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आयोजन रपट ‘‘आदिवासी कीमत पर देष का विकास नहीं चाहिए’’

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, दिसंबर 21, 2010 | मंगलवार, दिसंबर 21, 2010

आदिवासी समाज दशा और दिशा विश्व  पर दो दिवसीय राष्ट्रीय  संघोष्टी  का आरंभ दिनांक 14 दिसंबर की ठंडी हवा के थपेड़ों के बीच हाड़ौती के राजकीय महाविद्यालय बूंदी में झारखंड से सांसद डॉ. रामदयाल मुंडा के बांसुरी वादन की गूंज के साथ हुआ। झारखंड के आदिवासियों के बीच एक एक्टिविस्ट के नोट्स के लेेखक प्रोफेसर वीरभारत तलवार के अंतरंग अनुभूतियों, अनुभवों, युद्धरत आम आदमी की संपादिका रमणिका गुप्ता के मुख्य आतिथेय में कई सवाल उठे और कई बार बहस व विमर्ष हुआ। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ आर.के. दुबे व व्यवस्था में लगे मेजबानों की सभी बाहर से आने वाले प्रतिभागियों ने उनके व्यवहार की प्रषंसा की। देष के सुदूर प्रदेषों से आये प्रतिभागियों, षोधार्थियों और विशय विषेशज्ञों का जमावड़ा बुन्दा मीणा की धरती पर आदिवासियों की अधिकांष बातों पर गहन विचार विमर्ष हुआ जिसमें कोई पाँच दर्जन से अधिक पर्चे पढे़ गए।


उद्घाटन का आरंभ झारखंड से आये सांसद डॉ रामदयाल मुंडाने बिरसा मुंडा की तस्वीर पर माल्यार्पण करके किया। डॉ सीमा कष्यप ने अतिथियों का परिचय दिया। डॉ.चमन षर्मा रतलाम ने संचालन किया और प्राचार्य डॉ.आरके दुबे ने स्वागत भाशण और उपाचार्य डॉ. डीके जैन ने धन्यवाद दिया। संचालक ने आदिवासियों को कटि पतंग की तरह बताया जबकि देष इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ रहा है। इसी दौरान डॉ. मुंडा ने अतिथियों के साथ डॉ मणि भारतीय के द्वारा बनाए आदिवासी चित्र प्रदर्षनी व श्री दिनेष कुमार वर्मा की उस पेटिंग का जो उन्होंने स्मारिका के मुखपृश्ठ के लिए बनाई का भी उद्घाटन किया।

डॉ. रामदयाल मुंडा ने बताया कि आज आदिवासी समाज अपने षोशण और गुलामी से मुक्त होने के लिए क्रांति की भाशा में बोलने पर उतारू है। साहित्य में हो रहा विमर्ष एक रोषनी का काम करेगा। बड़ा समाज वह होता है जो अपने से छोटे को ऊपर उठता है। आदिवासी समाज हाषिये का समाज नहीं केंद्र का का समाज है ऐसा माने जाने पर योजना सफल होगी। बूंदी कान्फ्रेंस केवल इस षहर भर के लिए नहीं है इसका महŸव षेश राश्ट्र के लिए भी है। रमणिका गुप्ता ने बताया कि आज देष का विकास जिस दिषा में हो़ रहा है वह आदिवासियों के बिलकुल अनुकूल नही हैं। जल, जंगल, जमीन आदिवासियों के लिए जीवन का पर्याय रहे हैं लेकिन विकास की अंधी दौड़ ने आदिवासियों के जीवन आधारों को खत्म कर दिया है। उन्हांेने कहा कि सरकार नक्सलवाद को खत्म करने के लिए सलवाजुडूम खड़ा करती है। गरीबी, भूखमरी, सरकारी हिंसा और विस्थापन आदिवासियों की सबसे बड़ी त्रासदी है। मूल्यवान आदिवासी विरासत आज के तथाकथित आधुनिक समाज को दिषा दे सकती है। हमें उनके पास सीखने के लिए जाना चाहिए। जब तक आदिवासियों ने षांति से आंदोलन किया तो किसी ने ध्यान नहीं दिया लेकिन जब वे जागे, बंदूक उठायी तब समझ में आया। अंग्रेजों से न जाने कितनी बार आदिवासियों ने लड़ाई की लेकिन इतिहास में उसका कोई जिक्र नहीं है। अब आदिवासी अपना इतिहास लिख रहे हैं। विषिश्ट अतिथि प्रो. वीरभारत तलवार ने बताया कि आदिवासी भारतीय समाज और राजनीति दोनांे से उपेक्षित रहे हैं। यहां तक कि आदिवासी समाज की समस्याएं हिन्दुस्तान की किसी राजनीतिकि पार्टी के ऐजेण्डे में नही है।

