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अशोक जमनानी की ग़ज़ल:-'यादों को ना मिटाना'

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, नवंबर 16, 2010 | मंगलवार, नवंबर 16, 2010

यादों को ना मिटाना ये धूल पुरानी है 
जमते जमते जैसे ये जिस्म हो गयी है

दस्तक यहां न देना दरवाजे हैं पुराने 
ख़ामोशी जैसे इनकी तकदीर हो गयी है

कैसे मिलें किसी से सोए नहीं हैं कब से
ख़्वाबों की बस्तियां भी वीरान हो गयीं हैं

कुछ बोलने से पहले ये बात याद रखना
सच झूठ की मुझे अब पहचान हो गयी है

- अशोक जमनानी की बाकी की ग़ज़ल पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करिएगा.
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