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गीत :-डॉ. महेंद्र प्रताप पांडे ''नन्द'',अल्मोड़ा उत्तराखण्ड

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, जनवरी 08, 2011 | शनिवार, जनवरी 08, 2011

 डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ’नन्द’
राजकीय इण्टर कॉलेज द्वाराहाट 
    अल्मोड़ा उत्तराखण्ड
 दूरभाष-$91&9410161626
e-mail- mp_pandey123@yahoo.co.in









हुकूमत के हाथी

इन्हें चाहिये देश का तन बदन,
औ इन्हें चाहिये जन का सारा ही धन।। 1।।
भले नग्न थे तन बदन से मगर,
अब इन्हें चाहिये स्वर्ण का आभरण।। 2।।
पहले खाते न थे, कुछ नहीं घर में था,
आज खाते हैं चारा औ राशन का अन्न।। 3।।
पहले रोते रहे, गिड़गिड़ाते रहे,
उनके रिश्ते के सारे, हुये हैं प्रसन्न।। 4।।
पहले क्या बिक रहा, जानते भी न थे,
आज मुर्दों का बेचे है खुद वे कफन।। 5।।
हमी से चुने, औ हमी को भुनें,
औ हमारा ही देखो, उजाड़े चमन।। 6।।
है कहीं रेल में, तो कहीं खेल में,
है दिखाई दिया, आज इनका भजन।। 7।।
ये काला बाजारी के माहिर है यारों,
गोरा बदन है पर काला है मन।। 8।।
हे विधाता बनाया है क्या आपने,
जो चलाते दलाली से अपना वतन।। 9।।
ये हुकूमत के हाथी, के है दाँत क्या,
कर रहे कुछ अलग, औ अलग है बचन।। 10।।

मै कोई विद्वान नहीं
मै क्या जानूँ दुनिया दारी, मै कोई विद्वान नहीं हूँ।
सदा मूर्खता करता रहता, पर उसकी पहचान नहीं हूँ।।
राष्ट्र प्रेम है थोड़ा थोड़ा, रुढ़िवाद कुछ हमने तोड़ा,
गाँव नगर का प्रेमी हूँ मैं, दुःखद गीत का गान नहीं हूँ।। मै कोई विद्वान , , , , , 
जीवन में संग्राम बहुत हैं, पल पल देखो काम बहुत हैं,
जिजीविषा से पीड़ित हूँ मैं, पर उसका अभिमान नहीं हूँ।। मै कोई विद्वान , , , , ,
सत्कर्मों को करना चाहूँ, प्रेम भाव जन भरना चाहूँ,
प्रकृति से अनुरक्त रहा हूँ, क्योंकि मै भगवान नहीं हूँ।। मै कोई विद्वान , , , , ,
हरीतिमा का बन संरक्षक, देवनागिरी का बन रक्षक,
इतराऊं मैं खुले जगत में, क्योंकि कोई शान नहीं हूँ।। मै कोई विद्वान , , , , ,
नहीं समझ पाया मै जग को, हार जीत के बंधन मग को,
मै भारत का एक लाड़ला, उसका मै विज्ञान नहीं हूँ।। मै कोई विद्वान , , , , ,
लोग यहाँ पर लगते झूठे, बात बात मे हमसे रूठे,
कर्म सदा मै करना जानँू, पर कोई अभियान नही हूँ।। मै कोई विद्वान , , , , ,
प्यार यहॉ बतलाया जाता, झूठा रश्म निभाया जाता,
यहॉ वन्दगी करनी होती, पर उसका मै गान नही हूँ ।। मै कोई विद्वान , , , , ,
तुममे साहस हो तो आओ, दीन जनों को गले लगाओ,
टूट न जाये ध्यान हमारा, पा ऋषि मुनियों का ध्यान नही हूँ ।। मै कोई , , , , , 
प्रेम विवश है हाथ हमारा, पा जाऊंगा साथ तुम्हारा,
संघ शक्ति की आज जरूरत, शक्ति से अनजान नही हूँ ।। मै कोई विद्धान , , , 

बना रहा अनजाना सा
मै हूँ एक मुसाफिर देखों, अलबेला मस्ताना सा,
समझन पाया बात जगत का, बना रहा अनजाना सा।
दुनियादारी प्यार वफा सब, हमें सताते रहते है,
प्यार करो जी भर तुम सबसे, लगे सुखद वह गाना सा।। 1।।
बार बार बदला तन मैने, बार बार ही आया हूँ ,
प्रेमी जन के प्रेम कथा का, हृदय गीत को गाया हूँ ,
मीरा सा अनुरक्त कृष्ण में, बना हुआ दीवाना सा।।2।।

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1 टिप्पणी:

  1. आप के सभी गागे बहुत अच्छे हैं, खास कर हुकूमत के हाथी बहुत अच्छा लगा| धन्यवाद|

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