आदिवासी समाज सदियों मूक रहने से हाषिये पर रहता आया है। आयोजन सचिव रमेष चंद मीणा ने बताया कि अब इस आवाज को रोक पाना मुष्किल है। स्त्री और दलित विमर्ष के बाद आने वाले नये विमर्ष की आहट की एक कड़ी है यह संगोश्ठी। मानाकि आदिवासी पर आज कई तरह से सोचा-विचारा जा रहा है लेकिन संविधान द्वारा प्रदŸा संरक्षण व कई योजनाओं के बावजूद इनकी स्थिति चिंतनीय कही जा सकती है।  आजाद मुल्क में नागरिक आजादी तो तुरंत मिल गई पर सामाजिक व आर्थिक आजादी अभी मिलना बाकी है। बहुत-से समुदायों को देख कर कह सकते हैं कि आदिवासी के लिए आजादी जैसे षब्द का कोई अर्थ नहीं है। साहित्य में आदिवासी चरित्र यूं तो महाकाव्य काल से ही चित्रित होते रहे हैं पर वहां उन्हें रीछ बानर, भालू की श्रेणी में ही रख कर देखा-जाना गया है। आज स्थिति बदली है। पूर्वोŸार से लेकर पष्चिम तक ऐसा साहित्य सामने आ रहा है जिससे लग सकता है कि आज नहीं तो कल आदिवासी साहित्य मुख्य विमर्ष के रूप में हिंदी जगत में पूरे दम खम के साथ सामने आयेगा। युवा कवयित्री निर्मला पुतुल, वंदना टेटे वाहरु सोनवणे और हरिराम मीणा की कविताएं घने अँधेरे कोहरे को चीरने में दीपक की किरण की तरह दिषा निर्देषित करती हैं। ‘अरावली उद्घोश’, ‘आदिवासी सŸाा’, ‘दलित आदिवासी विमर्ष’ और ‘युद्धरत आम आदमी’ में लगातार प्रकाष में आ रही रचनाएँ एक उभरती हुई प्रवृŸिा की तरफ इषारा करती हैं। 

आदिवासी की आवाज मीडिया में न के बराबर ही उठ पा रही है। पत्रकारिता अपने मिषन से भटकी हुई, उसका उद्देष्य व्यवसायोन्मुखी है, ऐसे में दैनिक ‘जनसŸाा’ में नक्सलवाद पर चली बहस इस बात का उदाहरण है कि इस घोर बाजारू दौर में सदियों से मूक रहे आदिवासी की आवाज बनने वाले पत्र मौजूद हैं। इनकी संख्या का कम होना भले ही ंिचंता का कारण अवष्य है। आज आदिवासी की आवाज का बाहर आना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवष्यक है। अगर किसी आवाज को लगातार दबाया जाता है तो निष्चित ही वह आवाज कंुद होकर अपना रूप बदलने के लिए विवष होती है। इस समय आदिवासी की बिगड़ी हुई आवाज के रूप में नक्सलवाद सभी के सामने हैं। लोकतंत्र सही मायने में तभी खरा उतर सकता है जब देष के सुदूर जंगलों में रहने वाला आदिवासी उस विकास की किरणों से प्रकाषित हो सके न कि चौंधिया कर आँखे बंद करले। वैष्वीकरण ने आदिवासी के लिए चुनौतियों की लंबी दीवार खड़ी कर डाली है। आज हर तरफ विकास की बयार चल रही है। विकास की आंधी में कहीं कुछ पुराने पेड़ धराषाई न हो जाएं! विकास बेषक हो पर अंधानुकरण न हो। विकास की नई लकीर खींचने के लिए पुरानी लकीरों को न मिटाया जाए? 

