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आयोजन रपट:-‘‘समय की सचाइयाँ और मीडिया’’ विषय पर परिचर्चा

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, दिसंबर 18, 2010 | शनिवार, दिसंबर 18, 2010

मीडिया ने तर्क करने की क्षमता को भौंथरा कर दिया है’’- अनिल चमड़िया
अनिल जी चमड़िया
‘विकल्प’ जन सांस्कृतिक मंच द्वारा 15 दिस. को प्रेस-क्लब, कोटा के सभागार में ‘‘समय की सचाइयाँ और मीडिया’’ विषय पर आयोजित सेमीनार में दिल्ली से पधारे सुप्रसिद्ध लेखक-पत्रकार अनिल चमड़िया, अरूण कुमार उरॉव, विजय प्रताप व वरूण शैलेष सहित स्थानीय पत्रकारों, बुद्धिजीवियों व साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किये। पूर्णिया (बिहार) से पधारे कवि-सम्पादक अशोक  कुमार ‘आलोक’ ने सेमीनार में काव्य-पाठ किया। 

राज्य सभा की मीडिया सलाहकार समिति के सदस्य पत्रकार अनिल चमड़िया ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हम सचाई कि उसी हिस्से को देख पाते हैं, जिसे मीडिया हमें दिखाना चाहता है। मीडिया ने हमारे सोचने-समझने और तर्क करने की क्षमता को भौंथरा कर दिया है। उन्होंने अमरीका का उदाहरण देते हुए कहा कि उसने ईराक व अफगानिस्तान के विरूद्ध हमलों से पूर्व मीडिया के जरिये युद्ध चलाया और अततः आसानी से जंग जीत ली। उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों से देषी-विदेषी कंपनियों ने कोलम्बस के बाद जमीन और खनिजों की सबसे बड़ी लूट की है और लाखों आदिवासियों को विस्थापित कर दिया है, लेकिन मीडिया द्वारा माओवाद के बारे में अतिरंपनापूर्ण खबरें प्रसारित करके इस बड़ी हकीकत को छुपा दिया गया है।


इलेक्ट्रोनिक मीडिया मॉनीटर पत्रकार अरूण कुमार उरॉव ने कहा कि अम्बिका सोनी द्वारा यह कहना कि मीडिया स्वयं ही अपने को नियंत्रित करता है, सही नहीं है। मनोरंजन के नाम पर ‘‘राखी का इंसाफ’’ ‘‘बिग-बॉस’’ जैसे सीरियल समाज में विकृति फैला रहे हैं। उन्होंने प्रष्न किया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आदिवासियों व दलितों पर सीरियल क्यों नहीं बनते? दिल्ली से आये पत्रकार विजय प्रताप ने कहा कि मीडिया में एक ओर सत्ता संचालित सोच की धारा है, जिसे मुख्य-धारा कहा जाता है। पत्रकारिता की दूसरी धारा प्रतिरोध की धारा है, जिन्हें सचाई सामने लाने पर प्रताड़ित किया जाता है। इस संदर्भी में उन्होंने सीमा आजाद, हेमचंद्र पाण्डे, प्रषांत राही आदि कई पत्रकारों का उल्लेख किया।
 
इन्डो एसियन न्यूज सर्विस से जुड़े पत्रकार वरूण शैलेष ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली के भिखारियों व फुटपाथ के दूकानदारों को भारत की गरीबी को छुपाने के लिए निर्दयतापूर्वक खदेड़ दिया गया, लेकिन मीडिया ने इसे प्रसारित नहीं किया। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार की खबरें सत्ता और व्यापारिक घरानों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा के कारण सामने आ रही हैं।
 
बहस में भाग लेते हूए पत्रकार दुर्गाषंकर गहलोत ने कहा कि हमें समाचार कम सूचनाऐं अधिक मिलती हैं। भारत जैसी सबसे पवित्र भूमि आज सबसे भ्रष्ट दिखाई जा रही है। पत्रकार हलीम रेहान ने कहा कि मीडिया की भूमिका के लिए पत्रकारों को दोषी नही ठहराया जा सकता। हितेष व्यास ने प्रष्न किया कि क्या मीडिया का सकारात्मक रूप नहीं हैं? आर.पी. तिवारी ने कहा कि मीडिया ने आज सच्चाई को घूमिल कर दिया है। शायर शकूर अनवर ने कहा कि मीडिया द्वारा प्रसाहित असत्य और फूहड़ता को देखने के लिए हम मजबूर हो रहे हैं। समाज का नजरिया बदलना चाहिए। साहित्यकार अरूण सैदवाल ने मीडिया को ‘‘अपनी ढपली-अपना राज’’ की संज्ञा देते हुए कहा कि मिषनरी और प्रतिबद्ध पत्रकारिता माहौल को बदल सकती है।
सेमीनार का संचालन करते हुए महेन्द्र नेह ने एक शेर के माध्यम से कहा - ‘‘आसान नहीं है सुलझाना इस गुत्थी का/ अहले दानिष ने बहुत सोच के उलझाया है’’। उन्होंने कहा कि यदि मीडिया-कर्मी जमीनी वास्तविकताओं को समझें तो मीडिया की प्रतिरोधी और सकारात्कम भूमिका को ताकतवर बनाया जा सकता है।
 
पूर्णिया (बिहार) से पधारे कवि अषोक कुमार ‘आलोक’ ने अपनी कविताओं ‘‘अँधोरे के खिलाफ’’ व ‘‘एक दिया जला भी लो’’ के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों और अँधेरे के बरक्स पूरी हिम्मत के साथ उजाले और नव-जागरण के दिये जलाने का संदेष दिया।
 
सेमीनार में अतुल चतुर्वेदी, अंजुम शैफी, ओम नागर, संजय चावला, अतुल चतुर्वेदी, चांद शेरी, अखिलेश  अंजुम, पुरूषोत्तम ‘यकीन’, दिनेश  राय द्विवेदी, राम नारायण हलधर, गोपी लाल मेहरा, सुरेष बहादुर, महेन्द्र पाण्डेय, परमानन्द कौशिक , विजय जोशी , अब्दुल गफूर, तारकेश्वर तिवारी, त्रिलोक सिंह आदि नगर के बुद्धिजीवी, साहित्यकार एवं पत्रकार उपस्थित रहे।
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