रिजवान चंचल की एक कविता - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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रिजवान चंचल की एक कविता

कवि के दिल का दर्द ही तो कविता होती है
हर दर्दे दिल का दर्पण कविता होती है
          दर्द बयां ये कर देती है
         शब्द-शब्द यह गह लेती है।
जन्म ये लेती है विपदा से
          कविता है अनमोल सदा से
कंटक हों जिस राह वहॉ भी चल देती है
कवि के दिल का दर्द ही तो कविता होती है।
           पत्थर को ये मोम बनाये
           यम से भी ये टकरा जाये
ये जागे और दुनिया सोये
सागर में मोती ये बोये
          नभ के तारे भी चंचल ये गिन लेती है
          कवि के दिल का दर्द ही तो कविता होती है।

   कोठी न0 - 1 खंदारीलेन   लालबाग  लखनऊ
   सम्पर्क-09450449753
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