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कविताएँ:-माणिक,चित्तौड़गढ़,राजस्थान

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, जनवरी 08, 2011 | शनिवार, जनवरी 08, 2011

मिले सुर मेरा तुम्हारा
सज्जन,कर्मठ और ज्ञानवान
धरे रह जाएंगे
फिर से इस बार
तिरंगे पर
चापलूस सम्मान पा जाएंगें
गुपचुप सूचियाँ बना करेगी
तयशुदा नामों की
कुछ दिखावटी दांत हँसेंगे
कुछ तो छला जाएगा
शॉल-नारियल कांख दबाए
घूम रहे हैं कुछ लोग इधर
सम्मानित होने जैसे
ठेठ उपर तक की सिफारिश है
जाएंगे कहाँ भला ईनाम बचकर
सोच-सोचकर माथा ठनके कि
जो देने वाले हैं
लगता है कई बार
वो ही पाने वाले
इनके हित परम्पराएं फिर टूटेगी
क़ानून लांघे जाएंगे
फिर से आज टुकड़मबाज़ सम्मानित होंगे
बरसों से खड़े पंक्ति में कुछ लोग
बुढ़ाए और बारी के इन्तजार में
ओढ़े तन पर स्वाभिमान की चादर
एक बार फिर छूट जाएंगे
करे भी तो क्या
फितरत यही इन मंचों की
बैठें हैं लोग
इधर के और उधर के
अखबारी कतरन में जी अटकाए
कुछ लोग बिचौलिए
कुछ अफसरजात
डूबे हुए हैं इसी गलतफहमी में
उनका चुना हुआ ही असली है
और असल काम वाला नकली जैसा
गढ़ दी हैं नई परम्पराएं जैसे
तुम मुझे बुलाओ
मैं तुम्हे बुलाऊँ
चले सफ़र यूंही अपना
अपनों में ही बंटे ईनाम
कोई और ले जाए
सांठ-गाँठ का ये आलम
बरसों चले हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा

बस्ती में शीतलहर
नोचती खरोचती सी दिखी
शीतलहर बस्ती में
तब भी खेतिहर डटे रहे
मजदूर मिले खेतों में जूते हुए
पाला पड़ा जब मेढ़ों पर
सडकों पर कोहरा छाया था
फसलें बेचारी कांपती रही
कोसती रही छिटपुट जोतों का बंटवारा
दुबका रहा दोपहर तलक
बादलों की ओट में कहीं सूरज
पेड़ हिले पत्ते गिरे
बाहर निकले ढोर
ग्रहण लगा था आजु-बाजू
सबकुछ ठिठुरा दिनभर
बूढ़े गंठड़ी से दुबके दिखे रजाइयों में
बस्ती के बच्चे मिले उस रोज़
पुश्तैनी गंध सने कम्बलों के हवाले
ठण्ड से करते हाथापाई
उग आई थी ठण्ड की बैलें एकाएक
हर झोंपड़े के आँगन में
पता नहीं कब पसरी
चढ़ गई छत तक जा बैठी
कान खुजाते कुत्ते भी थे
उस आलम के हिस्से में
कुछ धूप ढूँढते गधे दिखे
पिल्लै रोते रहे दिनभर
दिल पसीजा शीतलहर का
तनिक शर्म आई उसे
पहले ही ठंडा जीवन था जिनका
बस्ती का राम सहारा था
शहर में लूट ली जाती वैसी
योजनाओं की गर्मी यहाँ कहाँ
दमखम वाले युवा तक काँप उठे
अलाव तापते मिले
दुशालों में लिपटे पूरे
इनकी सर्दी कौन हरेगा
अब कौन ये मौत मरेगा
व्याकुल मन में प्रश्न बड़े हैं
कुछ उलझे कुछ आतुर
कैसे भूलूँ उस दिन को
बहुत से अनुत्तरित प्रश्नों के साथ
जब बस्ती में घूस आई शीतलहर

मावठ में मुलाक़ात
बादल बरसे पूरे मन से
तो आज मिला आराम
पान थूंकी दिवारें धूल गई
संकड़ी गलियाँ चमक उठी
कामनाएं पूर गई
आज मिला आराम
बहता पानी पोंछ गया
घू-गंदी के आंगन को
किस मुंह से याद दिलाऊँ
ज़मीं गड़े खूंटों पर कभी
बंधा करते थे सजे-धजे हाथी
घोड़े ऊंट नाचते थे
जी बहलाते थे नट-नटनी
यूं इतिहास बुना करते थे
बाकी बचा ऐसा आलम
शान-शौकत चली गई
मुझ जर्जर को अब कौन सहे
अटकी रहती खुशी मेरी फिर भी
अब कुछ बातों में
कल आकर खेलेंगे इतवारियाँ दोस्त मेरे
बिखरेगा आनंद चौकों-छक्कों में
कि खुल कर सांस लूंगा तब में जीभर
यही बचा रहा इस ढ़लान पर
हाँ दो बातें पक्की है
खींच ले जाएंगे दो-चार फोटू
फिरंगी आज आकर यहाँ
देख नहाया मुझको
आएँगे बस्ती के लोग भी
कोई देख,नोच,पिचक कर जाएगा
हांग मूत चले जाएंगे बाकी बचे हुए
जैसा भी हूँ खड़ा हुआ हूँ
डटा हुआ हूँ ससम्मान
भीख मांगना मुझे आता
आकर कोई तो चूमेगा पलभर
सहलाकर देगा थपकीभर नींद
आस बचाए बैठा हूँ
आज़ादी के इस आलम से
कुछ तो अच्छी थी वो जकड़न
पुरखे भी पूछा-ताछा करते थे
बिन बरखा ही धूल जाता था
बिन कहे सब मिल जाता
जानता हूँ
भारी बरखा अब बीत गई है
अब तो बूंदाबांदी ठहरी


