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अशोक जमनानी की ग़ज़ल - उड़ा हुआ रंग

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, नवंबर 21, 2010 | रविवार, नवंबर 21, 2010


दीवारों का उड़ा हुआ रंग कितना अच्छा लगता है
जब तुम पास नहीं होते तो अपने जैसा लगता है

कई दिनों के बाद रात भर नींद ही आयी याद नहीं
कभी कभी तन्हा रातों से मिलकर अच्छा लगता है

गिरता है घर लेकिन वो तो अब भी उसमें रहता है
बचपन का दरिया जैसे बूढ़े दिल में भी बहता है

खाली खाली नहीं है ये मेरा खाली ज़ेबों वाला घर
हर सिक्का आकर मेरे दिल के दर सज़दा करता है 

अशोक जमनानी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के वासी है,साथ ही  पिछले सालों में अपने तीन उपन्यासों के तीन-चार संस्करण निकलने और लगातार बढ़ते पाठकों के चलते अच्छे लोकप्रिय हुए हैं.बहुत जल्द उनका एक ''सिंधी कविता संग्रह ''  और एक नया उपन्यास ''छपाक-छपाक'' आने वाला है.वे यदा कदा कविता भी करते हैं.जिन्हें उनकी वेबसाईट अशोकजमनानी.कोम  पर पढ़ा जा सकता है.उनकी दूजी ग़ज़लों को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें-सम्पादक 
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