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कवितायन:-अशोक जमनानी,होशंगाबाद,मध्य प्रदेश

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, जनवरी 28, 2011 | शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

युवा उपन्यासकार
अशोक जमनानी
www.ashokjamnani.com 













पत्थर 

कुछ कहा जाए 
उन पत्थरों के लिए 
जो देवालयों में 
बन गए ईश्वर 
या हो गए पहाड़ 
पहाड़ों पर पड़े पड़े
जो सदियों से धंसे हैं
किलों और महलों में 
जो विवश से फंसे हैं 
अंतहीन मार्गो के संकुलों में
इमारतों की नींव से कलश तक 
जो डूबे हैं अहंकार में 
फुटपाथों पर पड़े हैं जो 
किसी ठोकर के इंतज़ार में 
कुछ कहा जाए 
उन पत्थरों के लिए 
जो बन गए आदिम हथियार 
जो चक्कियों के पाट बन 
कर रहे उपकार मगर बेगार 
लेकिन क्या कहा जाए 
उन पत्थरों के लिए 
जो न जाने कैसे बन गए
तथाकथित् मनुष्य का 
तथाकथित् हृदय !!!!! 

मेरे हाथ में.........


जिस वक्त 
हाथ तुम्हारा था 
मेरे हाथ में 
और मैं जानता था 
कि आने वाले 
किसी भी लम्हें में
तुम पूरी नज़र से 
देखकर मेरी ओर 
मुस्कराकर 
आहिस्ता-आहिस्ता 
खींच लोगे 
हाथ अपना 
उस वक्त 
मैं पूरे जोर से 
भींच लेना चाहता था 
अपने हाथ में 
हाथ तुम्हारा 
पर मैंने अपने स्पर्श में 
भर दी नर्मी इतनी 
कि तुम महसूस कर सको 
वो इज़ाज़त 
जो तुम्हें खींच लेने दे 
हाथ अपना 
और तुम्हारे जाने के बाद 
मैं ढूंढ सकूं अपने हाथ में 
तुम्हारे हाथ की वो लकीर 
जो शायद छूट गयी हो 
मेरे हाथ में ...........               

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1 टिप्पणी:

  1. अशोक जी की कविताओं को पढना एक अनुभव सा है.. पत्थरों के बारे में इतनी सुन्दर कविता पहले नहीं पढ़ी..

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