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पुस्‍तक समीक्षा:-लोक.मिथक यात्राएं जीवन और गद्य

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, दिसंबर 07, 2010 | मंगलवार, दिसंबर 07, 2010


'दत्त दिगंबर माझे गुरु' यात्रा-लेखक कृष्णनाथ के सत्रह यात्रा-वृतांतों का नया संग्रह है. इसमें कई महत्त्वपूर्ण तीर्थों और स्थलों की, अपने समय के तमाम जरुरी सरोकारों से जूझते हुए की गई एक दृष्टिसंपन्न खोज हैं और लेखक के लम्बे जीवनानुभवों का सार भी. "जहाँ-जहाँ संगम है, जल में या देह में, वहाँ-वहाँ प्रयाग है, तीर्थ है." इसका उद्देश्य "पाठक को क्या लगता है?" को विस्तार प्रदान करना है, उसे परिष्कृत कर नई दिशा देना है. इस बहाने हम जीवन और यात्राओं के बीच के स यायावरी आवाजाही के गद्य में, जीवन के उन विरले अनुभवों का साक्षात्कार पा जाते है. जो यदा-कदा हमारे अनुभव-क्षेत्र में तो आते है, लेकिन जिन्हें हम नोटिस नहीं क पाते. उनके लेखन में पिरोये जीवन और संस्कृति के यात्रा अन्वेषण हमें एक नया विजन देते हैं.
      
वे हमारे समक्ष शाही, शास्त्री और सरकारी इतिहास के बरक्स इतिहास को 'लोक' के नजरिये से पड़तालने की प्रस्तावना करते हैं. पूर्ववर्ती 'हिमालय-कथा-त्रिक' से इतर यहाँ वे सीता-राम-लक्ष्मण, अश्वत्‍थामा, भर्तृहरि, सोनवा आदि पौराणिक चरित्रों को नए नजरिये से देखने की वकालत करते है. वे शुरुआत 'चित्रकूट' से करते है  कि 'राम' से पहले यह क्षेत्र किसका था? वे वाल्मीकि और तुलसीदास के पास गये लेकिन समाधान न निकला तो अंततः लोक की शरण में गए क्योंकि 'यह लोक ही तो सबका मूल है.' लोकश्रुतियों के अनुसार यह क्षेत्र पहले 'शिव' का था. दशरथ-पुत्रों को शिव से 'इजाजत' मिली और 'सिखवन' भी कि "लिंग और जीभ (इन्द्रियों) को वश में रखो तो चित्रकूट तो क्या कहीं भी निर्द्वंद्व विहरो."(पृ.43) लेकिन 'उन्होंने शिव की यह सीख सर्वत्र नहीं मानी.' राम-सीता के काम, स्वाद और वाचन विषयक स्खलन, सीता का सोने के मृ की चाह करना, लक्ष्मण को मर्मवचन कहना, प्रणय-निवेदन करने आई सूर्पणखा से राम द्वारा हास-परिहास में ही सही, झूठ कहना? संग्रह के मार्मिक और विचारणीय प्रसंग है.

      
 हिंदी यात्रा-साहित्य में राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय और निर्मल वर्मा के यात्रा-साहित्य के बाद कृष्णनाथ का 'हिमालय-कथा-त्रिक' ('स्पीति में बारिश' (1982), 'किन्नर धर्मलोक' (1983)  'लद्दाख में राग-विराग' (1984)) अपने अद्भुत यात्रा-वृतांति-शिल्प, संरचना और अर्थ-गाम्भीर्य मर्मज्ञता के लिए सर्वाधिक ख्यात रहा है. यात्रा-वर्णनों की सफलता और उसकी जीवंतता इस पर निर्भर करती है कि लेखक खुद को कितना खोल पाता है और पाठक को खुलने, सोचने या कल्पना करने का कितना अवसर वह दे पाता है. अंतत: पाठक और लेखक का तादात्मयीकरण कितना वैध लगता है. बाहर की यात्रा के साथ-साथ और प्राय: उसके सामानांतर चलने वाली एक यात्रा भीतर की भी होती है. जो अपने विराट जीवनानुभवों से शनै-शनै हमें माँजती हैं. कोई यात्रा-वृतांत कितना सशक्त है, इसकी पड़ताल इससे की जा सकती है कि खुद यात्रावृत्तांतकार इन यात्राओं में कितना भीतर तक भीगा है और अपने पाठकों को उसमें भिगोने में समर्थ रहा है. कथ्य पर जबरदस्त पकड़, कसी हुई भाषाई अभिव्यक्ति और श्रेष्ठ जीवनानुभवों से बुना महीन शिल्प एक बेहतर यात्रा-वृतांत की नींव रखता है.
           
