कविता:-अरुण चन्द्र रॉय.नई दिल्ली - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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कविता:-अरुण चन्द्र रॉय.नई दिल्ली

अरुण चन्द्र रॉय
http://www.aruncroy.blogspot.com/
संक्रमित समय है यह 
समय है यह
मोटिवेशन का
प्रेरित होने का
अपना आदर्श बनाने का

समय है यह
महाभारत में युद्ध से पूर्व
अर्जुन का कृष्ण के चरणों में झुके चित्र को
अपने बैठक कक्ष में  लगाने का
सात दिनों में सफलता, 
आसमान को छूने जैसे मोटिवेशनल पुस्तकों के बीच
सजिल्द गीता को किताब की सेप में सजा कर रखने का .

समय है यह
बच्चों को प्रथम डेटिंग पर जाने से पूर्व
जरुरी 'टिप्स' देने का
एक इअर फोन के दो स्पीकरों से
माँ और बेटी को एक साथ
'शीला की जवानी' वाला मस्त गीत सुनने का
सुनहरे परदे पर रीटेक के बाद रीटेक देकर
उत्पन्न किये गए दृश्यों और संवेदनाओं से
प्रेरित होने का
उन छद्म किरदारों को अपना आदर्श बनाने का
अपने स्कूली सर्टिफिकेट के बीच
रखने का उनके ऑटोग्राफ

समय है यह
आँखें बंद कर
शुतुरमुर्ग हो जाने का
या फिर चील, बाज़ की तरह
विलुप्त हो जाने का

संक्रमित समय है यह.

12 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब!!!
    अरुण जी आपको मैं यूं ही नहीं, ब्लॉगजगत का सबसे ज़्यादा ऊर्जावान, समर्थ, और संभावित कवि कहता हूं। आखिर आपकी रचनाओं में नागार्जुन के सानिध्य,और उनका आशीष और आपकी खुद की गहन और सूक्ष्म दृष्टि का प्रतिफलन तो है ही, उस सबके ऊपर विषय को अलग ढंग से देखने का जज़्बा और समाज की विषमताओं को उजागर करने का प्रयास भी परिलक्षित होता है, रहता है।

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  2. • आपने इस रचना में जो परिवर्तन की बात की है वह सिर्फ़ रस्मी जोश तक महदूद नहीं है। ये सब कुछ आपकी रचना में बुनियादी सवालों से टकराते हुए है। आपकी लेखनी से जो निकलता है वह दिल और दिमाग के बीच खींचतान पैदा करता है।

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  3. I am fully agreed with manoj Bhaiya. Arun Ji has a quality to see our soceity with special eyes

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  4. समाज में उपज रही विषमताओं को ऊजागर करती रचना. आश्चर्य की बात यह है की आज ये कुसंस्कार समाज में हेय नहीं माने जा रहे हैं. समय के संक्रमण के भयावह परिणामों से आँखें मूंदे हुए इसे आधुनिकता मान ग्रहण कर रहे हैं.

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  5. अरुण भाई की कविता को पढ़ने वाले और उसे दिशा देने वाले कम नहीं हैं. ये बात दिखाती है कि आपकी रचना को कितने लोग पढ़ते हैं. मैं भी उन्हें लगातार पढ़ता रहा हूँ. उनकी कलम से निकली लगभग कवितायेँ जनपक्षधरता के आस-पास है. जो समय की मांग है. अभी उदयपुर में हुए एक आयोजन में डॉ.पल्लव ने भी बताया कि हमारा लेखन तटस्थ नहीं होना चाहिए. कहीं न कहीं जुकाव ज़रूरी हो.

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  6. मनोज जी ने सब कह दिया उसे ही मेरा मत समझें।

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  7. सही बात है..मनोज भैया ने हम सब के मन की बात कह दी है...अब अलग से क्या कहूँ...उनके शब्दों को हमारे भी माने जायं..

    सार्थक सटीक कटाक्ष...
    बहुत ही लाजवाब रचना...

    जो बात हम इतने लम्बे लम्बे गद्यों में कहना चाहते हैं,उसे आप और भी प्रभावशाली ढंग से इतने लघु कलेवर में कह जाते हैं..इसीको तो प्रतिभा कहते हैं..

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  8. समाज का यही चेहरा दिखाई पड़ रहा है आजकल.

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  9. transition ke baare men jo kuch kah diya aapne itni aasani aur aam sanketon ko utha kar wah kahna mushkil tha...bahut heee adbhut tareeke samay kee beemari ko saamne laati hui kavita hai yah...

    saadar

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  10. NIRMAL GUPT JEE NE KAHA :

    "अरुण जी शानदार कविता है .बस प्रारंभ जल्दबाजी वाला है ....फिर भी बेमिसाल कविता है मित्र....यह वह कविता जो मन के भीतर उच्चारित होने लगती है .....इस पर कभी फुर्सत से काम करना...ऐसी कविताएँ बार -बार नहीं लिखी जाती..."

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