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रपट:-जयपुर विरासत अंतर्राष्ट्रीय समारोह-2011

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, जनवरी 08, 2011 | शनिवार, जनवरी 08, 2011

लेखक और कवि
प्रेमचंद गांधी
जयपुर,राजस्थान

09829190626
prempoet@gmail.com

सदियों से चली रही एक कथा को कितनी खूबसूरती से कहा जा सकता है, इसका अंदाज कल शाम बिड्ला सभागार में संगीतमय नाटकआज रंग हैकी प्रस्तुति देखने के बाद हुआ। हिंदी के अप्रतिम कवि नरेश सक्सेना की अत्यंत प्रतिभावान पुत्री पूर्वा नरेश के लेखन और निर्देशन में भारतीय समाज की मिली जुली गंगा-जमनी तहजीब की यह बेहद मार्मिक कहानी थी, जिसमें रह-रह कर दर्शकों की आंखों में आंसू आते थे और इस तहजीब को नष् करने वालों पर गुस्सा आता था। एक मोहल्ला है जिसमें हिंदू और मुसलमानों के घर हैं, देश के किसी भी मोहल्ले की तरह। दो मासूम बच्चियां हैं, जो नहीं जानती कि मजहब कैसे एक-दूसरे को अलग करता है। उनकी मासूमियत से कथा शुरु होती है, जिसमें उनकी बाल-सुलभ जिज्ञासाएं हैं। इन जिज्ञासाओं का समाधान करने वाली एक तरफ तो शास्त्रीय संगीत की गायिका हैं वेणी बाई और दूसरी तरफ हैं बूढी अपाहिज बुआ। वेणी और बुआ की जुगलबंदी में दो समांतर कथाएं चलती हैं। वेणी के पास तमाम सवालों के जवाब भारतीय संगीत की परंपरा में हैं, जिसके नायक हैं अमीर खुसरो। आज के सवालों के जवाब संगीत के इतिहास में से निकाल कर लाने की वेणी की अदा एक ऐसे सांगीतिक वातावरण की सृष्टि करती है कि दर्शकों के सामने अतीत वर्तमान की खिड्की से एक झीने पारदर्शी वितान में खुलकर नुमायां होने लगता है। बुआ के गमों में सबसे बडा गम है, उसकी प्यारी बहन सरीखी सहेली शन्नो का बंटवारे वक् पाकिस्तान चला जाना।

इस कथा में एक उपकथा प्रेम की चलती रहती है जो आगे जाकर मुख् कथा हो जाती है। शारदा और फन्ने मियां के प्रेम का प्रसंग एक कस्बाई रूमानियत और लुकाछिपी के बीच परवान चढता है। जहां दोनों बच्चियां बडी मासूमियत के साथ दोनों के बीच संवाद की संवाहक बनती हैं। फन्ने मियां जब पहली चिट्ठी शारदा के नाम लिखते हैं तो बुआ पकड़ लेती हैं और वो प्रेमपत्र बाकायदा चौपाल में सुनाया जाता है। फन्ने मियां की भाषा को लेकर बहस होती है और जुबान दुरुस् करने की हिदायत के साथ अंग्रेजी सिखाने के लिए मास्टर नियुक् किया जाता है। लेकिन दोनों प्रेमी संवाद के लिए प्रेम की एक अलग भाषा ईजाद करते हैं जो बच्चियों के माध्यम से मंच पर आती है। वेणी बाई इस कूट भाषा को भी तोड़ लेती हैं और बताती हैं कि कैसे हजरत अमीर खुसरो साहब ने अपनी राग-रागिनियों में इस किस् की भाषा का इस्तेमाल किया था।

सांप्रदायिक नफरत की आग में प्रेमकथा भी स्वाहा हो जाती है, लेकिन वेणी का विश्वास बचा रह जाता है कि तमाम किस् की तकलीफों और दुश्वारियों के बीच इंसानियत कभी खत् नहीं होनी चाहिए। इसी बात को पुष् करने के लिए अमीना अपने बूढे मामा के पास बरसों बाद लौटकर आती है। अमीर खुसरो और बादशाह की समांतर कथाएं दर्शकों के लिए एक ऐतिहासिक आस्वाद लेकर आती हैं कि मिलीजुली तहजीब को बनाए रखने और बचाने में संगीत का कितना बड़ा योगदान है।

पूर्वा नरेश ने रितिक रोशन की कृश सहित कई फिल्मों में सहायक निर्देशन किया है। उनकी इस प्रस्तुति में सिनेमा के उन सारे उपकरणों का बेहतरीन प्रयोग किया गया है जो नाटक को दर्शनीय बनाते हैं। लखनउ के उस्ताद कव्वालों की टीम जब अमीर खुसरो के कलाम गाती है तो नाटक के साथ संगीतमय सांझ सिरजने लगती है। इतिहास और वर्तमान को अलगाने के लिए मंच को एक झीने परदे से दो हिस्सों में बांट कर पूर्वा ने एक सिनेमेटिक प्रभाव पैदा किया जो लुभाता है। सभी कलाकारों ने बेहद उम्दा अभिनय किया। प्रकाश परिकल्पना का जादुई प्रभाव प्रस्तुति को मोहक बनाता है।

जयपुर विरासत अंतराष्ट्रीय समारोह के अंतर्गत जयपुर सिटीजंस फोरम की यह प्रस्तुति जयपुर के दर्शकों को बरसों तक याद रहेगी। क्योंकि जयपुर अपने आप में मिलीजुली गंगा जमनी तहजीब का एक ऐतिहासिक शहर रहा है। इस शहर में आज भी इस नाटक जैसी कथाएं मौजूद हैं जिनसे इस शहर की साझी संसकृति की पहचान पुख्ता होती है।
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