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प्रस्तावना :--11 वां राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन 2011

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on गुरुवार, दिसंबर 16, 2010 | गुरुवार, दिसंबर 16, 2010

युवजन और नई विश्व व्यवस्था-प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया
इक्कीसवीं सदी का एक दशक बीत गया है और भारत को 21 वीं शताब्दी का भारत बनाने का नारा देने वाले स्वर्गीय राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी कांग्रेस के भविष्य के नेता एवं भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह सच है कि बिहार में उनका करिश्मा काम नहीं कर पाया पर सच तो यह भी है कि अब करिश्माई नेताओं का युग समाप्त हो चला है। जनता की सद्भावनाओं की लहर पर सवार होकर जीते अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति ओबामा का करिश्मा भी अब चुकने लगा है और चीन के जनवादी गणराज्य में भी नई पीढ़ी के नेता सांस्कृतिक क्रान्ति के अवशेषों को धो-पौंछकर साफ करने में लगे है। नई विश्व व्यवस्था अब अमरीका के एक धु्रवीय विश्व के साम्राज्यवादी सपने को छोड़कर आगे निकल गई है तथा यूरोप, चीन और भारत नई विश्व शक्तियों के रूप में उभर रहे है। इन सारे परिवर्तनों के बीच 18 वीं व 20 वीं शताब्दी में हुई अमरीकी, फ्रांसीसी व रूसी क्रांतियों के जनवादी आदर्श और स्वप्न विस्मृत और विस्थापित होते दिखाई दे रहे है। समता, स्वतन्तत्रता, न्याय, शोषण विहीन समाज की स्थापना, संकीर्ण जातिय व धार्मिक विभाजनों से मुक्ति, विश्वबंधुत्व तथा सहकारिता जैसे विचार अप्रांसंगिक होते दिखाई दे रहे हैं।
यह आश्चर्यजनक सैन्य भी सामने है कि अमरीका, इग्लैण्ड और रूस जैसे राष्ट्रों के राष्ट्र प्रमुख युवा हैं किन्तु उनकी अपनी नीतियों में युवा मन का आदर्शवाद कहीं प्रतिबिबिंत नहीं होता दिख रहा है। भारत विश्व में औसत रूप से सबसे बड़ी युवा जनशक्ति वाला राष्ट्र बनने जा रहा है किन्तु युवाओं की आकांक्षाओं के अनुरूप कुछ होता दिखाई नहीं पड़ रहा है। बेरोजगारी का प्रतिशत बढ़ रहा है। निजी कम्पनियों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के शिक्षा में निवेश से निम्न व मध्यम वर्ग के युवाओं के लिए शिक्षा के अवसर अत्यन्त सीमित हो गए है। अन्य अल्प वेतन पर शिक्षण संस्थानों में अनुबंध या प्रति कालांश अध्यापन करने वाले युवा प्रच्छन्न बेरोजगारी के शिकार है। निजी कम्पनियों में कार्यरत युवाओं के काम में घण्टों की कोई सीमा नहीं है। इस दृष्टि से कार्य की शर्तें बीसवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध से भी बदतर होती जा रही है। इन कंपनियों में कार्यरत युवाओं की शक्ति व उर्जा इस प्रकार निचोड़ ली जाती है कि पैतालीस वर्ष की आयु तक व्यक्ति कार्य करने लायक नहीं रहता। इस प्रकार जीवन जीने का संघर्ष ही इतना जटिल और दुरूह होता जा रहा है कि युवाओं के लिए रचनात्मकता, सृजन, समाज व्यवस्था के बारे में चिन्तन व विमर्श करने के लिए अवकाश ही नहीं रहता। जो युवा आर्थिक दृष्टि से संपन्न है उनका लक्ष्य अपनी संपन्नता की संरक्षा व उसे बढ़ाने तक सीमित