(सम्पादकीय) मन कचोटता है-1 - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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(सम्पादकीय) मन कचोटता है-1

पाठक साथियों,
नमस्कार 
                     इस गणतंत्र पर बहुत सी शुभकामनाओं के साथ मैं अपनी माटी वेब पत्रिका परिवार की तरफ से आप सभी के लिए इस नए साल में बहुत सी मंगलकामनाएं मन मैं दबाए रखे था,आज उजागर करता हूँ. देश में कई तरह से उलटफेर की कवायदें चल रही हैं.देश के पैसे को देश में लाने के लिए कुदाफांदी चल रही हैं .होना करना कुछ नहीं है,ऐसा मेरा मन कहता है.साहित्य जगत में जयपुर साहित्यिक उत्सव का भी हम पर पूरा असर हैं.पहली बार किसी साहित्यिक उत्सव को इस तरह से व्यावसायिक अंदाज में देखा सुना है.आयोजन को लेकर तरह तरह की रपटें हमने पढी है. इन सभी के बाद भी दिल कहता है चलो साहित्य के प्रचार प्रसार को लेकर कुछ तो हो रहा है.वैसे भी अभी साहित्य,कला और पुरातन महत्व के आयोजन को अच्छे प्रायोजक मिलना आश्चर्यजनक  लगता है.सभी कहते हैं अच्छा समय जल्द आयेगा.ये तो हमारा मन जानता है कि अच्छे समय के इंतज़ार में हमारी आँखें कितनी हद तक बुढ़ा गई हैं.अब प्रायोजक जात के इन उद्योगपतियों को कौन समझाए कि कुछ आयोजन ऐसे भी होते हैं जिनसे सीधा लाभ नहीं मिल सकता,ये बात कौन समझाएं उन फेक्ट्री मालिकों को जिन्हें खुद आगे हो सामाजिक दायित्व निभाने चाहिए.कहो न कहो ये ही आज के राजा महाराजा है.ये और बात है कि राजा महाराजा के काल में भी साहित्य जगत और कलाकारियों का कितना भला हुआ है,सब जानते हैं..समय के साथ बहुत बदलाव हो रहे हैं. मगर गलत दिशा में होने वाले बदलाव मन को हिला देते हैं.

                   इसी माह तीन बड़े कलाकारों के साथ कुछ समय बातचीत का मौक़ा मिला.बातों के बीच से निकले मुद्दों में मैंने यही पाया कि समय की मांग है कि कलाकार भी अपनी कलाकारी के लिए व्यावसायिक दौड़भाग करें. जब समाज ही अपने दायित्वों में पीछे हटा जा रहा है तो ये प्रवृतियां तो सामने आएगी ही.आखिर कर साहित्य और ललित कलाओं से जुड़ाव वाले ये मानुस भी अपने घर परिवार को लेकर बैठें हैं.आयोजनों में मिलने वाले मानदेय के पीछे की कहानियां भी झकझोरने वाली होने लगी हैं,जिसमें कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ता कलाकार मंडली से ज्यादा तो आयोजक कम्पनियां खुद ही खा जाती है,और गुरुओं का भरपूर शोषण होता है.तमाम बातें हैं.एक बातौर कि आज़कल स्वयंसेवा की भावना कमतर होती दिख रही हैं वहीं कोई पूर्णरूपेण सेवा के भाव काम करता दिखे तो उसे संदेह की नज़र के काबिल मान लिया जाता है.समय बड़ा ही बेढंग की चाल चल रहा है. ऐसे में कदमों को संभल कर रखने की सलाह है.


