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आलेख:-डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से आरम्भ भोजपुरी सिनेमा के 50 वर्ष पूरे-रीता विश्वकर्मा

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, जनवरी 28, 2011 | शुक्रवार, जनवरी 28, 2011


रीता विश्वकर्मा
अकबरपुर,अम्बेडकरनगर
9369006284
reetavik@rediffmail.com, 
reeta@rainbownews.in     

फिल्में मनोरंजन ही नहीं अपितु जन जागरण का भी एक सशक्त माध्यम हैं। हमारे देश में हिन्दी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्मों का निर्माण हुआ है और हो रहा है, हालांकि हिन्दी फिल्मों का निर्माण जिस तरह हो रहा है उस तरह इलेक्ट्रॉनिक यन्त्रों का प्रचलन बढ़ा है तब से सिनेमाघर लगातार बन्द होने लगे हैं, और दर्शक बड़े पर्दे पर फिल्में देखकर घर के छोटे कमरे में बैठकर उनका आनन्द उठाते हैं। फिल्म एक ऐसा माध्यम है जो जिस भाषा में बनती है उसी क्षेत्र की संस्कृति को दर्शाती है। सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओं के अलावा फिल्मों में मनोरंजन हेतु गीत-गाने स्टंट (मारधाड़) आदि का चित्रांकन पटकथा के अनुसार किया जाता है। भोजपुरी भाषा को पुरबिया भाषा कहते हैं, जो उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से शुरू होकर बिहार, झारखण्ड आदि प्रदेशों में बोली जाती है। प्रदेश के पूर्वांचल गोरखपुर, बलिया, देवरिया, गाजीपुर, मऊ, वाराणसी, चन्दौली, जौनपुर, आजमगढ़ जिलों सहित बिहार, झारखण्ड प्रान्तों में भोजपुरी भाषा बोली जाती है।

वर्तमान समय से दो दशक पूर्व सिनेमा घरों मेंहाउस फुलका बोर्ड लटकता देखा जाता था बवह बात नहीं ह। एक जमाना था जब फिल्मों को सिनेमाघरों में देखने के लिए अपार भीड़ उमड़ती थी। हिन्दी फिल्मों का जमाना था बीच में 60-70 के बीच भोजपुर फिल्मों की धूम थी। ये क्षेत्रीय भाषा की फिल्में मनोरंजन से भरपूर हुआ करती थीं। बहुत कम ही हिन्दी भाषी लोग जानते होंगे कि भोजपुरी भाषा में फिल्मों का निर्माण कब और किसकी प्रेरणा से शुरू हुआ। तो आप भी जानें कि भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की प्रेरणा देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद ने दी थी। उनकी प्रेरणा का असर गाजीपुर निवासी मुम्बई में फिल्म अभिनेता नाजिर हुसैन और झरिया-धनबाद की कोयला खदान के मालिक विश्वनाथ शाहाबादी पर पड़ा और इन दोनों के प्रयास से प्रथम भोजपुरी फिल्म का निर्माण हुआ। पहली भोजपुरी फिल्म का नाम था ‘‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’’ इसके निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी, निदेशक कुन्दन कुमार, गीतकार शैलेन्द्र, संगीतकार चित्रगुप्त नायक असीमकुमार और नायिका कुमकुम थे। इस फिल्म का मुहुर्त पटना में हुआ और प्रथम प्रदर्शन वाराणसी के प्रकाश सिनेमाहाल में हुआ था। हम अपने पाठकों की जानकारी के लिए यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं भोजपुरी फिल्मों के निर्माण के 50 वर्ष पूरे होने पर एक रिपोर्ट-

दैनिक जागरण गोरखपुर संस्करण में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत धर्मेन्द्र कुमार पाण्डेय की दैनिक जागरण में छपी एक रिपोर्ट पढ़ा जिसमें उन्होंने भोजपुर सिनेमा के 50 वर्ष पूरे होने का जिक्र किया था, और उसमें दी गई जानकारी भी काफी रोचक लगी। धर्मेन्द्र कुमार पाण्डेय से सम्पर्क कर उनसे उक्त रिपोर्ट को रेनबोन्यूज के लिए मांगा गया, फिर भी आलेख नहीं मिल पाया। सोचा गया कि क्यों इसे अपने ढंग से पाठकों की जानकारी के लिए प्रकाशित किया जाए। यहाँ प्रस्तुत है भोजपुरी सिनेमा के 50 साल पूरे होने से सम्बन्धित रोचक जानकारी।