प्रोफेसर वीरभारत तलवार की अध्यक्षता में संपन्न हुए सत्र में केदार प्रसाद मीणा(संथाल ‘हूल’: एतिहासिक संदर्भ और मूल्यांकन) डॉ. विवेक कुमार मिश्रा (साहित्य की संस्कृति और आदिवासी समाज’) डॉ. सी.एल.षर्मा (आदिवासी साहित्य: उभरती चेतना का कोलाज) डॉ. मनीशा षर्मा (इक्कीसवीं सदी के उपन्यासों में आदिवासी विमर्ष’)स्थानीय महाविद्यालय से डॉ. विजय लक्ष्मी सालोदिया, डॉ.अनीता यादव, लालचंद कहार और डॉ. सियाराम मीणा (गमना यथास्थितिवाद की जकड़न में) ने षोध-पत्रों का वाचन किया। इस सत्र में आदिवासियों के सामाजिक, राजनीति, सांस्कृतिक जीवन से जुड़े कई सवालों को सदन के सामने रखा। विशय प्रवर्तक प्रो. श्रवण कुमार मीणा ने बताया कि आदिवासी विमर्ष अब साहित्य में अपनी जगह बना रहा है। उनकी आवाज अब कलम बद्ध हो रही है। उनके सदियों के दुखः, दर्द, और षोशण की गाथा मुखर हो रही हैं। सत्र के मुख्य वक्ता गुलाब चंद पांचाल ने बताया कि आज आदिवासी षब्द की जगह राजनीतिक कुचक्र के साथ वनवासी षब्द का प्रयोग किया जा रहा है जो ठीक नही है। आदिवासी षब्द को संवैधानिक मान्यता दिलाई जानी चाहिए।

प्रो. वीरभारत तलवार ने विविध आदिवासी भाशाओं में रचे जा रहे आदिवासी साहित्य पर विस्तार पूर्वक प्रकाष डालते हुए कहा कि आदिवासी साहित्य उनकी संस्कृति अस्मिता का साहित्य है।  प्रो. तलवार ने बताया कि गैर आदिवासी लेखक आदिवासी द्वंद्व को नहीं पकड़ पा रहे हैं यहां तक कि प्रसिद्ध बांग्ला लेखिका महाष्वेता देवी की रचनाएं आदिवासी क्षेत्रों के ट्रिप लगाने के बाद लिखीं गई सतई रचनाएं है। उन्होंने मिजो आदिवासियों पर लिखे श्रीप्रकाष मिश्र के उपन्यास ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ को आदिवासी जीवन पर लिखा श्रेश्ठ उपन्यास बताया तो गोपीनाथ महांती के अमृत संतान को आदिवासी कंध जीवन को नजदीक से देखने वाला बेजोड़ रचना बताया और निर्मला पुतुल और हरिराम मीणा को आदिवासी जीवन को गहराई से चित्रित करने वाला कहा।

आगरा से पधारे प्रसिद्ध साहित्यकार पुन्नी सिंह की अध्यक्षता में द्वितीय तकनीकी सत्र आरंभ हुआ विशय प्रवर्तक रहे उदयपुर से पधारे डी.एस. पालीवाल, मुख्य वक्ता श्री राजाराम भादू संपादक ‘‘संस्कृति मीमांसा’’ जयपुर थे। इस सत्र में 19 पत्र-वाचकों द्वारा अपने षोध पत्रों का वाचन किया गया। दूसरे दिन का तृतीय तकनीकी सत्र्15 दिसंबर को युद्धरत आम आदमी की संपादिका रमणिका गुप्ता की अध्यक्षता में ‘आदिवासी महिला संवाद’ पर आरंभ हुआ। इस सत्र की मुख्य वक्ता डॉ. सुनीता गुप्ता, रांची रही इस सत्र का संचालन डॉ विवेक मिश्रा (झालावाड) ने किया। सत्र में आधा दर्जन पत्र पढ़े गए। विषेश वक्ता सुधीर संपादक दलित आदिवासी संवाद दिल्ली रहे, आदिवासी महिलाओं की सामाजिक स्थिति डॉ. सीमा कष्यप (बून्दी), सहरिया आदिवासी महिलाओं की दषा -दिषा (डॉ. विवेक शंकर, बारां, राज), आदिवासी औरत अस्मिता का संकट और उसका प्रतिरोध (षोधार्थी मनोज मीणा, राज. महा.बून्दी),  डॉ. सुनीता गुप्ता ने बताया कि आदिवासी समाज में वे बुराईयां नही है जिनसे आज का आधुनिक कहा जाने वाला उच्च वर्गीय समाज त्रस्त है। आदिवासी समाज में दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध नहीं होते हैं। आज अपने को प्रगतीषील मानने वाला समाज जो बुद्धिजीवी कहलाता है बेटी के जन्म पर षोक मनाता है इतना ही नही विज्ञान के वरदान को अभिषाप में बदलने को तैयार हो गर्भस्थ षिषु जांच कराकर गर्भ में ही पुत्री को मार देने से नही चूकता, इतनी षर्मनाक घटना जनजातीय समाज में नहीं होती। जनजातीय समाज में पहली सन्तान के रूप में पुत्री की कामना की जाती है- कहावत भी है कि बेटी होने से गोहाल भर जाता है और बेटा होने से गोहाल खाली हो जाता है। 