वही मेरा गाँव है

सतरंगी हो जाए शहर भले ही
गाँव का अपना रंग आठवां
गाँव सभी हैं एक सरीखे
दबे,कुचले और धंसे फंसे
यहां जाने वाला बाएं चलता
आने वाला बाएं
जहां बैलगाड़ी चलती बिचोंबीच
वही मेरा गाँव है
मक्का से चलता गुज़ारा
किसी का सालभर यहां
किसी का घर गुलज़ार है
अब भी जिमने की पंगत अलग लगती है
कुछ जातियों के हित आँख टपकती है मेरी
और
कुछ जातियां आँख खटकती है
खटकन और टपकन के बीच बसा जो
वही मेरा गाँव है
मंदिर में दिया जलाते हैं कोई
मस्जिद में शिश झुकाता कोई
कुछ लोग ऐसे भी ज़िंदा अब तक
जो सेठों के चरण दबाते
बेलगाम ब्याज के घोड़े दौड़ते हैं
बस कुचला जाता गरीब सुबह-शाम
वही मेरा गाँव है
कुछ जातियां न्याय करती
अब भी कुछ जातियां सेवा
कुछ बेचारी दंड भोगती है
जहां क़ानून रोज़ लांघता है आदमी
वही मेरा गाँव है
कोई टी.वी. में धंसा हुआ है
कोई चिपका मोबाइल से
बचिकुची फुरसत में बुज़ुर्ग बतियाते हैं
वहीं मेरा गाँव है
कुछ लोग अरसे से छलते हैं
छले जाते बस मज़बूर
घौर लूटपाट का आलम पसरा जहां
वही मेरा गाँव है
वोट मतलब बोटलभर शराब यहाँ
यूं अधिकारों से आदमी अनजान है
आँखें मूँद लेती सरकार आकर जहां
वही मेरा गाँव है

बंटवारा
जी करता है आज बाँट लें
किले की सारी दौलत
कुछ तुम रख लो,कुछ मैं रख लूं
ये हम सब की माया
आदार तुम दे पाओ शायद
कुछ धन जुटा लो जल्दी
कलियुग की लूट कहा लो भले
बस जितना आया,उतना पाया
चढ़ावा देते मंदिर
लालची लोग ले जाएं चाहे
खंडित मूर्तियाँ ही दे देना मुझे
स्वार्थ यही पलता है मन में
धीर धरूं और ध्यान करूं
यहीं रहे सब कुछ वैसा ही
कुछ तोड़फोड़ होए
बगिचों की आभा उनके हिस्से
लिख दो सरोवर का पानी इस पार
सीताफल की फसल उन्हें दे दो
फरक नहीं मुझको चाहे कम मिले
हिस्से में उनके चारागाह जाए
मेले की धक्का-मुक्की मुझको
तीज-त्योंहारी आलम वे छीन लें भले
मेला उठने पर पिछे बचा कूड़ा-करकट
खुद अवेरना मैं चाहूँगा
चमकीले गुम्बद नहीं चाहता तनिक
हालिया जिर्णोद्धार से निबटे
दरवाजे दे दो उन्हें
जो देर तलक यहाँ नज़रें लगाए बैठे हैं
मैं तकता हूँ बिखरे पत्थर
बसता है इतिहास कहीं जिनमें
टिकट वाले स्तम्भ-संग्रहालय
मांगूं चाहूँ
तथ्य बतलाते गाइड दे देना बस
बचाना सत्यानाशी लपकों से
जुबां पर जिनके तथ्यों से भारी भाव है
जानता हूँ पहले से ही
हरे पेड़ उनको चाहिए होंगे
दे दो उनको भले मगर
भूल जाना मुझे चाहिए
उदड़ी हुई दिवारें,बेतरतीब मैदान
गोरा-बादल,जेमल-फत्ता की गाथाएं
तुम भी जानो,हम भी जाने
मीरा-पन्ना की इस माटी को
पढ़ा बहुत किताबों में
हाँ और कुम्भा-रतन हुआ करते थे
ये सारे पौथी-पानड़े उनको दे दो
भाव इन पुरखों का
बक्श देना मुझको बस
जिसकी ज्यादा आदत है
ऐसा हो बंटवारा बस
उनकी बात भी रह जाए
और दिल मेरा भी रह जाए

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