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रिजवान चंचल का आलेख:-''देश में समान शिक्षा प्रणाली की जरुरत''

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, नवंबर 16, 2010 | मंगलवार, नवंबर 16, 2010

(रिजवान का परिचय उन्हीं की ज़ुबानी :-कानपुर जिले के प्रतिष्ठित पठान परिवार में 20 अगस्त, 1971 को जन्म। चार भाइयों के बीच  सबसे छोटा। पिता के. खान आजादी के आंदोलन में सक्रिय रहे बाद में पुलिस विभाग में नौकरी की जिनका कि देहांत हो चुका है। प्राथमिक शिक्षा शिवराजपुर व कहिंजरी में एवं उच्च शिक्षा कानपुर स्थित नबाब गंज के वी एस एस डी  कालेज में हुई । छात्र समस्याओं को लेकर छात्र जीवन के दौरान विश्वविद्यालय में तेरह दिनों की भूख हड़ताल पर बैठा। विश्वविद्यालय ने काली सूची मे  नाम दर्ज कर  निष्काशित कर दिया बमुश्किल  पुनः डी ए वी कालेज में प्रवेश पाया.


 किसी भांति एलएल-बी तक शिक्षा हुई। विद्यार्थी जीवन से चंचल मन का लगाव लेखन में अधिक रहा । घर वालों के तमाम सुझावों के वावजूद जीविका के लिये पत्रकारिता का ही चुनाव किया । 23 वर्ष की आयु में ही दैनिक जागरण पत्र में बतौर प्रतिनिघि कार्य करने का अवसर मिला 2 साल गुजरते ही संवाददाता का कार्यदायित्व सौपा गया 6 साल तक दैनिक जागरण कानपुर में सेवा करने के उपरान्त लखनऊ स्वतंत्र भारत से जुड़ गया 3 साल तक स्वतंत्र भारत को सेवा देता रहा । वर्तमान मे रेड फाइल  हिन्दी पाक्षिक पत्र का प्रकाशन श्वयं कर रहा हूं तथा प्रदेश के विभिन्न लधु पत्र पत्रिकाओं का सम्पादन भी  कर रहा हूं। अब तक विभन्न समाजसेवी संगठनो एवं पत्रकार संगठनों द्वारा सम्मानित किया जा चुका हूं 


वर्तमान में भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ का राष्ट्रीय महासचिव एवं जनजागरण मीडिया मंच उ0 प्र0 का महासचिव  तथा वेसहारा सेवा संस्थान का सचिव भी हूं।  साहित्य क्षेत्र में भी हमेशा  सक्रियता बनी रही कई पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ पुस्तकें प्रकाशन हेतु प्रेस में हैं। समसायिक विषयों पर सात सौ दोहे के रूप मे लिखी गई ‘चंचल दोहावली’ और जनजागरण मीडिया मंच को सर्मिर्पत भ्रष्टाचार पर कलम की धार से द्यातक प्रहार करती ‘ ‘जागो भारत जागो’ दोनो पुस्तकें अगले माह सितम्बर तक पाठकों के बीच आने वाली है।-redfile.news@gmail.com) प्रस्तुत है आलेख 

हमारे देश में वजट का बड़ा हिस्सा शिक्षा की मद में खर्च किया जाता है वर्तमान में तो सरकारी स्कूलों में न केवल मुफ्त शिक्षा ही दी जा रही बल्कि भोजन, डेªस व किताबें भी बच्चों को निःशुल्क मुहैया कराई जा रही है। हर बच्चा हो साक्षर सरकार इस हेतु भी तरह-तरह के कदम भी उठा रही है। सर्व शिक्षा अभियान को भी जगह-जगह प्रभावी किया जा रहा है। इतना सब कुछ होने के बाद भी आम लोगों की अवधारणा अपने बच्चे को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की नही है आखिर क्यों?
      