दलित आदिवासी संवाद के संपादक सुधीर ने आदिवासी महिलाओं के पलायन पर चर्चा करते हुए बताया कि पलायन का दर्द आदिवासी महिलाओं को सबसे ज्यादा झेलना पड़ता है। महिला सषक्तिकरण का एलान करने वाला भारतीय मध्यम और उच्च वर्ग महिला को अपने अधिकारों से वंचित किये हुए है। उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज आज अनेक समस्याओं से ग्रस्त है तथा इनकी समस्याएं दूसरे समाज के विकास के कारण पनप रही है। अध्यक्षीय उद्बोधन में रमणिका गुप्ता ने कहा कि आदिवासी समाज में स्त्री सूर्य व षक्ति का प्रतीक रही है। जबकि हमारे समाज में कमजोरी का। आदिवासी स्त्री की इज्जत करता है, श्रम का सम्मान अधिक करता है। आदिवासी स्त्री का षोशक गैर-आदिवासी ठहरते हैं।

 संगोश्ठी का ज्वलंत सत्र् कवि व चिंतक हरिराम मीणा की अध्यक्षता में हिंसा और (नक्सलवाद) आदिवासी पर चौथा सत्र का विशय प्रवर्तन करते हुए लेखक सुरेष पंडित (अलवर) ने नक्सलवादियों को दलितों और आदिवासियों को संगठित करने वाला बताते हुए कहा कि नक्सलवादियों ने आदिवासी विरोधी विकास को चुनौती दी है जो उनसे जल, जंगल और जमीन को छीनकर देषी पूँजीपतियों और बहुराश्ट्रीय निगमों को फायदा पहँुचाना चाहती है। इन प्राकृतिक संसाधनों पर हमेषा से आदिवासियों का कब्जा रहा है। आज का विकास आदिवासियों की गर्दन को नापते हुए किया जा रहा है। आदिवासी को ही विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। एक घर बसाने के लिए दस घर उजाड़े जा रहे हैं।

अनिल चमड़िया (दिल्ली) ने भाशण के आरंभ में ही कहा कि मैं न नक्सलियों की हिंसा का पक्ष ले रहा हूं और न ही विरोध कर रहा हूं फिर भी उन्होंने जोर देकर कहा कि यह समस्या उतनी बड़़ी नहीं है जितनी बताई जा रही है। उन्होंने इस विशय के कंट्राडिक्षन पर बोलते हुए भगत सिंह को षहीद मानने के संदर्भ में आदिवासी की आवाज उठाने वालों को आतंकवादी कहने पर सवाल खड़ा किया है। हिंसा पर बात करने से पहले घर में लटकी बंदूकों पर बात होनी चाहिए कि वह वहां क्यों है? पत्रवाचक के रूप में संगोश्ठी के संयोजक ने ‘नक्सली आदिवासी अंतरसंबंध: एक वैचारिक संकट’ विशय पर-निषीकांत की ‘समर्पण’ कहानी के माध्यम से नक्सलवादियों की हिंसा पर गांधी को याद करते हुए बताया कि गांधी के देष में हिंसा होना इस पीढ़ी के नीति नियंताओं के लिए चुनौती है। मीडिया और आदिवासी षोधार्थी पत्रकार श्री अरुण उराँव ने आदिवासियों का विज्ञापन की तरह प्रयोग करने पर चिंता व्यक्त की कि आदिवासी को पास बिठाया अवष्य जाता है पर उसके लिए जगह नहीं छोड़ी जा रही है। हरिाराम मीणा ने अपने अध्यक्षीय भाशण में आदिवासियों की प्रतिरोधी पंरपरा पर विस्तार से रोषनी डाली। इस सत्र में रमणिका गुप्ता और कई प्रतिभागियों ने सवाल किये। रमणिका गुप्ता ने बताया कि यदि सरकार ने आदिवसियों के सही विकल्प की तलाष नहीं की तो वे क्रांित के लिए उतारू होगा। नक्सलवाद पर बोलते हुए उन्होंने बताया कि सरकार बार-बार कहती है कि नक्सली अपनी हिंसा छोड़े तब वार्ता होगी। सरकार को अपनी हिंसा पर भी तो नकेल लगानी चाहिए। देष के प्रधानमंत्री नक्सली आन्दोलन को देष का सबसे बड़ा आन्तरिक खतरा घोशित करते हैं और गृहमंत्री उन्हें कुचलने का ऐलान करते हैं।