               इन सभी बातों के बीच ही मन कचोटता है कई बार.समाज में चौतरफा बदलाव के हालात में रद्दोबदल कर दिशा और दशा ठीक करने का मन करता है.मगर सारे काम धीरे-धीरे ही अपनी गति पकड़ेंगे,यही सोचकर फिर से अपने विचारों को कुछ और साथियों तक फैलाने में लग जाते हैं.कभी तो ये समाज का ढांचा हमारे मन का होगा.बस आस लगाए बैठे हैं.एक और दीगर बात कि  जनवरी के अंत में ही देशभर के आमजन में ''मिले सुर मेरा तुम्हारा'' के ज़रिए अपनी छवि बनाने वाले विराट कलाविद पंडित भीमसेन जोशी का चला जाना बहुत अखरेगा.हो सकता है कि अजानकार उन्हें भारत रत्न होने से आदर देते होंगे,मगर जानकार और कानकार लोग उनकी गायकी की ऊंचाइयों से भलीभांती वाकिफ हैं.उस महान इंसान और गायक को हम दिल से याद करते हैं.साथ ही साहित्य और कला जगत के उन तमाम सक्रीय संस्कृतिकर्मियों को बहुत बधाइयां ,जिन्हें हाल ही में घोषित किए पद्म सम्मान और केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी सम्मान से नवाज़ा गया है.

                 ''अपनी माटी'' के जनवरी अंक में हमने अपने साथियों के सहयोग से ज्यादातर कविताओं और आयोजनों की रपटों पर ध्यान दिया हैं.इस अंक से कुछ कॉलम हमने आरंभ किए हैं.जैसे ख़ास व्यक्तित्व जिनमें आपको माहवार एक व्यक्तित्व से परिचित कराएंगे.इस बार इस कॉलम के लिए हाल ही में बिहारी सम्मान से नवाजे गए कवि हेमंत शेष के जीवन परिचय पर डॉ. ममता शर्मा की कलम आपको ज़रूर भाएगी.हमेशा की तरह पत्र पत्रिकाओं की जानकारी और पुस्तक समीक्षाएं यहाँ उपस्थित रहेगी. कवितायन कॉलम में यथासमय रचनाएं प्रकाशित होती रहेगी. इस बार भी डॉ. वीरेंद्र  सिंह गोधारा जैसे बुजुर्ग रचनाकार के साथ ही सौरव रॉय और अरुणचन्द्र रॉय जैसे युवा साथी शामिल किए गए हैं.रचनाधर्मी साथी कौशल किशोर और मिथिलेश धर दुबे के आलेखों के साथ ही इस बार डॉ. महेंद्र प्रताप नन्द का एक गीत भी पढ़ने योग्य है.आमने सामने में इस बार चित्तौडगढ के फड़चित्रकार सत्यनारायण जोशी से बातचीत इस कलाकारी और कलाकार की दशा पर के बारे में प्रकाश डालेगी.इसी कॉलम में प्रसाशनिक अधिकारी और लेखक राजकुमार सचान से रिज़वान चंचल की बातचीत भी पढ़ने को मिलेगी.


              हमारे अल्प निवेदन पर डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने हमें जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल के कुछ चुनिदा छायाचित्र उपलब्ध करवाएं हैं.इस अंक में हमारे युवा लेखक और शोधार्थी पुखराज जांगिड और डॉ. ओम निश्चल की लिखी समीक्षाएं भी कुछ वज़न बढ़ाएगी.कवि प्रेमचंद गांधी,नन्द किशोर शर्मा,जे.पी.भटनागर,ओम प्रकाश जोशी,दुलाराम सहारण सहित राम पटवा के हम आभारी हैं जिनके सहयोग से ज़रूरी आयोजनों की सार रूप में रपट यहाँ प्रकाशित कर पाए हैं.  अंत में कुछ सार समाचार मिलेंगे जो लगभग हर अंक का हिस्सा बनेंगे.

फरवरी अंक को और भी सार्थक और जानकारीभरा बनाने की कोशिश के साथ.मैं आपकी तरफ से मिलने वाले समुचित सुझावों का इंतज़ार करूंगा.इस वेब पत्रिका को आपके साथ साझेदारी में यूंही आगे बढ़ाने की कामना के साथ इस काम में लगे हमारे साथी पूर्णरूपेण अव्यावसायिक रूप से कार्यरत हैं.इस मंच हेतु आप अपनी सभी प्रकार की प्रकाश्य सामग्री यथासमय भेजते रहें,हम उन्हें समुचित स्थान देने का पूरा प्रयास करेंगे.बाकी सानंद




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