शहरी इलाका हो या ग्रामीण , कान्वेन्ट स्कूलों की बाढ़ सी है, हो भी क्यों न! इनका धंधा जो चल पड़ा है। आज आम आदमी का विश्वास कान्वेन्ट स्कूलों के प्रति बढ़ा है एवं सरकारी स्कूलों से टूटा है। जरा विचार करें कान्वेन्ट स्कूल में शिक्षक व शिक्षिका वेतन पाते है हजार या दो हजार, वहीं सरकारी स्कूलों के शिक्षक शिक्षिका को मिलता है पन्द्रह से बीस हजार तक। सरकारी स्कूलों में शिक्षा निःशुल्क दिये जाने की व्यवस्था है कान्वेन्ट स्कूलों में प्रारम्भिक शिक्षा शुल्क ही पांच सौ से लेकर हजारों में है। सरकारी स्कूलों में छात्र-छात्राओं को दिया जा रहा है निःशुल्क यूनीफार्म और कान्वेन्ट स्कूलों में सशुल्क निर्धारित है , सरकारी स्कूलों में मुफ्त दी जा रही हैं कापी-किताबें, वहीं कान्वेन्ट स्कूलों में चलाई जा रही है मनचाहे पब्लिकेशन की मॅहगी किताबें, सरकारी स्कूलों में बच्चों को दिया जा रहा है मध्यान्ह भोजन, कान्वेन्ट स्कूलों में चलाई जा रहीं है सशुल्क कैण्टीनें यानी अभिभावकों की जेब ढ़ीली करने हेतु कान्वेन्ट स्कूलों को है पूरी आजादी और सरकारी स्कूलों पर सरकार करोड़ों का व्यय करके कर रही है पैसे की बरबादी। यही कारण है कि सरकारी स्कूलों मंे शहरी क्षेत्र की कौन कहे ग्रामीणांचलों के ग्रामीण भी अपने बच्चे को पढ़ाई हेतु भेजना बेहतर नहीं समझते। मेरा मानना है कि दोहरी शिक्षा प्रणाली को मान्यता ही नहीं देनी चाहिए एवं समान शिक्षा प्रणाली को लागू किया जाना चाहिए। देश में समान शिक्षा प्रणाली को लागू कर दिया जाये तो शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार संभव है। जरा विचार करें क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक-शिक्षिका अपने बच्चों को कान्वेन्ट स्कूलों में भेजते है  शासन-प्रशासन के नुमाइन्दों का कोई बच्चा सरकारी स्कूल में शिक्षा ग्रहण करता नहीं आखिर क्यों?
      
 इसी लिए क्यों कि ये सभी भलीभॉति जानते है कि सरकारी स्कूल मंे उसका बच्चा बेहतर शिक्षा नही पा सकता कहने का तात्पर्य यह है कि जनप्रतिनिधि, अधिकारी, कर्मचारी बखूबी यह जानते व समझते है बावजूद इसके शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं चाहते, मै तो कहता हूं कि इनके बच्चे ही यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ने लगे तो भी सुधार नजर आने लगेगा। सरकार को चाहिए कि शिक्षा प्रणाली मंे सुधार लाये जाने के लिए यह सुनिश्चित करे कि अधिकारी, कर्मचारी, एवं जनप्रतिनिधियों यानी शासक और प्रशासक जिनकोे कि सरकार वेतन मुहैया करा रही है अपने बच्चों की शिक्षा सरकारी स्कूलों में ही करवायें श्वयमेव बिगड़ी व्यवस्था में काफी सुधार आ जायेगा चूंकि जब डी0एम0 साहब का लाडला बी0एस0ए0 साहब की लाडली प्रधानाध्यापक का भतीजा शिक्षिका महोदया की बेटी सरकारी स्कूल में पढ़ रही होगी तो न ही मध्यान्ह भोजन में कीड़े निकलगें और न ही शिक्षक-शिक्षिकायें गोलबंद कुर्सिया लगाकर एक दूजे से चांेच लड़ायेेगें चूंकि इन्हें तब अपने बच्चों का भविष्य नजर आयेगा। हॉ इस प्रणाली में जहॉ सुधार जरूरी है वहीं हमें अपने गिरेवान को भी झॉकना है आज स्थित यह है कि ऐसे अभिभावक भले ही उनकी संख्या काफी कम है जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं वो ना तो कभी यह समझने की कोशिस करते है कि उनके बच्चे को कुछ आ रहा है या नहीं और न ही वो बच्चे की गतिविधियों को दृष्टिपात करते है सरकारी स्कूलों के अध्यापक-अध्यापिकाओं से मिलकर वो कभी यह भी जानने का प्रयास नहीं करते कि बच्चे को         पढ़ाया भी जा रहा है या नहीं। 
कहने का तात्पर्य है कि दोषी व्यवस्था को जानने के बावजूद अभिभावक न तो अध्यापक-अध्यापिकाओं की गति विधियों को दृष्टिपात करते है और न ही अपने बच्चे की। नतीजा यह निकलता है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक मनमानी रवौया अपनाते हैं और बच्चे भी पढ़ाई की ओर ध्यान नही लगाते। हमारा आपका यह दायित्व बनता है कि यदि बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाया जा रहा है तो यह भी समझें कि वह क्या पढ़ रहा है, स्कूल में पढ़ाई हो रही भी है या नहीं। अक्सर देखा गया है कि यदि वजीफा वितरण में स्कूल प्रबंधक लेट-लतीफी करता है तो अभिभावक वजीफा न दिये जाने के कारणों का पता लगाने तो पहुॅच जाता है पर उसके बच्चे को पढ़ाया जा रहा है या नहीं इसकी उन्हे परवाह नहीं रहती। खाशकर ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों का हाल ज्यादा खराब है यहॉ अध्यापक भी मनमाने समय से आते हैं कुछ तो हफतों नदारत रहते हैं और जब आते है तो पिछलेदिनों की हाजिरी भी रजिस्टर में दर्ज कर देते हैं इस हेतु प्रधानाध्यापक से लेकर सहायक अध्यापकों के बीच बेहतर सामजस्य बना होता है, ज्यादा दिनों के लिये छुट्टी मारनी होती है तो ये एक प्रार्थना पत्र आकस्मिक अवकास का बिना तारीख के बनाकर सहयोगी अध्यापक साथियों को थमा जाते हैं अचानक यदि कोई स्कूल का कोई अधिकारी औचक निरक्षण हेतु पहुंचता है तो स्कूल में उपस्थित अध्यापक उसके प्रार्थना पत्र पर उसी दिन की तारीख दर्ज करते हुए आकस्मिक अवकास पर गये होने की पुष्टि कर मामला हल कर लेते है। 
  
