकर परसाई संस्मरण जैसा कहीं से नहीं लगता है। आज बहुत से लेखक व्यंग्य लिख रहे हैं। लेकिन पता नहीं उनके अनुसार व्यंग्य वे किसे मानते हैं? समझ से परे है। प्रगति वार्ता में भी जो व्यंग्य प्रकाशित किए गए हैं वे उस कोटि के व्यंग्य नहीं हैं जिन्हें अब तक पाठक पढ़ता रहा है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी ठीक ठाक हैं।
कर्नाटक में हिंदी के प्रति आम जन में रूची जाग्रत कर रही यह पत्रिका अब हिंदी साहित्य जगत की एक अग्रगामी पत्रिका बन गई है। इसका त्रुटिविहीन व साफ सुथरा मुद्रण आकर्षित करता है। समीक्षित अंक में आलेख - हिंदी राष्ट्र की भाषासेतु है(प्रभुलाल चैधरी), राष्ट्रभाषा का स्वाधीनता से संबंध(मित्रेश कुमार गुप्त), शताब्दी के आइने में हिंद स्वराज(गणेश गुप्त), भारत और वैश्विक सांस्कृतिक समीकरण(डा. अमर सिंह वधान), महान हिंदी सेवीःभारतेन्द्रु हरीशचंद्र(विनोद कुमार पाण्डेय) तथा साहित्यकार स्मृतिशेष कैसे बनते हैं?(प्रो. बी.वै. ललिताम्बा) पठनीय व शोध छात्रों के लिए उपयोगी हैं। जसविंदर शर्मा की कहानी, बी. गोविंद शैनाय की लघुकथाओं में ताजगी है। श्याम गुप्त एवं लालता प्रसाद मिश्र की कविताओं को अच्छी कविताओं मंे शामिल किया जा सकता है।

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: सितम्बर2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com,सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घौड़ा चैकी, शिमला 5 हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश की खुबसूरत वादियों से निकली साहित्य की बयार को देश भर में महसूस करा रही यह पत्रिका केवल 5 रू. में उपलब्ध है। आज महंगाई के समय में इतनी कम कीमत में उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध कराना साहसिक कदम है। फिर भले ही वह हिमप्रस्थ जैसी शासकीय पत्रिका ही क्यों न हो। समीक्षित अंक में विष्णु प्रभाकर का उपन्यास अर्द्धनारीश्वर(राम निहाल गुंजन), चम्बा की रानी सुनयना और ढोलक गायन(ब्रहमदत्त शर्मा), सुनीता जैन की कहानियों में नारी स्वरूप(योगिता चैहान) एवं जगदीश चन्द्र के उपन्यासों में दलित वर्ग का स्वरूप आलेख प्रभावित करते हैं। पवन चैहान की कहानी ‘इंतजार’ ठीक ठाक है। योगेन्द्र शर्मा की कहानी ‘मास्टर जी’ में कहीं कहीं अनावश्यक विस्तार हो गया है जो कथारस लेने मंे बाधा बनता है। पंकज शर्मा व जोगेश्वरी संधीर की लघुकथाएं अच्छी व समयानुकूल हैं। अरविंद ठाकुर, स्नेहलता, रामचंद्र सोलंकी व पियूष गुलेरी की कविताएं उल्लेखनी हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पठनीय व विचार योग्य हैं।

पत्रिका: हंस, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजेन्द्र यादव, पृष्ठ: 96, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल: editorhans@gmail.com , वेबसाईट: http://www.hansmonthly.in/ , फोन/मो. 011.41050647, सम्पर्क: अक्षर प्रकाशन प्रा. लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज नई दिल्ली 02
कथा प्रधान मासिक हंस के समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में से कुछ आज के वातावरण व युवा पीढ़ी की सोच पर सटीक बैठती हैं। रेडियो(रामधारी सिंह दिवाकर), बस एक कदम(जकीय जुबेरी), मुक्ति(नीलेन्दु सेन), फटी हुई बनियान(भवानी सिंह), उपकथा(दीपक शर्मा) तथा पहाड़े पहाड़े प्रेम के पत्थर(प्रमोद सिंह) की कहानियों में यह सोच दिखाई देती है। भोलानाथ कुशवाहा, सुहेल अख्तर, उपेन्द्र कुमार की कविताएं सार्थक रचनाएं हैं। शमशेर जी पर आलेख पढ़कर लगा कि लेखक ने केवल शमशेर बहादुर के समग्र का सतही तौर पर अध्ययन कर लेख लिख डाला है। अशोक अंजुम तथा डाॅ. ओम प्रभाकर की ग़ज़लें प्रभावशाली हैं। बहुत दिनों बाद हंस में अच्छा गीत (मदन केवलिया का गीत) पढ़ने में आया है। गंगा शरण शर्मा के हाइकू गीत भी ठीक ठाक हैं। पत्रिका की सबसे बेकार व प्रभावहीन रचना ‘‘कालम जिन्होंने मुझे बिगाड़ा’’ के अतंर्गत प्रकाशित की गई है। मंजरी श्रीवास्तव(मैं पैदाईशी बिगडैल हूं) पढ़कर लगता हैै कि हम सत्यकथा या मनोहर कहानियां पढ़ रहे हैं। हंस का अपना एक स्तर है, आज इस पत्रिका को विश्व स्तर पर हिंदी साहित्य की प्रमुख पत्रिका माना जाता है। इसमें इस तरह के तर्कहीन, गैर साहित्यिक लेख प्रकाशित करने का कोई मतलब नहीं है। वहीं दूसरी ओर अब साहित्यिक पत्रिकाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इस स्थिति में दुनिया भर के लोग हिंदी साहित्य ये जुड़ रहे हैं। जब वे हंस में इस तरह की रचनाएं पढ़ेंगे तो हिंदी साहित्य के बारे मंे किस तरह की धारणाएं बनायेंगे यह सोचने वाली बात है। शीबा असलम फहमी ने बहुत दिन बाद विवादों से परे हटकर अपनी बात कहने के लिए एक गंभीर व सार्थक विषय चुना है इसके लिए वे बधाई की पात्र है। बीच बहस में के अंतर्गत प्रकाशित लेखों में केवल ‘‘मुझे इन प्रेतों से बचाओ’’’(विश्वनाथ) ही अच्छा व सारगर्भित है। हमेशा की तरह भारत भारद्वाज ने अपने स्तंभ के साथ पूरा पूरा न्याय किया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्तंभ, समाचार आदि समयानुकूल व पठनीय हैं।