'अथ यमुनोत्री यात्रा' और 'मुना से संवाद' अकेलेपन को साधने के श्रेष्ठ उदाहरण है. उसमें लेखक प्रकृति/नदी का मानवीयकरण कर उससे संवाद करता है. यहाँ छायावादी काव्य की शक्तिमत्ता को गद्य में महसूसा जा सकता है. यहाँ 'यमुना' देवी, सहचरी र माँ तीनों रूपों में उपस्थित है. भाषा अपनी समग्रता में, गद्यात्मकता में निहित काव्यात्मकता में मौजूद है. वह जिस संवादी रूप में व्यक्तिगत आस्था को सृजनात्मक सन्दर्भ देते है, वह संग्रह के मार्मिक प्रसंगों में एक है. जब बात मनुष्य जीवन और ईश्वर में से किसी एक को चुनने की आती है तो वह हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाणभट्ट की तरह मनुष्यता में, लौकिक जीवन में अपनी आस्था व्यक्त करते है, न की उस अनदेखे, अनजाने परलोक में. बड़ी ही रागात्मकता के साथ यह कृति प्रकृति और संस्कृति, देह और चित्त, राग और विराग, लोक और परलोक सभी को एक साथ साधने का प्रयास करती है.
           
'अथ कुम्भ महात्मय' कुम्भ के वास्तविक स्वरुप को हमारे सामने रखता है. उसके मानवीय सरोकारों और उसमें आये बदलावों को चिह्नित करती हैं और उसका अर्थ गहरे पैठने में ही खुलता है. कृष्णनाथ का गद्य बरबस एक विधा का ही मामला नहीं है, बल्कि वह उस विधा को साधता हुआ अन्य विधाओं की दीवारों का संस्पर्श करता चलता है. यह विधाओं के भीतर कई विधाओं की यात्रा करता गद्य है. 'कोणार्क: कालो अश्वो वहति' में 'अध-जली मछली की भांति छटपटाता उनका मन' अपनी बेजोड़ कला के कारण खींचते कोणार्क से गदगद है. उनकी नज़र में कोणार्क का काम-शिल्प का आन्दोलन मूर्ति के क्षेत्र में रीतिकाल जैसी प्रवृति का विस्तार है. उनका प्रश्न है कि साहित्य, चित्रकला और मूर्तिकला में साथ-साथ ऐसे काल और कर्म के आन्दोलन क्यों आते हैं? 
            
कृष्णनाथ ने अपनी एक नयी यात्रा-वृत्तांति-भाषा गढ़ी, शब्दों को नए विषयों के अनुकूल ढाला, मांजा और साधा है, इससे अभिव्यक्ति क्षमता और अर्थगाम्भीर्य अधिक मारक हुई है. उनका शिल्प यात्रा-वृत्तांत के साथ-साथ आत्मकथा और जीवनी की विशेषताओं को भी अंगीकार करता चलता है. जिस बतकही/बतरसी और किस्सागोई अंदाज में वो प्रकृति-वर्णन में जीवन संदर्भो को गूंथते है, मथते है, वह कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है. अभिव्यक्ति की ताजगी,  प्रखर दृश्यात्मक-वर्णन और बिम्बात्मक-चित्रण इसकी विशेषता है. चिंतन-गाम्भीर्य सहज, सम्प्रेषणणीय और प्रभावी है. यह पर्वतों, पहाड़ों और नदियों में बहते जीवन-रस को पूरी सक्षमता के साथ उकेरती चलती है. अंतत: कृष्णनाथ का यह गद्य हिंदी में लोक-मिथकों के बहाने जीवन को साधने का यायावरी-उद्यम है. 


'दत्त दिगंबर माझे गुरु' (यात्रा-वृत्‍तांत)- कृष्णनाथ,

प्रथम संस्‍करण-2009, मूल्‍य- 495 रुपये, वाणी प्रकाशन, नई दिल्‍ली-02




पुखराज जांगिड, शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र 204.ई ब्रह्मपुत्र हॉस्‍टल जेएनयूए नई दिल्‍ली.67
 09968636833,pukhraj.jnu@gmail.com
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