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निरंजन श्रोत्रिय की कविता ''अम्मा का बुद्धू-बक्सा ''

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, नवंबर 23, 2010 | मंगलवार, नवंबर 23, 2010

"यह टीवी नहीं
 बुद्धू-बक्सा है
 निगल गया है जो  हमारी सामाजिकता
 और परिवारिक रिश्तों को"
 मैं कहे जा रहा था
ऊँचे स्वरों में ईडियट बॉक्स के एकतरफ़ा
दृश्य-श्रव्य बाज़ारू भ्रमजाल के बारे में लगातार!
अम्मा को नहीं हुआ बर्दाश्त
बिफर पड़ी अचानक
 "चुप रह बुद्धिजीवी की दूम!
कभी जाना तुमने की जब चला जाता है पूरा घर
अपने-अपने टिफिन के साथ
 तो इस साय-साय में
 मुझ बुढ़िया के साथ कौन बैठता है दिन भर!
कौन खिलाता है मुझे ठंडे निवाले
यही राधिका...देवकी...या दया....
जब अकड़ जाती है दिन में गरदन या कमर
तो कौन-से मलहम का विज्ञापन सहलाता है उसे!
 यही नकुल...राधेश्याम...या श्रवण कुमार
इक्कीस इंच के परदे से निकल कर
दबाते हैं पाँव 'दादी-मौसी' कहते...
पोंछते हैं मेरे अकेलेपन के आँसू
'रिश्ता घर-परिवार का' के सभी सदस्य बारी-बारी से!
और दोपहर तीन बजे गप्पू-चुनमुन के
स्कूल से आने के बाद वह नटखट चूहा मिकी
भर देता है खिलखिलाहट इन बूढ़ी झुर्रियों में!
और कभी किसी चैनल पर गई
पचास-साठ के दशक की कोई फिल्म यदि
तो समझो गई कमला बुआ मानो कानपुर से
अब क्या पता चलना है समय का!
तुम लोग आते हो थक-हार कर शाम
और करते रहते मुए मोबाइल पर चटर-पटर..
"मदर को यह प्राब्लम...वह प्राब्लम..."
'गई मदर भाड़ में अपने अकेलेपन के साथ'
 बुदबुदाती अम्मा बढ़ा देती है टीवी का वॉल्यूम
अपनी आँखों की धुँधलाती रोशनी को
सहेज कर रखती है वह दवा डाल-ड़ाल कर
ताकि देख सके देवकी के पोते की बहू का मुँह!
 सुबह पाँच बजे उठ योग बाबा के सामने पालथी मार
साँसें अंदर-बाहर करती है
 ताकि यह बूढ़ी देह कष्ट ना दे किसी को अंतिम समय भी!
रात को सोने की कोशिश में
सुनती है कोई भजन धार्मिक चेनल पर
और असीसती है इस बक्से के आविष्कारक को
साथ ही करती है वसीयत डबडबाए मन से
 --"यदि होती इसमें जान...
तो कर देती अपनी बची-खुची जायदाद इसी के नाम!"

 

(निरंजन श्रोत्रिय जो अब तक साहित्य जगत में अपनी कविता,कहानी और निबंध की पांच किताबों के ज़रिए जाने जाते हैं वैसे विज्ञान के प्राध्यापक है,गुना मध्य प्रदेश में फिलहाल रहते हैं. उनसे संपर्क करने हेतु ई-मेल पता है-niranjanshrotriya@gmail.com)
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