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पुस्तक-समीक्षा :- ‘यह वक्त, वक्त नहीं मुकदमा है!’– पुखराज जाँगिड़

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, जनवरी 08, 2011 | शनिवार, जनवरी 08, 2011

मध्यप्रदेश के जौलखेड़ा, बैतुल में जन्मे देसी राग-रंग और जीवन से भरे पठारी-सौंदर्यबोध के कवि चंद्रकांत देवताले ने बीते 7 नवंबर को 75वें वर्ष में प्रवेश किया। आकाश की जात बता भइया मई-2010 में आया 42 कविताओं का उनका नया कविता-संग्रह है और यह आम-पाठक को समर्पित है- उन सबको जिनके हाथों में है यह पुस्तक/और जो मौजूद हैं इन कविताओं में.../और उनको भी जिन तक/पहुंचने को विकल मेरी आवाज... दरअसल यह पुस्तक हिंदी में पुस्तक-संस्कृति की वापसी और साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने की जयपुर के मायामृग (बोधि प्रकाशन) की एक आंदोलनधर्मी जिद बोधि-पुस्तक-पर्व-योजना की सौ रुपए में दस किताबों के पहले सैट का हिस्सा है। खटाक् से खुलते चाक़ू की तरह शीर्षकीय-भूमिका में उन्होंने अपनी काव्य-यात्रा(1973-2010) को अपनी नौ चुनिंदा काव्य-पंक्तियों में पिरोया है। इन्हें उनकी संवेदना के विकास के नौ काव्यात्मक सोपान माना जा सकता है।

आकाश की जात बता भइया की पत्थर फेंक रहा हूँ’ और विशेषणों का सांड युद्ध कविता बताती है कि व्यवस्था की दोमुँही क्रूरता में भूखा-प्यासा-जन जान नहीं पाया गुणगान के हथियार से हुई उसकी मौत। ऐसे विकट समय में धरती के बाँझ बनाने की साजिशों को सूंघ...रंभाती गाएं...धरती की दीवारों से झांकती अनगिनत आँखें... (और) बछड़े का विकल हेरना कवि के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। हमारे पत्थर के देवताओं-आकाओं की नजर में सच बोलने वाली नहीं है ये जनता...फर्जी लोग..विरोधी पार्टी के भाड़े पर...यानी इस चमकदार जनतंत्र में सिर्फ जनता ही का नामोनिशान नहीं। दोगली व्यवस्था के प्रति ये कविताएँ आलोचनात्मक रूख अख्तियार करती चलती है। ‘समुद्र को टुकड़ों में बाँटने वालों/मनुष्य की विपदा के मलबे को अखबारों से ढाँपने वालों/…लहूलुहान माथे को नोंचती पूछ रही है माई-/आकाश की जात बता भइयाधरती का धरम बताधुएँ के पहाड़ में पथराई आँखों की चुप्पी के ईश्वर का नाम बता?’

