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आयोजन रपट:-कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास ''शिगाफ'' पर चर्चा

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010 | शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

लेखक से मिलिए में मनीषा कुलश्रेष्ठ और बाबू जोसफ  का रचना पाठ

नई दिल्ली. गुरुगोबिन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग द्वारा लेखक से मिलिये कार्यक्रम का आयोजन हुआ. आयोजन में सुपरिचित कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ और अनुवादक-आलोचक बाबू जोसफ ने साहित्य, मीडिया और अनुवाद के विद्यार्थियों के बीच रचना पाठ और संवाद किया.

आयोजन में केरल से आए अनुवादक-आलोचक डॉ. बाबू जोसफ ने अपने द्वारा की गई कमला दास की कुछ मार्मिक कविताओं का अनुवाद सुनाया, ‘परचम’, ‘परिचय’ शीर्षक कविताओं की अभिव्यक्ति और बुनावट को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने कहा कि कमला दास अपनी देह को बहुत अच्छी तरह से अभिव्यक्त करती रही हैं, उनकी कविताएँ मन से ज्यादा देह की संवेदना की कविताएँ हैं जो कि बहुत कम कवियत्रियाँ साध पाती हैं, उसके लिए अतिरिक्त सम्वेदनशीलता व स्वतंत्र अभिव्यक्ति की आवश्यकता है. डॉ. जोसफ ने अनुवाद की तकनीक पर भी तफसील से बात की. अनुवाद में शब्दों के चयन की महत्ता पर तथा, एक भाषा की रचना की आत्मा के दूसरी भाषा में अनूदित होने पर भी उतनी ही जीवंतता से बचे रहने को वे अनुवाद की सफलता मानते हैं. यह शब्द चयन के कौशल पर सबसे ज्यादा निर्भर करता है. अनुवाद के छात्र- छात्राओं ने डॉ. जोसफ से कई सवाल किए
मनीषा जी 
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इसके बाद युवा लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अपनी एक चर्चित कहानी ‘बिगड़ैल बच्चे‘ का प्रभावशाली पाठ किया,  जिसे आज के युवा मानस के बहुत करीब पाया जा सकता है.  पिंकसिटी ट्रेन में यात्रा करते तीन बुजुर्गों के साथ तीन आधुनिक युवाओं की कहानी, जिसमें लापरवाह और बहुत फैशनपरस्त युवा  - त्रयी ( एक लड़की और दो लड़के), बुजुर्ग सहयात्रियों की निन्दा का विषय बनते हैं. युवा जो जीवन को मस्ती भरे अन्दाज में जीना चाहते हैं..युवा जो लापरवाह हैं, उन्हें देख कर लगता है कि ये मूल्यविहीन, भटके बिगड़ैल युवा हैं, मगर यही युवा अंत में एक सहयात्री (जो कहानी की सूत्रधार भी है) के गिर कर घायल होने पर ट्रेन छोड़ कर मदद करते हैं, और साबित करते हैं कि हम आज के युवा को महज फैशन परस्त और लापरवाह या बिगड़ा हुआ भले ही समझें, मगर वे अपना कर्तव्य समझते हैं, उनके जीवन मूल्य पिछली पीढ़ी से अलग हो सकते हैं मगर मानवता से परे नहीं. युवा छात्र दृ छात्राओं ने तल्लीनता से कहानी पाठ सुना और बहुत रुचि ली. कहानी पाठ के बाद कहानी पर चर्चा हुई.
मनीषा कुलश्रेष्ठ ने पिछले दिनों राजकमल प्रकाशन से आये अपने उपन्यास ‘शिगाफ’ के कुछ अंश भी सुनाए. कश्मीर पर नितांत नए ढंग से, ब्लॉग, डायरी, एकालाप जैसे फॉर्म में लिखे इस उपन्यास में छात्रों की रुचि जागी, उन्होंने मनीषा से सीधा संवाद किया. ‘शिगाफ’ पर टिपण्णी करते हुए विभाग के  प्रो. आशुतोष मोहन ने कहा कि अपने सहज गद्य और परिपक्व वैचारिक अध्ययन के कारण यह उपन्यास विशिष्ट बन गया है. प्रो. आशुतोष मोहन ने युवा पीढी द्वारा उपन्यास लेखन को चुनौतीपूर्ण बताते हुए कहा कि उपन्यास लिखना बड़ा काम इसीलिए है कि उपन्यास एक प्रतिसंसार कि रचना करता है.कश्मीर के सन्दर्भ में प्रो.मोहन ने ‘शिगाफ’ को महत्वपूर्ण कृति बताया.

इससे पहले संयोजन कर रही डॉ. मनप्रीत कंग ने रचनाकारों का परिचय दिया और विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रो अनूप बेनीवाल ने कहा कि रचना पाठ और लेखकों से मिलिए जैसे आयोजन नियमित किये जायेंगे. अंत में विभाग की ओर से डॉ. विवेक सचदेवा ने धन्यवाद ज्ञापित किया. आयोजन में डॉ.चेतना तिवारी, डॉ. नरेश वत्स, डॉ. राजीव रंजन सहित अन्य अध्यापकों ने भी भागीदारी की.

विवेक सचदेवा
अंग्रेजी विभाग
गुरुगोबिन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय 
कश्मीरी गेट, दिल्ली.

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