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ब्लॉगचर्चा -''शब्दों का साम्य-स्वर और वैश्विक हिस्सेदारी''- अरविन्द श्रीवास्तव

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on गुरुवार, जनवरी 27, 2011 | गुरुवार, जनवरी 27, 2011



कला कुटीर, अशेष मार्ग,
मधेपुरा - 852113, बिहार
मोबाइल- 09431080862.

‘प्यार करने के लिए हमेशा कुछ न कुछ बचा रह ही जाता है’ गाब्रिएला गार्सिया मार्केज के इस विचार को लेखन कर्म से जोड़कर देखा जाय तो युवा और नवलेखन के लिए जो स्पेश मिलता है वह पहिए से इंटरनेट तक का सफर है जहाँ शब्द और विचारों का कारवां कन्धे से कन्धा मिलाकर जनशब्द बन रहे हैं। लातिन अमरीका की जंगलों में पत्ते खड़कते हैं जिसे हजारों मील दूर एशिया में महसूसा जाता है। यह नेट का ही जलवा था कि ‘विकीलीक्स’ ने एक ही झटके में अमेरिका के सारे कुटिल इरादों का भंडाफोड़ कर दिया। युवा और नवलेखन का वैश्विक तेवर या चिन्ता एक से हैं, स्वर-स्वर जनस्वर बन रहे हैं। 
बहरहाल, वर्ष 2010 के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार पेरू के साहित्यकार जॉर्ज मारिओ पेद्रो वर्गास लोसा  को  दिया गया। 28 मार्च 1936 को पेरू के अरेक्विपा शहर में जन्में इस 74 वर्षीय लेखक को सत्ता के ढांचे के चित्रण तथा उसके प्रति व्यक्तियों के प्रतिरोध, विद्रोह और पराजय की प्रभावशाली तस्वीर पेश करने के लिए यह पुरस्कार दिया गया। सृजनगाथा  ने लिखा कि लैटीन अमेरिका में तानाशाही के खिलाफ आम लोगों की आवाज को बुलंद करने वाले पेरू मूल के लेखक मारियो वरगास लोसा को इस पुरस्कार के तहत 15 लाख डालर की राशि दी जायेगी ।...........लिओसा टाइम ऑफ द हीरो और कंवेर्शेसन इन कैथ्रेडल जैसे रचनाओं से 1960 में दुनिया की नजर में आए। उन्होंने 30 से अधिक उपन्यास और लेख लिखे हैं। उनकी प्रमुख और मशहूर कृतियाँ हैं द टाइम ऑफ हीरो, द वार, द एंड ऑफ द वर्ल्ड द फीस्ट ऑफ द गोट, द ग्रीन हाऊस, इसके अलावा एक स्तंभकार के रूप में भी उन्होंने वंचित तबके को स्वर देने की कोशिश की है।

एक दौर में वो पेरू में राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थे, लेकिन अल्बर्टो फूजिमोरी के हाथों उनके शिकस्त झेलनी पड़ी थी । लेकिन 1993 में उन्होंने स्पेन की नागरिकता ग्रहण कर ली। राम्यांतर  ने मारिओ वर्गास लोसा की ”पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि’ शीर्षक’ से आलेख प्रस्तुत किये- जिसमें लोसा साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं । साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख ।  लोसा कहते हैं ...मुझे विश्वास है कि बिना साहित्य का कोई समाज, या ऐसा समाज जिसमें साहित्य को पदावनत कर दिया गया है वह आध्यात्मिक रूप से उद्दंड होगा । साहित्य को इस तरह से किनारे कर दिया जाय जैसे वह सामाजिक और व्यक्तिगत दोष हो और समाज में उसे एक अलग टुकड़े में बाँट दिया गया हो, तो ऐसा समाज एक असभ्य समाज होगा और यह अपनी स्वतंत्रता को भी खतरे में डाल देगा । ....... लिखित साहित्य से विहीन समाज की अभिव्यक्ति  में निश्चितता का अभाव होता है , विविध कोमल अर्थों एवं आकृतियों की समृद्धि का अभाव होता है और अपेक्षाकृत उस स्पष्टता का अभाव होता है जो साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से विरचित एवं पूर्ण होती हुई उस समाज को प्राप्त होती है जिसका परस्पर सम्वाद का अस्त्र शब्द है । ऐसी पठन पाठन से विहीन मानवता उस बहरे और शब्दविहीन गूंगों का समूह होगी, जिसमें अपरिपक्व एवं अविकसित भाषा के चलते परस्पर संवाद की घोर कठिनाई झेलनी पड़ती है । यह व्यक्तियों के लिए भी सत्य है । जो व्यक्ति पढ़ता नहीं है या कम पढता है या पढ़ता भी है तो व्यर्थ की चीजें पढ़ता है, तो वह एक हकलाने वाला व्यक्ति है । वह बोल तो बहुत सकता है , पर कहेगा बहुत कम, क्योंकि उसका शब्दकोष आत्माभिव्यक्ति में अक्षम है। ........पूरी तरह से जिया गया एकमात्र जीवन यदि कोई है तो वह साहित्य है।