चंद्रकांत देवताले की कविताएँ समकालीन कविता का प्रतिनिधित्त्व करती है, सामाजिक यथार्थ से सीधे मुटभेड़ करती है और प्रचलित सौंदर्यबोध के उलट नए सौंदर्यशास्त्र का निर्माण कर उसे नई-भाषा और नया-शिल्प प्रदान करती है। वह बच्चों की मासूमियत में छिपी सच्चाई, ‘अँधेरी दिशाओं में डगमग आगे बढते/ रोशनी के पदचिह्नों को/ उमंग और उम्मीदों से निहारते लोगों,मेमनों की तरह दयनीय चेहरोंदीवारों पर गालियाँ लिखते और बीड़ी के अद्धे ढूँढते बच्चों में भविष्य खोजती है। उनकी कविताएँ भाषा-शिल्प और संवेदना के तीनों स्तरों पर रेगिस्तान के बंजरपन और पठार के सूनेपन को एकसाथ साधती है। भूमंडलीय बाजार में परिवर्तन और जीवन एक-दूसरे के पर्याय बन चुके है बावजूद इसके उनके सरोकार लोक (गाँव-गुवाड़) और जन (सामान्य-मध्यवर्ग) से जुड़े है- वहाँ माँगा-देही का रिवाज नहीं/ समझाया था पहले ही/ फिर भी तुम बाज नहीं आए/ आदत से अपनीवहाँ इंदौर में नींबू माँगकर तुमने/ यहाँ उज्जैन में मेरी नाक ही कटवा दी, रोजमर्रा के जीवनानुभवों का रचनात्मक-संस्पर्श इनमें देखने की बात है।जन-सरोकार और पाठक तक पहुँचने की उनकी चाह अभिभूत करती है। यह इसलिए भी सुखदायी है क्योंकि इस बहाने कविताओं में वास्तविक भारतीय-लोकजीवन की वापसी हुई है।
दरअसल यह समय कविता में लोकजीवन के उभार का है, घट्टी, जीमना, धनी-धोरी, पहुनचारी, अबूझमाड़, बागड़, साइत,उमच जैसे ठेठ लोक शब्दों की वापसी का है। आखिर कबतक हम नकलची दुनिया के गुण गाएँगे। घट्टी पीसती औरत के बिंब की मौजूदगी उनकी कविताओं को ताकत देती है तो हमारे समय की भीतर तक हिला देने वाली त्रासदी चूर-चूर बिखर रहे माँ के कलेजो और बाई के दरद’  को भी उजागर करती है-बस एक विधवा/अपनी बेटियों को जीवित नहीं बचा पा रही थी तो/मारकर बचा लिया और मर गई। चंद्रकांत देवताले आदमीयत और आदमीविहिन इस समाज में वक़्त की नब्ज को बड़े करीने से पकड़ते है और आगाह करते है कि-उनके पास आवाजों का महासागर है/जो छोटे-से गुब्बारे की तरह फोड़ सकता है किसी भी वक्त/अँधेरे के सबसे बड़े बोगदे को। भावनाओं को उन्होंने जब भी शब्दों में उकेरा है, उसने स्मृति के सबसे सुखद पलों को जिलाने का काम किया है। कविता के साथ की आश हर कवि करता है पर उसे पूरी तरह निभाने का साहस कितने कवि करते है और कितने उसे अंत तक निभा पाते है। तिसपर कभी न टूटने वाली निरंतरता माने अंतःस्फूर्त चेतना का काव्यात्मक प्रस्फुटन - और उनके हाथों की चमड़ी/ हाथ और पाँव का साथ छोड़ रही है। परिवेशगत-यथार्थ का जीवंत रूप अपने खुरदरेपन के साथ हर कहीं मौजूद है।
चंद्रकांत देवताले की कविताएँ हमें चैन से जीने नहीं देती। भद्रवर्ग की अवधारणा ही यहाँ आपको उलटी है। यथार्थवादी दृश्य-बिंब उन्हें किताबों से इतर जीवन-संग्राम का कवि बनाते है। भाषायी संप्रेषणीयता-सामाजिकता-व्यावहारिकता के प्रति कनकटिया-चौकन्नापन, दोटूक बेबाकपन और जमीनी रचनात्मक-ऊर्जस्विता उन्हें समकालीनों से अलग करती है क्योंकि कविता उनके लिए बेहतर जीवन के लिए किया संवाद है। वे कविताओं में जीवन की सहजता को गुंथते है और यह कविताओं में उनकी अगाध-आस्था ही है जिनमें सामान्य जन-जीवन विस्तार पाता है, पुष्पित-पल्लवित होता है। ये समूहबोध की कविताएँ है इसलिए संवाद चाहती है और कविता की सार्थकता/प्रासंगिकता पर बात करती है जबड़े जो आदमी के मांस मेंगड़ा रहे है दांत/ यदि उन पर चोट होती है कविता/ तो मैं कविता का अहसानमंद हूँ। चंद्रकांत देवताले हिंदी के ऐसे कवि है जिन्होंने मजदूर-किसान के साथ-साथ स्त्री-दलित-आदिवासी अस्मिताओं से खुद को फैशन या सैद्धांतिक बहस के लिए नहीं वरन जीने-मरने के प्रश्न के रूप में रचनात्मक-स्तर पर जीया है। और अंत में सिर्फ इतना-यह वक़्त वक़्त नहीं/ एक मुकदमा है या तो गवाही दो/ या हो जाओ गूंगे/ हमेशा-हमेशा के वास्ते...


पुस्तक :आकाश की जात बता भइया (कविता-संग्रह) – चंद्रकांत देवताले, पहला संस्करण- मई-2010, मूल्य- दस रुपए, बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर-9, रोड़ नं.-11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006. 


(पुखराज जाँगिड़, शोधार्थी,
भारतीय भाषा केंद्र,जेएनयू,
204-Eब्रह्मपुत्र छात्रावासपूर्वांचल,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली-67. 
-मेल-pukhraj.jnu@gmail.com .)


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