अशोक जमनानी की ग़ज़ल - उड़ा हुआ रंग - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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अशोक जमनानी की ग़ज़ल - उड़ा हुआ रंग


दीवारों का उड़ा हुआ रंग कितना अच्छा लगता है
जब तुम पास नहीं होते तो अपने जैसा लगता है

कई दिनों के बाद रात भर नींद ही आयी याद नहीं
कभी कभी तन्हा रातों से मिलकर अच्छा लगता है

गिरता है घर लेकिन वो तो अब भी उसमें रहता है
बचपन का दरिया जैसे बूढ़े दिल में भी बहता है

खाली खाली नहीं है ये मेरा खाली ज़ेबों वाला घर
हर सिक्का आकर मेरे दिल के दर सज़दा करता है 

अशोक जमनानी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के वासी है,साथ ही  पिछले सालों में अपने तीन उपन्यासों के तीन-चार संस्करण निकलने और लगातार बढ़ते पाठकों के चलते अच्छे लोकप्रिय हुए हैं.बहुत जल्द उनका एक ''सिंधी कविता संग्रह ''  और एक नया उपन्यास ''छपाक-छपाक'' आने वाला है.वे यदा कदा कविता भी करते हैं.जिन्हें उनकी वेबसाईट अशोकजमनानी.कोम  पर पढ़ा जा सकता है.उनकी दूजी ग़ज़लों को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें-सम्पादक 

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