कविता:-सौरव रॉय''भागीरथ'' की कुछ रचनाएं - अपनी माटी

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शनिवार, जनवरी 08, 2011

कविता:-सौरव रॉय''भागीरथ'' की कुछ रचनाएं

एकदम पाग़ल

शाम के वक़्त
आसमान गहरा नीला
कुछ काला
और क्षितिज
गुलाबी लाल !
बच्चों की तरह
बाहें फैलाकर
गोल गोल घूमो
तीन सौ साठ डिग्री
हर तरफ देखो
क्षितिज
गुलाबी लाल
जैसे आसमान के डोम को
किसीने धरती से
वेल्डिंग करके
अभी अभी
जोड़ दिया हो
काटो इस डोम को किनारों से
या कटने से बचाओ
( तुम्हारी मर्ज़ी )
थोड़ी देर में सबकुछ अँधेरा हो जायेगा ||
तब करना याद
था एक पाग़ल कवि
जो एक कुशल चित्रकार की तरह
छिड़क देता था तारे
इत्ते सारे !!
और कर जाता था हस्ताक्षर
अपने चाँद पर !!

दो बहनें

‘विरक्ति’ और ‘अशांति’
दो बहनें हैं |
दो चंचल बहनें
जो पता नहीं कितनों से ‘ब्याही’ हैं
कितनो से ‘बंधी’ हैं |
स्वांगमय-गरिमामय रूप उनका |
मैं एक से ब्याहा हूँ
दूसरी से बंधा हुआ !
दोनों को छोड़ दूं
तो क्या सुखी हो जाऊंगा
या और सुनसान ?

चिता

मुख से फेनिल गाढ़ा खून उगलते
अन्दर से झुलसाती आग
नाक के संकरे सुरंगों में कैद
घिनौनी बू, जली चर्बी की झाग
महसूस करो
तुम्हारे चेहरे की खाल गल रही है
अन्दर मुड़कर धुंधलाती तुम्हारी दृष्टि
लाल दरारों के जाल सी तुम्हारी एक आँख
और दूसरी अपने खोप में सड़ी गली सी
चीख भरी आग की लहरों में लथपथ
आहूत तुम आते हो मुझतक
जले बाल की बदबू से वातावरण लाल
और खून तो जैसे नसों से फूटकर
सूख गया बुलबुले छोड़ता, उबलकर
महसूस करो
अपने पिघले हुए दिमाग को
जो तुम्हारे कान से रिस रहा है
और ये खालीपन
तुम्हारे खोपड़े को अन्दर खींच रहा है
विकृत कंकाल तुम्हारा हिलने को
राख पर खून में लथपथ उलीच रहा है
धीरे धीरे मर रहे हो
जल्दी आये मौत-
एकालाप कर रहे हो
कहते थे आग लगी है
तुम्हारे अन्दर
नंगे पड़े हो पिघलकर
सच पूछो तो क्या फर्क पड़ता है
तुम आदमी हो? तरल के धुआं?
पर इतना साधारण अंत किसी आग का
कभी नहीं हुआ||

करवटों के जोकर

भारत का संविधान जानते हो
कई लोगों को पहचानते हो
समझते हो देश की तकलीफें
आते हो
आकर चले जाते हो |
इस नितम्बाकार अजायबघर में क्यों बैठे हो ?
बाहर आकर देखो
दुनिया सदियों से दु-निया है |
प्रसंगों में जी रहे हो
दीमक की तरह
मेरी माँ के शरीर पर
अपेंडिक्स की तरह क्यों लटके हो ?
जब तुम्हारी ज़रुरत
आदमी को कम
बंदरों को ज़्यादा है |
आँखों में बुखार की जलन नहीं
नस में रक्त स्राव की टूटन नहीं
जर्जर आत्मबल लिए
तुम्हारी देह
खड़ी है कपड़े उतारकर, और
पृथिवी के संग बस
घूम रही है
और तुम अपने होने भर के
एहसास में उत्सव मना रहे हो
करते रहो लीचड़ बहाने
अस्पताल में क्रांति के
क्या माने ?
बनाकर गूखोर सूअरों का गिरोह
घूमते रहो सड़कों पर
एक आसान शिकार की तरह |
बैठो नुक्कडों पर
बातें करो
पैसे-चाय-क्रान्ति की
घुट्टी पियो सीमेंट घोलकर
तुम्हारी बारिश भी
तुम्हारे फसल को देख कर बरसती है
तुम्हारी माँ तुम्हारी आत्मा को तरसती है
जब तुम ट्रैफिक जाम में फंसे
हार्न पर माथा पीटते हो
एक और अभिमन्यु
एक और व्यूह में पिट जाता है
चलो आज बता ही दूं
तुम्हारा विद्वतापूर्ण संवाद
एक विशिष्ट बकवास में सिमट जाता है |
पीछे हटो
ओ असाध्य रोग के ग्रास !
ओ सुलभ मृत्यु के दास !
तुम्हारे झुके कन्धों से
आज मेरी माँ शर्म से झुकी है
करते रहो प्रयोग अपनी भाषा सुधारने की
और अपनी यातना को कला का नाम देकर
बने रहो करवटों के जोकर
कभी काल कुछ करते भी हो
तो उसे क्या बुलाओगे ?
मनुष्यता ?
या परिणति ?
अंत से पहले ही
ख़त्म हो गए?
जानने से पहले ही
जान लिया?
स्तन मदिरा प्रार्थना ज़हर
कहो तुम्हारा मुंह कहाँ खुलेगा?
अपने कटे हाथों को
माचिस की डिब्बी में डाल
चलते रहो घुटनों के बल
घुटनों के बिना
शिकस्त आदमी अधमरे अस्तित्व
हर चीज़ ऊंचे पर है
उल्लू चिमगादड़ से भी ऊंचे
और उछालना तुम्हारी औकात से बहार
तुम्हारे वस्त्रों के पार दिखते हैं
तुम्हारे अंग
जिनसे आती है
जले मांस की गंध
बार बार टकराते हो खुदसे
जानते हो ऐसा ही है
तुम्हारे पास मुस्कुराने की
एक ठोस वजह नहीं है !
सर उठाओ
अब तो जी कर दिखाओ
वरना फिंक जाओगे
अकेलेपन की तरह
तुम्हारा खून कितना ही लाल हो
कैनवास पर खून नहीं बना सकते
काले पड़ जाओगे
उसी तरह आते रहेंगे
उन्हीं उन्हीं नामों के
वही वही दिन
कुकुरमुत्तों की तरह तुम
बिस्तर पर सड़ जाओगे |
तलवार से परछाईयाँ नहीं काट सकते
मैं क्यों चीख रहा हूँ
तुम्हारे वास्ते ?
क्यों बांस बन
तुम्हारी चिता उलट रहा हूँ ?
तुम्हारे वास्ते |
पर जान लो ये बात
जो करता हूँ
ईमान से
प्यार करुँ या सैर
इन पंक्तियों में भी मैंने
थाम रक्खा था हाथ तुम्हारा
लिख रहे थे पैर !!

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