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रिज़वान चंचल की एक तुकांत मगर भावपूर्ण कविता

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, नवंबर 26, 2010 | शुक्रवार, नवंबर 26, 2010

गर्भ में चीख पड़ी लाचार 
देखकर खंजर की वो धार
रूह भी कांप गई उसकी
 रो पड़ी ले ले के सिसकी
       जुटा कर साहस वो बोली
 न चाहूं सजना न डोली
       न हम पे खंजर ये तानो 
मेरी पीड़ा को पहचानों
करूंगी बढ़-चढ़ कर हर काज 
सभी को होगा हम पर नाज
रहूंगी सदा आत्म निर्भर 
करूंगी सेवा जीवन भर
       रोक लो हाथ बढ़ रहा है
 पास खंजर आ रहा है
       खड़े हो हे पापा क्यों चुप 
ये खंजर कहीं न जाये घुप
हूँ जीना चाहती मैं भी हूँ 
 बेटों की जैसी बेटी
बचा लो मुझे बचा लो तुम
 मूर्छित मम्मी भी गुम सुम
       हुआ खंजर का तब तक वार
 रक्त रंजित हुई लाचार
हिचकियां लेकर वो बोली
 सजा दी गर्भ में डोली
बिगाड़ा मैने किसका क्या
 मिला चंचल सिला जिसका।


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