''पॉलीथीन हटाएं पर्यावरण बचाए'':-दिव्या जैन - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''पॉलीथीन हटाएं पर्यावरण बचाए'':-दिव्या जैन

    प्यारे देशवासियों, पर्यावरण प्रेमियो , गौ भक्तों को दिव्या जैन का जय जिनेन्द्र मैं इस पत्र के माध्यम से समस्त भारतवासियों का ध्यान आकृष्ठ कर उनको सम्पूर्ण देश के लिए, देश के पर्यावरण के लिए व गाय माता के लिए नुकसान का कारण बन रहे पॉलीथीन की थैलियों की तरफ ले जाना चाह रही हूँ । यह में इसलिए कर रही हूँ  कि मेंने पॉलीथीन से हुए नुकसान को नजदिक से देखा है।

    विज्ञान ने मानव को प्रगति के पथ पर आगे बढने के असीम अवसर दिए है, लैकिन मनुष्य ने बिना कुछ सोचे समझे ही विज्ञान के माध्यम से रोजमर्रा के कुछ ऐसे साधन पैदा कर दिए है जो मनुष्य के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक सिद्ध हो रहे है । 
उनमें से एक है-पॉलीथीन


पॉलीथीन कागज, कपडे या गत्ते की तरह गलता नही है । आज पॉलीथीन ने मानव जीवन में अच्छी खासी पैठ बना ली है, या यो कहें कि इसने हमें अपना गुलाम बना लिया है । व्यावसायिक मार्केट हो या सब्जीमण्डी सभी के हाथों में पॉलीथीन की थैलिया नजर आ जाती है। आज लोग कपडे या जूट का थैला लेकर चलने में शर्म महसूस करते है और घर से बाजार हाथ हिलाते जाना पसन्द करते हैं।मैरे प्यारे देशवासियों ये पॉलीथीन की थैलिया हमारे लिए बहुत नुकसानदायक है । ये जमीन में जाकर उसके उपजाऊपन को नष्ट करती है। नदी नालों में जाकर उसके बहाव को रोककर गन्दगी व बिमारी का कारण बनती है कही बार महामारी का कारण भी बनती है । नदी, तालाब, नालों व धरती पर इसकी परत बिछ जाने से जमीन में जल नही जा पाता। ये पेड पौधो को पनपने नही देती है। जहॉ जमीन को खोदकर देखोगे वहॉ पॉलीथीन की थैलियॉ ही थैलिया मिलेगी क्योकि यह गलती नही है । वस जमती ही जाती है । इसे जलाने पर विषाक्त गैसे पैदा होती है जो पर्यावरण के साथ-साथ मनुष्य के लिए भी खतरनाक है । पॉलीस्टरीन नामक प्लास्टिक को जलाने से क्लोरोफलोरो कार्बन बाहर आते है, जो जीवन रक्षक औजोन कवच को नष्ट कर देते है।
 
इससे सीवन लाईन चोक की घटना भी हुई है। सन् 1998 में मुम्बई में सीवर नेटवर्क चोक हेा गया , और  कृतिम बाढ का रूप धारण कर लिया था जो सिर्फ पॉलीथीन थैलियों के कारण हुआ।मैने स्वयं पॉलीथीन के नुकसान को देखा है, आज से दो वर्ष पूर्व जब मैं अपने ननिहाल व दादाजी के घर (कोटा) गर्मियो की छुट्टियों में गई थी, तब मुझे वहॉ एक मृत गाय के विषय में पता चला बाद में यह भी पता चला कि उस गाय की मृत्यु पॉलीथीन की थैलियों से हुई है, तो मैं हैरान रह गई कि पोलिथीन इतना नुकसानदायक भी हो सकती है। मुझे इससे बहुत दुःख पहुॅचा, मेरे लिए यह असहनीय रहा लेकिन प्रेरणा का कारण भी रहा।

दरअसल होता यह है कि गृहणियॉ (माताए-बहन्रे) पॉलीथीन की थैलियों को उपयोग के बाद इसमें घर का कूडा करकट कची हुई सब्जियॉ बचा हुआ अन्न व अन्य खादय सामग्री भर कर इसमें गांठ लगाकर खुले में सडक पर, नालियों में या कचरे के ढेर में फंेक देती है। आम आदमी भी उपयोग के बाद मेंयहॉ वहॉ फेक देता है। बात यही समाप्त नही होती बल्कि प्रारम्भ होती है। खुले धूमते मवेशी विशेषकर गाय जिसे हम माता या यों कहे कि माता से भी बढकर मानते है वे भोजन की खुश्बू से आकृर्षित होती है। वो थेली की गांठ को ,खोलना चाहती है लेकिन खोल नही पाती है अन्त में वह भोजन सामग्री को थेली समेत खा जाती है । पशुओ के पेट में धीरे-धीरे यह थैलिया जमा होती जाती है क्योकि पॉलीथीन का किसी तरह पाचन सम्भव नही है अतः अधिक मात्रा में पेट में जमा पॉलीथीन पशुओ के शरीर में बिमारिया पैदा कर देती है पशुओ  का हाजमा खराब कर देती है और पशुओ को मौत की नींद सोना पडता है। कितनी खतरनाक मौत होती है  यह या तो वह निरिह पशु ही जानता है या जिसने...............
 