लोसा को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिये जाने का जहाँ दुनिया भर में  स्वागत हुआ वहीं चीन के लोकतंत्र समर्थक नेता लिउ जियाबाओ को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार देने से नाराज चीन के समर्थन में कुछ देश सामने आए हैं। इन देशों ने चीन की तरह 10 दिसंबर को होने वाले पुरस्कार समारोह के बहिष्कार की ।आर्यावृत ने  लिखा कि चीन लिउ जियाबाओ को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिए जाने से काफी नाराज है। जियाबाओ लोकतंत्र समर्थक नेता हैं और बहुदलीय लोकतंत्र व्यवस्था के पक्षधर हैं। लेकिन चीन की सरकार ने उन्हें 11 साल के लिए जेल में डाल दिया है। वे पहले चीन के नागरिक हैं, जिन्हें शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया है।  चीन की सरकार ने लिउ की पत्नी को भी नजरबंद कर रखा है और उनके भाइयों को भी नार्वे जाने की इजाजत नहीं दी जा रही है। उनके टेलीफोन भी बंद हैं।
नेट यूजरों  के लिए इस वर्ष एक महत्वपूर्ण खबर यह भी रही कि दुनियाभर में 

सर्वाधिक लोकप्रिय वेबसाइट ‘फेसबुक’ के संस्थापक 26 वर्षीय मार्क जकरबर्ग को अमेरिका की प्रतिष्ठित ‘टाइम’ पत्रिका ने ‘पर्सन ऑफ द ईयर’ की उपाधि से नवाजा वे दूसरे सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं। 2004 में हावर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते वक्त अपने साथियों के साथ मिलकर फेसबुक की शुरुआत की थी। अब फेसबुक पर 50 करोड़ लोग जुड़ चुके हैं। 
 
ब्लॉगरों का भूमंडलीय स्वर नवलेखकों के स्वर में शामिल है नई बात पर मनोज पटेल ने विश्व साहित्य से कई अनुवाद कार्य किये हैं जो बरबस ध्यान खीचते हैं मसलन रूसी कवियत्री वेरा पावलोवा की कविताएं  देखें एक बानगी - 

सर्दियों में होती हूँ कोई जानवर,
एक बिरवा बसंत में,
गर्मियों में पतंगा,
तो परिंदा होती हूँ पतझड़ में.
हाँ औरत भी होती हूँ बाकी के वक्त.