पाण्डेय के रिपोर्ट अनुसार देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद ने भोजपुर फिल्म बनाने की प्रेरणा दिया था। परिणाम स्वरूप 16 फरवरी 1961 में ‘‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’’ नामक भोजपुरी फिल्म का निर्माण शुरू हुआ जो अपने प्रदर्शन उपरान्त सुपर हिट हुई। इस फिल्म के बाद भोजपुरी फिल्म निर्माण का दौर चल पड़ा। उक्त रिपोर्ट के अनुसार 1950 के उत्तरार्ध में मुम्बई में एक फिल्म एवार्ड का आयोजन हुआ, जिसमें डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद मुख्य अतिथि थें। इसी कार्यक्रम में 0प्र0 के गाजीपुर जिले के निवासी और बालीवुड फिल्म अभिनेता नाजिर हुसैन की मुलाकात डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद से हुई। बातचीत के दौरान राजेन्द्र बाबू ने नाजिर हुसैन को भोजपुरी फिल्म बनाने का मशवरा दिया। डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद की बात से प्रभावित होकर फिल्म अभिनेता नाजिर हुसैन ने भोजपुरी फिल्म ‘‘गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबो’’ की पटकथा लिख डाली और निर्माता की तलाश शुरू कर दिया।

इसी दौरान नाजिर हुसैन ने कोयला खदान मालिक विश्वनाथ शाहाबादी से बात किया। विश्वनाथ शाहाबादी भी भोजपुरी बनाने को लेकर डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद से प्रेरित थें। शाहाबादी मुम्बई पहुँचे और दादर के प्रीतम होटल में ठहरें वहीं नाजिर हुसैन के साथ पहली भोजपुरी फिल्म ‘‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’’ के निर्माण की योजना बनी। फिल्म के निर्देशक की जिम्मेदारी वाराणसी के कुन्दन कुमार को सौंपी गई। इस फिल्म में नायक असीम कुमार और नायिका कुमकुम थीं। इसके अलावा पद्मा खन्ना, रामायण तिवारी समेत कई कलाकारों का चयन हुआ। फिल्म में संगीत दिया था चित्रगुप्त नें और गीतकार थें शैलेन्द्र।

फिल्म की टीम तैयार होने के बाद 16 फरवरी 1961 को पटना के शहीद स्मारक में मुहूर्त हुआ और दूसरे दिन से शूटिंग शुरू हो गई।गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबोके निर्माण उपरान्त 5 फरवरी 1962 को वाराणसी के लहुराबीर स्थित प्रकाश टाकीज (जो अब बन्द हो चुका है) में प्रदर्शित हुई। तब तक देश के डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति पद से अवकाश प्राप्त कर चुके थें, और पटना स्थित सदाकत आश्रम में रहते थें। राजेन्द्र बाबू उस समय अस्वस्थ थें, जिसकी वजह से फिल्म निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी उन्हें यह फिल्म दिखाने के लिए सदाकत आश्रम पहुँचें और आश्रम में ही एक विशेष व्यवस्था कर डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद को पहली भोजपुरी फिल्म ‘‘गंगा मइया तोहे चुनरी चढ़इबो’’ दिखाया। इस प्रथम भोजपुरी फिल्म को देखने के लिए अपार भीड़ उमड़ी थी। वाराणसी के बाद यह फिल्म दिल्ली के कनाटप्लेस स्थितगोलचासिनेमा में विशेष रूप से प्रदर्शित की गई, जिसे देखने के लिए लाल बहादुर शास्त्री, बाबू जगजीवन राम तथा सत्य नारायण सिन्हा पहुँचे थे। ये गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, पियवा से कर दे मिलनवा कि हाय राम......इस गीत को स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया था जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इस प्रथम भोजपुरी फिल्म की अपार सफलता के बाद लगभग एक दशक तक कई भोजपुरी फिल्में बनीं और सफल रहीं इनके विदेशिया, लागी नाही छूटे राम, नइहर छूटल जाए, हमार संसार, बलमा बड़ा नादान, कब होई गवनवा हमार, जेकर चरनवां में लगलें परनवा, सीता मइया, सइंया से भइले मिलनवा, भौजी, गंगा आदि प्रमुख हैं।
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