 "समकालीन अभिव्यक्ति"


पत्रिका : समकालीन अभिव्यक्ति, अंक : अप्रैलसितम्बर 2010, स्वरूप : त्रैमासिक, संपादक : उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ : 64, मूल्य : 15रू.(वार्षिक 50 रू.),फोन/मो. 011.26645001, सम्पर्क : फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली 30
पत्रिका समकालीन अभिव्यक्ति का समीक्षित अंक में कई पाठकोपयोगी रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित कहानियों में मेमना से मेमना सिंह(कुंवर पे्रमिल), डोली(अखिलेश निगम) तथा उससे उस तक(संतोष माझी) प्रमुख हैं। प्रो. वंशीधर त्रिपाठी, कैलाश चंद्र भाटिया व आकांक्षा यादव के लेख नवीनता लिए हुए हैं। डॉ. गंगाप्रसार वरसैया का व्यंग्य, अनिल डबराल का आलेख प्रस्तर पर बिखरा सौन्दर्य तथा बुद्धिप्रकाश कोटनाला का यात्रा वृतांत अच्छी रचनाएं कही जा सकती हैं। राग तेलंग, अशोक अंजुम तथा तेजराम शर्मा की कविताओं को छोड़कर अन्य कविताएं प्रभावहीन हैं। रामशांकर चंचल की लघुकथा ॔आदमी की नियत’ को छोड़कर अन्य लघुकथाएं महज चुटकुलेबाजी ही लगती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी अपनी उपयोगिता सिद्ध करने में काफी हद तक सफल रहे हैं।


 ‘मित्र’-इप्टा वार्ता

पत्रिका: इप्टा वार्ता, अंक: अप्रैल2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: हिमांशु राय, पृष्ठ: 08, मूल्य: उपलब्ध नहीं , ई मेल: iptavarta@rediffmail.com , ब्लाग: http://iptavarta.blogspot.com/ , फोन/मो. 0761.2417711, सम्पर्क: पी.डी. 4, परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर जबलपुर 02, म.प्र.

मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाली यह कला जगत की महत्वपूर्ण समाचार पत्रिका है। समीक्षित अंक में मुख पृष्ठ पर समाचार ‘असली चिंता को परिभाषित करता है मित्र’ समाचार ‘मित्र’ नाटक की गहन व्याख्या करता है। अगले समाचार के रूप मंे ख्यात रंगकर्मी रेखा जी द्वारा बच्चों के बीच गुजारे गए समय का समाचार उनके मिलनसारिता व सहृदयता से परिचय कराता है। संपादक हिमांशु राय का लेख इप्टा का शुरूआती साथी चला गया इप्टा संस्था की गतिविधियों व उसके परिवार से परिचय कराता है। रेखा जैन से उषा आठवले की बातचीत कला जगत में उनके योगदान के बारे में अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदान करती है। अन्य समाचारों में ‘इप्टा में रहकर सीखा अनुशासन, लगन और डिवोशन’ तथा ‘रंगआधारः भोपाल का ग्यारहवां नाट्य समारोह’ पठनीय व जानकारी परक हैं।
पत्रिका: पंजाबी संस्कृति, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: डा. राम आहूजा, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू.(.वार्षिक 80रू.),फोन/मो. 0124.2582115, सम्पर्क: एन 115, साउथ सिटी, गुड़गांव 122.001 हरियाणा

साहित्यिक पत्रिका पंजाबी संस्कृति के समीक्षित अंक में कुछ अच्छी व संग्रह योग्य रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं - संतोष(ओमप्रकाश बजाज), कहानी रक्षा कवच(जसविंदर सिंह विरदी), खुशियों वाली नदी(श्याम झंवर श्याम) शामिल हैं। मुकेश शर्मा, महेश राजा व प्रो. शामलाल कौशल की लघुकथाएं भी अच्छी हैं। पुरूषोत्तम यकीन, विनोद शर्मा, सुकीर्ति भटनागर एवं कुंदन सिंह सजल की कविताएं समसामयिक विषयों पर लिखी गई अच्छी कविताएं हैं। पत्रिका का सिरायकी खण्ड भी प्रभावित करता है।


समीक्षक अखिलेश शुक्ल 
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