संगोश्ठी का पांचवा व समापन सत्र दलित आदिवासी अंतरसंबंध पर दलित चिंतक बजरंग बिहारी के पर्चे के पाठ से आरंभ हुआ। जिस पर जवाहरलाल नेहरु विष्वविद्यालय ये आये प्रोफेसर वीर भारत तलवार और डॉ. रामचंद्र ने विचार रखे। इस सत्र में आधा दर्जन पर्चे पढ़े गए जिसमें दलित सौदर्यषास्त्र, कहानी और कविता पर बात की गई। डॉ. रामचंद्र ने बजरंग बिहरी तिवारी की बातों से सहमति जताते हुए मुख्यधारा की सोची समझी साजिष व दुष्मन को समझने पर गहराई से अपनी बात रखी जिस पर प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने पूर्वोŸार भारत के आदिवासियों के खुलेपन और दक्षिण भारत के रूढिवादी ब्राह्मणों के भेद को बताते हुए आदिवासी दलित अंतरसंबंध पर साझा मंच के विचार के बजाए आदिवासियों के आंदोलन की जरूरत पर जोर दिया। इस विशय पर रमणिका गुप्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदिवासी दलितों का साझा मंच तभी बन सकता है जब आदिवासी बराबरी पर आये नहीं तो मंच को हड़पने का डर बना रहेगा।

‘‘आदिवासी पहचान का संकट’’ के सन्दर्भ में ही श्री पांचाल ने अपना पत्र वाचन करते हुए कहा कि आदिवासी षब्द को संवैधानिक मान्यता नहीं है फिर भी अनुसूचित जनजाति के स्थान पर ‘आदिवासी’ विशय पर विष्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा संगोश्ठी आयोजित करने की अनुमति दी गई है। जबकि संवैधानिक षब्द जनजाति है लोकप्रचलन में केवल आदिवासी षब्द ही रहा है और व्यावहारिक रूप से षासन मे भी आदिवासी षब्द का उपयोग हो रहा हैं इस बात का प्रमाण यह संगोश्ठी है। जनजाति का पर्याय आदिवासी को माने जाने पर इस मंच से इस विशय पर बहस करने की आवष्यकता है। चलाकर उन्हें-जनजाति, आदिवासी, वनवासी तथा गिरिजन कहा जाता है। ये चारों ही षब्द एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं होकर समानार्थी प्रतीत होने वाले भिन्नार्थी षब्द है। षब्द विमर्ष की दृश्टि से भाशाविदों की मान्यता है कि वन में निवास करने वाला वनवासी, पहाड़ पर निवास करने वाले पहाड़ी और वे स्वयं सिर्फ और सर्फ आदिवासी कहलाना चाहते हैं। जहां तक षब्द विमर्ष की दृश्टि से विष्लेशण करने की बात है तो अधिकांष विद्वान आदिवासी का अनुवाद अनुसूचित जनजाति गलत मानते हैं। जनजाति गलत इसलिए है कि इसमें जाति का बोध होता है जबकि आदिवासी समाज में जाति की कोई अवधारणा नहीं रही है।