पशु चिकित्सकों के सामने यह समस्या रहती है कि कोई भी ऐसी दवाई नही है जो पशुअेां के पेट में जमा पोलीथीन को पचा सके या बाहर निकाल सेक। पॉलीथीन पशुओं के लिए चलता फिरता कत्लखाना है और लोग बेखबर होकर मवेशियों को मौत के मुंह  में भेज रहे है।

यहॉ में आपको बताना चांहूगी कि अगर पॉलिथीन या कचरा निकालने के लिए पशुओं का ऑपरेशन कराया जाए तो उसमें बहुत अधिक खर्चा आता है तथा 3 घण्टे से भी अधिक समय लगता हे  साथ ही उसे ठीक होने में लगभग 45 दिन लगते है । ऐसा कौन व्यक्ति है जो यह सब कुछ कर सके। मजबूरन पशु को ..........
मै यहॉ सीधे-सीधे कहूंगी कि लोग गायों के नाम पर बडे-बडे कार्य करते है, कोई  परीक्षा आयोजित करता है , कोई कानुन बनाने की बात करता है, कोई रैली निकालता है। यह सब करे अच्छी बात है इससे चेतना आती है  , पर क्या यह हमारा दायित्व नही है कि हम गायों की मौत का कारण बन रहे पॉलीथीन की थेलियों के उपयोग को बन्द कर कर दे  पॉलीथीन को खुले में नही फेंके उसमें भोजन सामग्री बांध कर नही फेके अगर ऐसा हाता हे तो यह हमारा इन सब पर बहुत बडा उपकार होगा।
इस विषय में सरकार कानून बना दे तो भी हममे स्वयं में भी जागरूकता आना जरूरी है  हम डर से नही बल्कि विवेक के आधार पर इनकी पालना करै।मै आप सब से यह निवेदन करती हूॅ कि आप सब पॉलीथीन के दुष्प्रभाव केा समझे और इसके उपयोग को बन्द करे, इसके स्थान पर कागज या कपडे के बने हुए बेग को उपयोग में लेकर पर्यावरण संरक्षण में भागीदार बने और ऐसा करने में शर्म नहीं बल्कि गर्व का अनुभव करे। इसे अपनी परम्परा व संस्कृति का हिस्सा माने।
 
अव जब मैं निवेदन कर ही रही हूॅ तो थोडी बात और करते है। हम पॉलीथीन की थैलियों की बात कर रहे थै। अब मैं  प्लास्टिक के बने खिलौनो की बात करती हॅू। ‘‘सैंटर फॉर संाइस एण्ड एनवायरमेंट‘‘ (सी.एस.ई.) का ताजा अध्ययन बताता है कि भारतीय बाजार में बिक रहे अधिकांश खिलौनो में थैलेट नामक रसायन पाया जाता है । सी. एस.ई. ने  प्रमुख ब्राडस के 24 खिलौना की नमूना जॉच कराई इसमे 15 सॉफट टॉयज व 9 हार्ड टॉचज थै। जॉच में सामने आया कि सभी में एक या एक से अधिक तरह के थैलेट्स नामक रसायन थै जो कि किसी न किसी तरह से छोटे-छोटे बच्चों में अनेक तरह की बिमारियों का कारण बन रहे है, जिसमें अस्थमा, गुर्दा, एलर्जी, प्रजनन सम्बन्धी बिमारियॉ प्रमुख है। इन सब को बताने के पीछे मेरा मकसद यह है कि हम पॉलीथीन व प्लास्टिक के दूष्प्रभाव को समझे ।हम सस्ते, सुन्दर व सुलभ के चक्कर मेंइनकों उपयोग में ले लेकर स्वंय के साथ-साथ सम्पूर्ण देश के पर्यावरण को भी नुकसान पॅहचा रहे है। आओ अब हम आज से ही नर्ह शुरूवात करें, जगें व जगॉए। अभी नही तों कभी नहीं, कागज व कपडे की सस्ंकति की तरफ पुनः लौटे और ऐसा करने में गर्व का अनुभव करे। मैं तो यह भी कहुॅगी कि सरकार को तुरन्त नियम बनाना चाहिए कि प्रत्येक कर्मचारी रोजाना हाथ में कपडे का थेला लेकर कार्यालय व बाजार में जाए और उसपर यह भी लिखवाए कि-‘‘ पॉलीथीन पर्यावरण का शत्रु है।‘‘
 

मैने ऐसा किया आप भी करे क्योंकि यह हम सब का दायित्व भी है। हम जिस धरती पर रहते है उसके प्रति. हमारी भी कुछ ...........
मैं अन्त में यह भी कहूंगी कि हमने अब तक पौलीथीन की थैलियों को उपयोग में लेकर पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया उस गलती को सुधारे ओर उसके लिए वृक्षारोपण करें मात्र पौधे ही नहीं लगाए बल्कि उसकी रक्षा का भी संकल्प ले, उसे पुत्र के समान पाले, बडा करें बाद में वह पौधा बडा वृक्ष बनकर हमें व हमारी पीढियों इतना कुछ देगा जिसकी हमने कल्पना भी नही की होगी।

                आओ-आओं हम पेड लगांए
                        छोटा नन्हा पेड लगाए
                अखबारों में नही जमीन पर लगाए
                        छोटा नन्हा पेड लगाए
                ळजारो नही सिर्फ एक पेड लगाए
                        छोटा नन्हा पेड लगाए
                रिकार्ड के लिए नही हमारे स्वयं के लिए
                        छोटा नन्हा पेड लगाए

    दिव्या जैन    
 मो. न. 9214963491 
 59/4 गांधीनगर, चित्तौडगढ पिन कोड न. 312001
   

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