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अरुण चन्द्र रॉय की कविता:-''घोड़े की नाल''

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, नवंबर 21, 2010 | रविवार, नवंबर 21, 2010







ठोका गया हूं

मजबूती से

समय के

पाँव में

मैं, घोड़े की नाल .


समय को

चलते जाना है

नाल को

घिसना है

समय की
हर टाप के साथ

नहीं पता

समय को कितना

होता है दर्द

लेकिन

मैं तो समय
और समय के बोझ
दोनों के भार को
सहता हूँ
बिना सिसके

इन दिनों

गुजरता हूँ जब भी

किसी गिरिजाघर के सामने से

दर्प से

इस्पात सी चमक आ जाती है
मुझमें और
यीशु सा
महसूस करता हूँ
मैं भी .

जब मैं बुरी तरह

घिस जाता हूँ

समय के लिए

अनुपयुक्त हो जाता हूँ

उतार लिया जाता हूँ
अनमोल हो जाता हूँ मैं
ठोक दिया जाता हूँ
किसी की चौखट पर
फिर से

( इस माह ''अपनी माटी वेब मंच'' के एक साल का रास्ता पार करने पर आप सभी को आभार देते हुए इस रचना के बहाने कहना चाहता हूँ.कि 
अरुण रॉय आज ब्लॉग्गिंग के इलाके में अपने सादगी भरे ब्लॉग ''सरोकार'' के ज़रिए तो अपना काम कर रहे है ही.साथ ही वे बहुत सी लोकप्रिय वेब पत्रिकाओं का मान भी यदा कदा अपनी रचनाओं से बढ़ाते दिखे हैं. उनको बहुत अरसे से पढ़ा रहा हूँ. वे हमारे अपने समय-समाज को एक विलग विश्लेषण की नज़र से देखते है,और फिर उसे उकेरते  में कविता को हथियार बनाकर वो सब कुछ कहने में नहीं चुकते जो उनके मन का उपजा है,वो ज़माने की परवाह किए बगैर अपने रास्ते पर बने हुए हैं.उनके हित बहुत सी शुभकामनाएं.है..सम्पादक )
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6 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण जी अपनी रचनाओं में नित नए प्रयोग करते हैं| सरोकार आज ब्लॉग जगत के सबसे महत्वपूर्ण ब्लोग्स में से एक है ..घोड़े की नाल को लेकर किया गया यह इनका प्रयोग अद्भुत है ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. अद्भुत प्रयोग ... लाजवाब हैं अरुण जी की कवितायें ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. अरुणजी का ब्लॉग "सरोकार " प्रतिष्ठा के नित नए सोपान चढ़ रहा है . इनकी कविताओं का आम विषय विशेष नजरिया लिए होती हैं और जन मानस के ह्रदय को छूने में सक्षम हैं . "घोड़े की नाल " एक संवेदनशील अभिव्यक्ति है . शुभकामना.

    अपनी माटी वेब मंच को सफलतापूर्वक एक साल पूरा करने के लिए बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  4. यही हर इंसान की कहानी है समय के हाथ मे बंद मोहरे की तरह कब कहाँ रख दिया जायेगा और प्रयोग किया जायेगा पता नही चलता ……………बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं तो समय
    और समय के बोझ
    दोनों के भार को
    सहता हूँ
    बिना सिसके
    dard ka maara aadmi yun hi ghista jata hai

    उत्तर देंहटाएं

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