       आदिवासी के बजाए किसी अन्य नाम से पुकारा जाना उनकी परंपरा, धर्म और नाम के साथ खिलवाड़ करना है। यह साफ है कि आदिवासी से अगर इस कौम की अपनी पहचान रही है तब किसी को भी उन्हें किसी तरह का नाम देने का गैर-संवैधानिक प्रयास करने का हक नहीं है। कोई भी षब्द यकायक पैदा नहीं होता है नहीं किया जा सकता है। षब्द ब्रह्म है। षब्द के साथ छेड़-छाड़ करना किसी परंपरा के साथ खिलवाड़ करने के बराबर है। परंपरा से मिले षब्द का आदिवासियों को न केवल इसे प्रयोग में लेने का हक है अपितु संवैधानिक मान्यता दिलाने का प्रयास करना मुनासिब है। जब बंबई से मुबंई, मद्रास से चैन्नई हो सकता है तब भला जनजाति से आदिवासी क्यों कर नहीं हो सकता है। जब परंपरा से आदिवासी रहा है तब उन्हें वनवासी करने के प्रयास नितांत गैरपारंपरिक व गैरसंवैधानिक कहे जा सकते है। इस संगोश्ठी में एक भी पर्चा वनवासी नाम से नहीं आया। जब उन्हें वनवासी कहा जाता है तब उनसे सम्मानजनक षब्द आदिवासी जानबूझ कर छीन कर उन्हंे वनमानुश बनाने का प्रयास किया जाना है।

आदिवासी वि़द्वान व आम आदिवासी जिसका प्रयोग करते हैं और इसी षब्द को लेकर भ्रम बना होना ठीक नहीं है। आदिवासी समाज को इस षब्द से भावनात्मक पहचान मिलती है अतः आदिवासी षब्द को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए संसद तक आवाज उठाई जानी चाहिए क्योेंकि आदिवासी षब्द का उपयोग स्वयं महात्मा गॉंधी, जवाहरलाल नेहरू और अन्य नेतागणों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किया जाता रहा है। षब्द विमर्ष से उपजे यथार्थ को ध्यान में रखकर आदिवासी षब्द को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया जाए आदिवासी नाम से पहचाने जाने की दिषा तय की जा सकती है।

दो दिवसीय संगोश्ठी में काफी काफी विचार विमर्ष व मंथन हुआ। प्रोफेसर वीर भारत तलवार की उपस्थिति ने बूंदी वासियों को ही नहीं देषभर से आये षोधार्थियों को आहलादित किया, कई बार बहस हुई तो कई बार चौंकाया। ‘आदिवासी शब्द विमर्ष’ पर पढ़े गए गुलाब चन्द पांचाल के पत्र ने संगोश्ठी का माहौल ही बदल दिया और प्रथम दिन के अंतिम सत्र में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास किया गया कि न जनजाति न वनवासी न गिरिवासी, उन्हें न केवल कहा जाए अपितु संविधान में संषोधन किया जा कर केवल आदिवासी कहा बोला जाए। रमणिका गुप्ता ने हवाला देकर बताया कि हम पूर्व में इस बात पर जनजाति कहने पर पुर जोर से विरोध कर चुके हैं। इस पर प्रस्ताव लिया ही जाना चाहिए। वीरभारत तलवार ने आदिवासी और साहित्यिक सरोकार पर बोलते हुए इस बात का समर्थन किया। पूरा सदन एक मत रहा कि उन्हें किसी अन्य नाम से नहीं उन्हें उनकी परंपरा से मिले नाम आदिवासी से ही जाना जाए। डॉ. मुंडा के षब्दों में कह सकते हैं कि उन्हें हाषिये की संस्कृति कहना गलत है क्योंकि आदिवासी समाज में बहुत-से मूल्य, मान्यताएं और पर्यावरण को बचाने वाली परंपराएं रही है जो आज के बिगड़ते पर्यावरण के लिए अति आवष्यक है।

 प्रस्तुति 
डॉ अनीता यादव, डॉ. सीयाराम मीणा,
 राज. महा. बूंदी
(यहाँ इस रपट में फॉण्ट  में तकनीकी खराबी से ''श'' और ''ष'' की लिखावट में बहुत से प्रिंट की गलतियाँ है,माफ़ करिएगा-सम्पादक . )
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