डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘नन्द’ की नवीनतम रचनाएं - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

नवीनतम रचना

डॉ0 महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘नन्द’ की नवीनतम रचनाएं

तब और अब
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ, जिसको हमने अपनाया है।
अपनी संस्कृति को त्याग त्याग, फिर गीत उन्ही का गाया है।।
चाय काफिया काफी को, छोड़ा उन लोगो ने लाकर।
हमने फिर ग्रहण किया उसको, उनका सहयोग सदा पाकर।
अमृत सम दुग्ध धरित्री से, जाने का गीत सुनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।1।।
पहले कपड़े सम्पूर्ण अंग को, भर शृंगार कर देता था।
जब अंगराग से पूरित तन, मन में उमंग भर देता था।
मृदु महक धरा से दूर हुयी, परफ्यूम ने धूम मचाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।2।।
जनक पिता बापू कहते, सन्तोष बहुत मिल जाता था।
भैया चाचा दीदी बेटी, सुनने से दिल खिल जाता था।
पापा कहने से मिटा लिपिस्टिक जब, डैडी का चलन बढ़ाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।3।।
धोती कुर्ता रमणीय वेष, खद्दर की टोपी दूर हुयी।
डिस्को क्लब सिगरेट चषक, की भार बहुत भरपूर हुयी।
कटपीस के कटे ब्लाउज ने, भारत में आग लगाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।4।।
बच्चा पैदा होते ही अब, अंग्रेजी मे ही रोता है।
ए बी सी डी को सीख सीख, हिन्दी की गति को खोता है।
सब छोड़ संस्कृति देवों की, दानव प्रवृत्ति अपनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।5।।
थे राम कृष्ण अवतार लिये, यह बात बताया भारत में।
चैत्र मास से ऋषियों ने, नव वर्ष चलाया भारत में।
चले गये अंग्रेज मगर, अंग्रेजी नव वर्ष मनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।6।।
काल खोलकर मुँह बैठा, पर हैप्पी बर्थ मनाते है।
मन मन्दिर में जो प्रेम छिपा, आई लव यू कह कर गाते है।
सम्पूर्ण नग्नता छाने को, यह पाँप का म्यूजिक आया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।7।।
हिमालय
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।
तुम हो मेरे प्राण हृदय सब,
कभी नही थे निर्दय तुम जब,
हरित भरित है रत्नालंकृत, पूरी बसुधा सेज तुम्हारा।
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।।1।।
शुभ्र श्वेत उत्तुंगावस्थित,
समयासम अरू विषम परिस्थिति,
शीत उष्ण वारिद से संयुक्त, नही रहा परहेज तुम्हारा।
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।।2।।
    हृदय टूटता मन गल जाता,
व्यथित जनों से तन जल जाता,
भयाकान्त हो सिसक सिसक कर, नमन करे परवेज तुम्हारा।
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।।3।।

छात्र जीवन
छात्र जीवन है प्यारा सदा से रहा,
छात्र बचपन का जीवन सदा ही रहे।
छात्र जीवन के सुख का बयां क्या करे,
छात्र जीवन की बातें हम कितनी कहे।।1।।
साथ ककड़ी चुराना औ संग आम को,
देखा पिटते हुए मैने जब श्याम को।
सायकिल सीने के ऊपर चढ़ी जब गिरे,
और लगाते हुए जन सदा कहकहे।।2।।
था जवानी का आलम बदन खुशनुमा,
थे पहाड़े में पढ़ते मुहॅं चुम्मी चुम्मा।
कितने डण्डे गिरे पर न थी होश तब,
जाने कितने से मोती से ऑंसू बहे।।3।।
खेलते थे सदा प्यार से खेल हम,
तब सताते नही थे हमे कोई गम।
अब तो खुशियॉं न जाने कहॉं मिट गयी,
दिल के अरमान बेबस है लुटते रहे।।4।।

विरही

नेह विरही सो रहा था, हॅस रहा था रो रहा था।
अकथ कथा पर्यक सूना,
था वियोगी अनल दूना।
नीख प्रकृति मे दूध सा शशि, रयनि अंगनि धो रहा था।
नेह विरही सो रहा था, हॅस रहा था रो रहा था।।1।।
तत्काल आ वह कौन प्रेयसि,
मिल गयी उर्वसि रुपसि।
मिलत युग हिय प्रीति का रस, पुनि प्रवाहित हो रहा था।
नेह विरही सो रहा था, हॅस रहा था रो रहा था।।2।।
था क्षणिक अभिसार उसका,
कब हुआ संसार किसका।
नींद टूटी विरह जागा, प्रणय हॅस कर रो रहा था।
नेह विरही सो रहा था, हॅस रहा था रो रहा था।।3।।

स्वार्थी
छोड़ो आस मधुप मधु रस का,
सूख गया पुष्पित अन्तस्तल।
सूख गयी कलिका भी उर की,
बन्द हुए दृग संपुट अविरल।।1।।
पावस आस लगाकर बैठा,
आयेगा प्रियतम मधुमास।
मन्द पवन छेडे़गा सरगम,
मिलन करेगा मधुरिम हास।।2।।
व्यर्थ सोचता है मन मे यह,
क्योंकि सब जीवन का सपना।
मघु मरन्द रस ले लेता है,
अली हुआ कब कली का अपना।।3।।
निज स्वारथ के वशीभूत हो,
अली नाचते है मतवाले।
कली समझकर अपना उनको,
बॉहों मे निज बाहे डाले।।4।।
यौवन रस ले लेता अलि,
उड़ा उड़ा कहीं दूर चला।
उस निरीह नीरस कलिका के।
अन्तस्तल में व्यथा पला।।5।।




रा0 इ0 का0 द्वाराहाट अल्मोड़ा,09410161626, e-mail - mp_pandey123@yahoo.co.in

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर कविताये, छात्र जीवन कविता ने गुजरे वक्त की सैर करा दी

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