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आयोजन रपट:-''हिन्दी में एक ही कृति के कई अनुवादों की स्थिति शिथिल है''-अशोक वाजपेयी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, नवंबर 30, 2010 | मंगलवार, नवंबर 30, 2010

साहित्य अकादेमी सभागार, नई दिल्ली
29 नवंबर 2010

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150 वें जयंती वर्ष में उनकी नोबेल पुरस्कार प्राप्त कृति ‘गीतांजलि’ की प्रकाशन शतवार्षिकी के अवसर पर विजया बुक्स, नई दिल्ली द्वारा ‘गीतांजलि के हिन्दी अनुवाद’ शीर्षक से एक आलोचना पुस्तक प्रकाशित की गई है, जिसका लोकार्पण हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि-आलोचक और ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष श्री अशोक वाजपेयी द्वारा किया गया। इस अवसर पर ‘गीतांजलि’ के दो हिन्दी अनुवादक-श्री प्रयाग शुक्ल और डॉ. रणजीत साहा भी उपस्थित थे। पुस्तक के लेखक श्री देवेन्द्र कुमार देवेश हिन्दी के युवा कवि, संपादक एवं आलोचक हैं, जिन्होंने पुस्तक में विभिन्न अनुवादकों द्वारा प्रस्तुत ‘गीतांजलि’ के तीन दर्जन से भी अधिक हिन्दी अनुवादों का सम्यक् परिचय और तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। लोकार्पण के अवसर पर श्री देवेश ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि इस पुस्तक में ‘गीतांजलि’ के अंग्रेजी अनुवाद संबंधी विवाद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के अनुवाद संबंधी विचार, ‘गीतांजलि’ के हिन्दी अनुवाद संबंधी समस्याएँ विषयक विमर्श के साथ-साथ मैंने ‘गीतांजलि’ के बांग्ला एवं अंग्रेजी पाठों पर तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया है।
देवेन्द्र देवेश 

अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री अशोक वाजपेयी ने कहा कि हिन्दी में एक ही कृति के कई अनुवादों की स्थिति शिथिल है, इसलिए मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य है कि ‘गीतांजलि’ के तीन दर्जन से भी अधिक अनुवाद हुए हैं। वास्तव में अनुवादक का काम ‘निराशा का कर्तव्य’ है और यह दुर्भाग्य की बात है कि साहित्य अकादेमी के प्रयत्नों के बावजूद अनुवाद को समुचित प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त है। उन्होंने देवेश को उनके कार्य के लिए बधाई दी और कहा कि ऐसे शोधग्रंथ बहुत कम लिखे गए हैं। ‘गीतांजलि’ के अनुवादों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि ‘गीतांजलि’ का छंदबद्ध अनुवाद करने की कोशिश व्यर्थ है, क्योंकि यह गद्यधर्मी कविता का युग है और इसलिए ‘गीतांजलि’ का सर्वप्रिय अनुवाद वही होगा, जो अपने को ‘गीतांजलि’ की छंदबद्ध अनिवार्यता से मुक्त रखेगा।

श्री प्रयाग शुक्ल ने कहा कि ‘गीतांजलि’ पर एक साथ इतनी सारी जानकारियाँ उपलब्ध करानेवाली यह अकेली पुस्तक है। मुझे लगता है कि ‘गीतांजलि’ के सौ-दो सौ अनुवाद अभी और होंगे, तब जाकर शायद कहीं कोई संतोषकारी अनुवाद हमें प्राप्त हो सकेगा। डॉ. रणजीत साहा ने कहा कि यह पुस्तक तुलनात्मक अनुवाद पद्धति पर व्यवस्थित चिंतन प्रस्तुत करती है। उन्होंने बांग्ला से हिन्दी अनुवाद की समस्याओं पर व्यावहारिक टिप्पणियाँ भी प्रस्तुत कीं। प्रतिष्ठित कवि-आलोचक डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने कहा कि भारतीय भाषाओं के अनुवाद विमर्श के लिए यह एक निर्णायक पुस्तक है और शोधग्रंथ के रूप में भारतीय विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन के लिए इसे आदर्श एवं आधारग्रंथ के रूप में अपनाया जाना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन डॉ.शशिप्रकाश चौधरी ने किया, जो स्वयं भी ‘गीतांजलि’ के हिन्दी अनुवादों के गहन अध्येता रहे हैं। धन्यवाद ज्ञापन विजया बुक्स के स्वामी श्री राजीव शर्मा ने किया।
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1 टिप्पणी:

  1. देवेश भाई को हार्दिक बधाई..। देवेश जी सह्रदय लेखक हैं... कोसी क्षेत्र में भी उनके लिए अपार सम्मान है... वे लिखते रहें अनवरत यही कामना है.. पुनः आयोजन रपट प्रकाशित करने हेतु आपका भी आभार!

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