नवलेखकों के लिए वर्ष 2010 कई मामले में महत्वपूर्ण रहा - भारतीय ज्ञानपीठ ने  इस वर्ष के लिये नवलेखन पुरस्कार सीहोर के पंकज सुबीर को उनके उपन्यास ‘ये वो सहर तो नहीं’ के लिये दिया। हिंदी युग्म  ने जानकारी दी कि भारतीय ज्ञानपीठ नेे देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिये इकसठ हजार रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान किये जाने का निर्णय लिया तथा चयनित पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित करने का भी फैसला लिया गया था।
इधर नवलेखकों की सर्जनात्मक रचनाशीलता की जरूरत अंचलिक स्तर पर भी महसूस की  गयी। बड़े बैनरों से अलग ‘संवदिया’ का कोसी केन्द्रित दो अंकों मे नवलेखन अंक आया। यह विशेषांक साहित्य अकादेमी के उपसंपादक देवेन्द्र कुमार देवेश के अतिथि संपादन में प्रकाशित हुआ । इसमें  पिछले कुछेक सालों में कलम पकड़कर लेखन की ओर प्रवृत्त होनेवाले नवातुर नवतुरिया लेखकों पर ही न केन्द्रित करके बीसवीं सदी के अंतिम दशक में हिन्दी साहित्य के समकालीन परिदृश्य पर कुछ हद तक अपनी पहचान बना चुकी कोसी अंचल की नई पीढ़ी पर केन्द्रित किया गया  साथ ही इसमें इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में लेखन की दुनिया में कदम रखनेवाली पीढ़ी को भी स्थान दिया गया।
फिलवक्त तमाम सरहदें नवलेखकों ने अपनी उड़ान से खत्म कर दी हैं, इनके विचार-सोच और बेचैनी एक से दिखते हैं सामयिक मुद्दों पर इनके साम्य स्वर में वैश्विक भागीदारी बढ़-चढ़ कर दिख रही है। युवा तुर्की कवि ओरहान वेली को 36 वर्ष (1914-1959) की छोटी उम्र मिली. कम उम्र ही जैसे काफी ना हो कि यह विरल कवि दुर्घटनाओं का भी शिकार हुआ, कोमा में रहा, और जब तक जिया सृजनात्मक लेखन व अनुवाद का खूब सारा काम किया नई बात ने उनकी कई कविताएं प्रकाशित की हैं, प्रस्तुत है उनकी ‘अपनी मातृभूमि के लिए’ शीर्षक एक छोटी-सी कविता -

क्या कुछ नहीं किया हमने अपनी मातृभूमि के लिए !
किसी ने दी जान अपनी,
किसी ने दिए भाषण.
इधर अपनी जनपक्षीय दायित्व के साथ-साथ भूमंडलीय हिस्सेदारी निभाते हुए जसम का बारहवां रष्ट्रीय सम्मेलन 13-14 नवंबर को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, सुधीर सुमन की रपट' अपनी माटी  पर आयी -प्रो. मैनेजर पांडेय और प्रणय कृष्ण पुनः जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और महासचिव रूप में चुने गये। इस आयोजन में प्रलेस के संस्थापक सज्जाद जहीर की पुत्री प्रसिद्ध कथाकार-पत्रकार और नृत्यांगना नूर जहीर समेत 19 नए नाम राष्ट्रीय परिषद में शामिल किए गए। मंगलेश डबराल, अशोक भौमिक, शोभा सिंह, वीरेन डंगवाल, रामजी राय, मदन कश्यप, रविभूषण, रामनिहाल गुजन, शंभु बादल और सियाराम शर्मा को जसम का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। मुक्तिबोध के चारों पुत्र- रमेष, दिवाकर, गिरीष और दिलीप सम्मेलन में आए, यह सम्मेलन का एक सुखद संयोग था। 
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि जो आतताई, निर्मम, लुटेरी और झूठ की सत्ता है, उसका होना ही मनुष्यता के प्रति अपराध है। उसके विकल्प के प्रति सोचना ही पड़ेगा। आज पूंजीवाद समाजवाद से लड़ने के लिए उसी सामंतवाद और धार्मिक प्रवृत्तियों का सहारा ले रहा है, जिसका कभी उसने विरोध किया था। हमारे पास जनता, समाजवाद और मार्क्सवाद से जुड़े लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के त्याग, समर्पण और संघर्ष की मिसालें हैं, उनकी स्मृति हमारी ताकत है, हमें उस ताकत के साथ मौजूदा सत्ताओं के खिलाफ खड़ा होना होगा...यहाँ प्रत्येक सांस के साथ सांसों का लंबा काफिला है, प्रत्येक स्वर समवेत स्वर है, हरएक हाथ के साथ हजार-लाख हाथ उठे हुए हैं नवलेखक विश्व विरादरी का हिस्सा बन सृजन के अपने दायित्व में जुटे रहेंगे।

साहित्यिक पत्रिका 'परिकथा'' से साभार 
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1 टिप्पणी:

  1. बधाई.., शुभकामनाएं.., आभार ! इस सुंदर व रोचक आलेख के लिए...

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