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पुस्तक समीक्षा:-''रचना में समाज का निर्मित होना''- पुखराज जाँगिड़

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on सोमवार, दिसंबर 20, 2010 | सोमवार, दिसंबर 20, 2010

'मुर्दहिया (आत्मकथा, खंड-1) प्रो. तुलसीराम के सात आत्मकथ्यों का एक बेजोड़ संकलन है। मुर्दहिया तुलसीराम के गाँव धरमपुर (आजमगढ) की बहुउद्देशीय कर्मस्थली है, जहां मुर्दे फूंके जाते हैं, जहां मरे हुए जानवरों के चमड़े उतारे जाते हैं और जो संकट के क्षणों में दलितों की जीवनदात्री है। कुलमिलाकर यह उनके अपने सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश का, उसके भूगोल का यथार्थपरक दस्तावेज है। यह यथार्थ पूर्वी उत्तर प्रदेश की सामाजिक बनावट में दलितों की तत्कालीन स्थितियों की भयावहता का है और इसके जिम्मेदार कारकों के प्रति लेखक में गुस्सा हैं, इसीलिए मुर्दहिया को उन्होंने अपने जीवन का प्रमुख अंग मानते हुए भूमिका में ही स्पष्ट कर दिया है कि यदि उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती तो उसका शीर्षक मुर्दहिया ही होतादरअसल, किसी रचना में समाज का निर्मित होना, आत्मकथा होना है। इसमें व्यक्ति के विकास का अर्थ सामाजिक शोषण का स्वीकार है और यहाँ विमषमता का दंश इतना गहरा है कि मिटाए नहीं मिटता, तिसपर अर्थ का दबाव उसे और अधिक गहरा करता है, कुरेदता है जिसका प्रतिरोध मुर्दहिया करती है और यह बताती है कि जीने की जिद, कुछ बेहतर कर गुजरने की जीवटता और हार न मानने वाली अदम्य जिजीविषा ही आदमी को बड़ा बना जाती है। इसलिए यह अपने होने का, अपनी पहचान का बोध कराती आत्मकथा है।

मुर्दहिया की स्त्रीदृष्टि प्रभावित करती है। दरअसल कनवा से तुलसीराम की यात्रा तीन दलित स्त्रियों की कहानी भी है। पहली उनकी दादी, दूसरी उनकी माँ और तीसरी नटनिया। इनमें नटनिया सबसे मौन लेकिन प्रभावी चरित्र है। तीनों चरित्र बताते है कि दलितोत्थान में स्त्रियों की भूमिका कितनी निर्णायक होती है और इसके लिए उन्हें कितना कुछ सहना-झेलना-टूटना पड़ता है। तुलसीराम जितने सजग दलित-स्त्री के प्रति सजग है उतने ही सवर्ण-स्त्री के प्रति भी है। मुर्दहिया की भाषा थोड़े में बहुत कुछ कह जाती है-अंततोगत्वा उस घोर नशे की हालत में लालबहादुर सिंह की सामंती पृष्ठभूमि जाग उठी और वे काफी देर तक शब्दों में ही मेरी मां-बहन का इस्तेमाल करते रहे।(पृ.148) या घोड़वा के देखि के मेढकिया नाल मराई, त का ऊ जिंदा रही।(पृ.149) गाँव के ब्राह्मणों ने तुलसीराम की पढाई छुड़वाने में कोई कसर न छोड़ी क्योंकि वे शिक्षा की व्यवस्था-पलट क्रांतिकारी-प्रभावकारिता से पूरी तरह से वाकिफ थे। लेकिन इससे नावाकिफ तुलसी के घरवाले सर्वसम्मति से पढाई छुड़ाने का प्रस्ताव पारित कर चुके थे।(पृ.149)  नतीजन उच्च-शिक्षा के लिए उन्हें घर से भागना पड़ा।

लेखक ने दलित चेतना और शिक्षा के संबंध को भलीभांति स्पष्ट किया है। उन्होंने अंधविश्वासों से घिरे अपने घर को अजायबघर और अपने पढाई के लिए चुने जाने की घटना (1954) को युगांतरकारी यूँ ही नहीं कहा है। कलकत्ता की खानों और मिलों में काम करने वालों के पोस्टकार्ड और चिट्ठीयां पढने में गाँव के पढे-लिखे ब्राह्मण आनाकानी करते, उनके परिवारों को अपमानित करते। क्योंकि दलितों में कोई पढा-लिखा न था। इस यक्ष-समस्या से ऊबरने के लिए घर में सबसे छोटा होने के कारण तुलसीराम को चुना गया और इसमें उनका कुरूप होना भी सहायक सिद्ध हुआ। मुर्दहिया में दलित-जीवन की यातना (प्रत्यक्ष) के साथ मुक्ति-चेतना (अप्रत्यक्ष) भी है जो नागार्जुन के शब्दों में यह कहने में सफल रही है कि दलित माँओं के/सब बच्चे अब बागी होंगे/अग्निपुत्र होंगे वे, अंतिम/विप्लव में सहभागी होंगे। संवेदना का केंद्र गाँव है और वह अत्यंत प्रभावशाली है। हालाँकि बदलावों की आवाजाही गाँव से शहर की ओर की है।

दलित साहित्य का विद्रोही तेवर उसे मुख्यधारा के साहित्य से अलग पहचान देता है। इसकी आंदोलनधर्मिता ने, इसके विद्रोही और विरोधी तेवरों ने साहित्य के सौंदर्यबोध को, उसके मिजाज को बदला है और निरंतर बदल रहा है और दलित आत्मकथाओं ने इसमें महत्ती भूमिका निभाई है। अनुवाद के माध्यम से इसने भाषाई दीवारों को लाँघ उनके सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में रचनात्मक आवाजाही शुरू की है, इससे इसका अखिल भारतीय स्वरूप उभरकर सामने आया है और इसने मुख्यधारा को भी कड़ी चुनौती दी है। दरअसल अब वह भूतिया-संस्कृति में जीने को अभिशप्त अपनी नियति को बदलना चाहता है, इसके लिए वह उसकी तह में जाकर वास्तविक कारणों की पड़ताल करता है और हमेशा-हमेशा के लिए अपने समाज को समाजीकरण की अमानवीय व्यथा-पीड़ा से बाहर निकलना चाहता है। इस चेतनशीलता ने उसे वैचारिक उर्जा दी है और उसकी रचनात्मक ऊर्जा व संघर्षगाथा में समतामूलक समाज का स्वप्न निहित है। दलित आत्मकथाएँ इसी स्वप्न की प्रखर अभिव्यक्ति है, वह गवाही है हमारे बदलते हुए समय और समाज की। कुलमिलाकर मुर्दहिया रचनात्मक और कलात्मक दृष्टि से भी हमारे समग्र आत्मकथा-साहित्य के लिए एक गंभीर चुनौती है और इसने आत्मकथा के शिल्प को नई दिशा दी है।

पुस्तक-समीक्षा :- 

मुर्दहिया (आत्मकथा) - डॉ. तुलसीराम, प्रथम संस्करण – 2010, पृष्ठ - 184, मूल्य – 250 रूपए। राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-02.

पुखराज जांगिड 
 (पुखराज जाँगिड़, शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू, 204-E, ब्रह्मपुत्र छात्रावास, पूर्वांचल, जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-67. ईमेल- pukhraj.jnu@gmail.com )



उनकी दूजी पुस्‍तक समीक्षा:-लोक.मिथक यात्राएं जीवन और गद्य यहाँ क्लिक कर पढ़ी जा सकती है.

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