Latest Article :

माणिक की कविता:- महल का विराना

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, नवंबर 03, 2010 | बुधवार, नवंबर 03, 2010


कुछ देर रतनसिंह महल के झरोखे में 
बैठ आया सुकून के साथ
जी आया कुछ पल
भव्य लेकिन झर्झर इमारतें 
तैरती रही आँखों में देर तलक
शाम की मध्यम होती रोशनी
और मेरी युवा आंखों में बसे
अनगिनत सालों से बुढ़ाए झरोखे
कहीं से तालाब दिखता था
तो कोई हरियाली दिखाता
कहीं से ढ़लान दिखता था
 तो कोई पहुंचाता मेरी नज़र
 ऊंचे टीले की शिलाओं पर 
देखे बारामदे में कुछ थके हारे मज़दूर
दिन ढ़लने की खुशी साफ़ दिखती थी 
उनकी चमक वाली आँखों में 
देखा है वहीं
मजूरी पकने और चुल्हा जलने का आनंद 
दिहाड़ी के बाद घर को जाते जाते
चुन रही थी सुखी लकडियाँ 
कुछ एकदम घरेलू महिलाएं 
विराने में जीवन देखा उस सांझ 
देखी उबड़ खाबड़ पत्थरों से बनी
कुछ  मज़बूत दिवारें
उग आई थी जहां बैले और घासफूस  
घोखड़ों में बैठे उल्लू देखे मैंने
कमल खिलने वाले तालाबो में
था ज़मावड़ा अब नंगे पूंगे बच्चों का 
आहाते के खम्बों की सीध से आती नज़र
बगीचे में चरती भैसें
और पेड़ों पर उछलते लाल मुँही बन्दर 
सरल और निर्भीक जीवन
महल में देखा पहली बार
अब राजा रहा न कोई वहाँ
भ्रष्टाचार में डूबा दरबान भी नहीं
यहीं बने है कुछ छिटपुट मंदिर
अपनी टूटफूट का दर्द समेटती मूर्तियों वाले
 रूक रूक कर सांस लेते 
डरावना समय शायद जाता रहा 
भला सामंती दिवारें कब तक ऊंची रहती
गिरना तो था एक दिन
नियति को रोके कौन
कौन रोके चक्रवत चलता जीवन 
अब बकरियां तक लांघती और उजाड़ती है 
 महल का बचाकुचा बगीचा
जो जानता है सच्चाई सबकुछ
तब से लेकर अब तक की
अलविदा कहती दिखी 
दिनभर की धूप अब छतों के रास्ते 
चुपचाप जा रही थी 
किले के पीछे वाले दरवाज़े से 
गिलहरियाँ घरों की तरफ लौटती
दिखी और विचार और गहरे में
बैठते हुए महसूसे मैंने 
 दिन ढलने के साथ 
एकाएक आई नज़र 
सफ़ेद दिवारें 
ओढ़े हुए थी जो काले,पीले,मटमैले नाम
बेतरतीब तीर के निशान और 
दिल से लगते रेखाचित्र 
बनाएं हैं हमारे ही दिशाहीन मित्रों ने शायद
समझ अपनी बपौती कर गए दिवारें गंदी
दे गए सबूत अपने बिगड़ैल होने का  
भोर,दिन हो या सांझ
आदमी से ज्य़ादा सन्नाटा पसरता है वहाँ 
आज भी समाया है डर
वहाँ आए मुशाफिरों में
निकल ना पड़े कोई तलवार फिर से
चल पड़े ना कोई तोफ फिर से
हो जाए ना कोई फरमान जारी
जो फाड़ दे कान के पर्दे
यूं बयाँ करता दिखा 
महल का विराना
मैंने जितना समझा लिख डाला
बाकी बचा पढ़ लेना किसी
किसी किताब में
या आ जाना वक्त निकालकर
कभी महल के विराने में
 ढूंढेंगे साथ मिलकर जीवन की
 पड़ाव दर पड़ाव  बदलती परिभाषाएं  
(ये कविता चित्तौड़ दुर्ग के रतन सिंह महल में मेरे भ्रमण के दौरान उपजे विचारों पर आधारित है )  
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template