 अभिभावकों का भी दायित्व बनता है कि वो नही ज्यादा तो महीने में एक दो बार ही स्कूल पहुंचकर बच्चे की पढ़ाई व अध्यापको की लापरवाही पर अपनी प्रतिक्रिया करें जिससे अध्यापक-अध्यापिकाओं को भी यह महसूस हो सके कि यदि पढाईमें ध्यान न दिया गया तो अभिभावकों में आक्रोश फैलेगा और बच्चे को भी लगेगा कि अगर पढ़ाई मन लगाकर न की गई तो स्कूल व घर में उसे दण्डित किया जायेगा। अक्सर देखा गया है कि कान्वेन्ट स्कूल गार्जेसं मीटिंग करते रहते हेैं वहॉ अभिभावक पहुंचकर बच्चे की गतिविधियों से टीचरों को अवगत कराते रहते है साथ ही यदि बच्चा बढ़ाई में कमजोर है तो कान्वेन्ट स्कूल के अध्यापक अध्यापिकाओं  शिकायत भी दर्ज करते रहते है परिणाम  बेहतर ही होता है। और तो और यदि सरकार समान शिक्षा प्रणाली को प्रभावी कर दे तो कुकुरमुत्तों की तरह जगह-जगह कान्वेन्ट स्कूलों की जो  बाढ़ सी आ रही है उस पर भी विराम लगेगा। साथ ही सरकारी स्कूलों पर सरकार द्वारा खर्च किये जा रहे करोड़ों रूपये के व्यय की भी सार्थकता सामने आयेगी और कलुवा के बेटे  को भी वही शिक्षा दी जायेगी जो नेता जी के बेटे को व डी0एम0 साहब की लाडली को दी जायेगी। अब सवाल यह उठता है कि क्या शासक-प्रशासक वर्ग इस दोष पूर्ण शिक्षा प्रणाली में सुधार लाये जाने एवं दोहरी शिक्षा प्रणाली को ही खत्म कर समान शिक्षा प्रणाली लागू करने के लिए काई ठोस कदम उठायेगी भी या नहीं और यदि नहीं उठाती तो क्या हम यूं ही चुप्पी साधे बैठे रहेंगे हमें दोषपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठानी ही होगी।              

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