है जिसके लिए यथास्थितिवाद से बेहतर कोई विचार धारा उन्हें नहीं नजर आती। राजनीति व समाज सेवा जैसे क्षेत्र भी व्यावसायिकता की जकड़ में आ गए है। जिस कारण युवा इनमें किसी आदर्श से प्रेरित होकर नहीं जाते अपितु अपना कैरियर बनाने की दृष्टि से जाते हैं यही कारण है कि छात्र राजनीति में वे ही सारे तौर तरीके प्रयोग किए जा रहे है जो दलीय राजनीति में प्रचलित है। कुछ चुनिंदा छात्र नेता होते हैं जो पूर्णकालिक राजनीति में अपना भविष्य देखते हैं। शेष बहुसंख्यक विद्यार्थियों का छात्र संघों से कोई लगाव नहीं होता। मतदान के दिन भी आम चुनावों की तरह उन्हें लाने के लिए गाड़ियों का बन्दोबस्त किया जाता है। आम चुनावों की तरह छात्रसंघों के निर्वाचित पदाधिकारी भी अपने कार्यकाल में अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने में लग जाते हैं। विवेकानन्द, सरदार भगतसिंह और अशफाक उल्लाखां जैसे क्रान्तिकारी युवाओं के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित तो हैं पर उनके प्रति आस्था सीमित होती जा रही है। आदर्शवाद का स्थान जब उपयोगितावाद ले रहा हो तब ऐसा होना कोई आश्चर्य भी नहीं है। पाठ्यक्रमों में कौशल विकास का स्थान ज्यादा महत्वपूर्ण होने लगा है। और ज्ञान, चिन्तन, तर्क विमर्श और मौलिक सृजन जैसी प्रकृतियां शनै-शनै कम होती चली जारही है। तथाकथित मुख्य धारा से अलग ग्रामीण व आदिवासी जन के शिक्षा व काम के अधिकारों को नरेगा जैसी योजनाओं की भेट चढा दिया गया है तथा उन्हें पता ही नहीं चल पा रहा है कि जिस जनतांत्रिक व्यवस्था के वे अंग है उसमें उनकी कोई जगह भी है या नहीं। 
नई विश्वव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूंजी के निर्बाध आवागमन का मार्ग तो प्रशस्त करती है किन्तु ज्ञान व श्रम के प्रवाह को राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अपने स्तर पर संचालित करने की छूट राष्ट्रों को देती है। ऐसे में संतुलन विकसित देशों के पक्ष में चला जाता है। और विकास शील देश मात्र बाजार बनकर रह जाते हैं। इस बाजार में खरीद फरोख्त करने और अपने माल की बिक्री की गुंजाइस देखने कभी ओबामा चले आते है तो कभी सरकोजी।
ऐसे परिदृश्य में भारत के युवाओं को एक नया भारत व एक नई दुनिया बनाने का सपना देखने तथा उसे पूरा करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होने के लिए कवि अवतार सिंह पाश जैसे क्रान्तिकारी योद्धा के शब्द याद आते हैं। ‘जो कहते हैं सबसे बुरा है मुर्दा शान्ति से भर जाना। न होना तड़प का, सब सहन कर जाना। घर से निकलना काम पर। काम से लौटकर घर जाना। सबसे खतरनाक है। हमारे सपनों का मर जाना।’ साथ ही याद आते है। हरिवंशराय बच्चन के ये शब्द, ‘गर्म लोहा पीट, ठण्डा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है।’ हमारे अपने समय के महाकवि गोरव पाण्डेय इस सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था की गहरे से पड़ताल करते है और ग्रामीण खेत मजदूर महिलाओं के जीवन से वर्तमान समय की विडम्बनाओं का चित्रण करते हुए बदलाब की आकांक्षा भी व्यक्त करते है। राजा के हाथ में चाबुक/ बिवाई फटे पैर/हम निकालती खरपतवार/ ताकि पौधो को रस मिले/फूलें फले पौधे/खेतों में सोना बरसे/जीवन सुखी हो/हमारी पीठ पर चाबुक के निशान/हमारे गीतों में राजा के घोड़े की टाप/चाबुक जल जाए/भसम हो जाए राजा का घोड़ा गौरख पाण्डेय जिस घोड़े की बात कर रहे हैं वह आज जहां निम्न वर्ग पर अपनी लोहे की नाल से वार कर रहा है। वहीं शासक वर्ग की सवारी भी है। यही शासक वर्ग अपनी महंगाई की चाबुक से हमारी चमड़ी उधेड़ता है और प्रतिकार की अनुमति भी नहीं देता। निराला जी ने लगभग सत्तर अस्सी बरस पहले इस पीड़ा को लिखा था। देख कर कोई नहीं/देखा मुझे उस दृष्टि से/जो मार खा रोई नहीं/’’ यह दुनिया अपनी चमक दमक से चाहे कितने ही आकषर्ण बिखेरे, असल में हमारे सपनों को लील जाने वाली व्यवस्था से संचालित है। महंगाई डायन सब कुछ खा रही है और युवाओं के पास अवसरों का अभाव है। मात्र दो जून की रोटी और सिर पर एक छत का संघर्ष इतना दुरुह है कि इस सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को बदले बिना कोई राहत मिल पाना संभव नहीं लगता। 
भारत में संसदीय लोकतन्त्र अपने सबसे गैर-जिम्मेदाराना दौर से गुजर रहा है जिसमें लगभग दो लाख करोड़ रूपए के घोटाले के बावजूद बीस दिन से संसद में कोई बहस नहीं हो पाई है। और सारा देश इस ठप्प पड़ी व्यवस्था का मूक दर्शक बना हुआ है। फिर से गोरव पाण्डेय की ये पंक्तियां याद आती है ये आंखे है। तुम्हारी/ तकलीफ का उमड़ता हुआ समुुन्दर/इस दुनिया को/जितना जल्दी हो/बदल देना चाहिए।
इस वर्ष लेखक सम्मेलन का विषय युवजन और नई विश्व व्यवस्था गत सम्मेलन के झाड़ौल सत्र में तय किया गया था। हमारे मार्गदर्शक सुरेश पण्डित, डॉ. रामशरण जोशी, प्रो. नंद चतुर्वेदी, नरेश भार्गव, प्रो. आरएन व्यास, जैसे विद्वानों की सहमति व प्रेरणा से इसकी परिकल्पना की गई। महावीर समता संदेश भगतसिंह के इस विचार को मानता है कि क्रान्तियों की तैयारियां विचारों की सान पर हुआ करती है। यह समय जब अनेकानेक भ्रामक प्रचारों और गैर जरूरी लड़ाइयों में युवाओं को उलझाएं रखने की चेष्टा की जा रही हो, चुप बैठने का नहीं है। जाति, धर्म, लिंग, सम्प्रदाय आदि की जकड़न से जहां युवाओं को मुक्त होना है। वहीं व्यावसायिकता और प्रो. फेशनलिज़्म की अंधी दौड़ के खतरों से भी स्वयं को सावचेत रखना है। पूंजीवादी राजनैतिक, आर्थिक, व्यवस्था इतनी असुरक्षा पैदा कर रही है कि किसी व्यापक सामाजिक सरोकार से जुड़ने के लिए सोच ही विकसित नहीं हो पा रहा है। युवाओं की अपनी रचनात्मकता व सृजनशीलता को बचाना भी जरूरी है। वे कही पूंजीवादी संरचनता की महामशीन के कलपुर्जेबनकर न रह जाए। विकास क्या है और युवाओं के संदर्भ में प्रगति का अर्थ क्या है, परिवार और समाज की संस्थाओं का कितना महत्व है तथा प्रेम कितना वास्तविक है और कितना उपयोगिता आधारित। बहुत सारे सवाल है और जवाब की कोई सूरत नजर नहीं आती। विश्वविद्यालयों से समाज को नेतृत्व की जो आशा थी वह पूरी होती नजर नहीं आती। आइए, इस वर्ष इनमें से कुछ सवालों पर बातचीत करें बात हर दीवार से बड़ी होती है, बात जीत की हर हार से बड़ी होती है। समन्दर सी गरजती हो चुनौतियां समुख, हिम्मत की पतवार हर तूफान से बड़ी होती है।
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