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कवितायन:-रंजन जैदी,गाज़ियाबाद

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, जनवरी 28, 2011 | शुक्रवार, जनवरी 28, 2011


99/FF,आशियाना ग्रीन्स,

अहिंसा खंड-II
इंदिरापुरम.
गाज़ियाबाद.
Mob:09350934635 











परिवर्तन 


बोली बदली, भाषा बदली,
बदले आँचल और परिवार.
पगडंडी ने सड़क पकड़ ली,
गाओं ने खोये आकार.
चौपालों और गलियारों में
पसर गए सन्नाटे,
छोड़ो लोकाचार, पहन लो नए मुखौटे.
अब जंगल में शोर बहुत है,
आवाजाही का मौसम,
बूढा बरगद ठूंठ बना है,
दीमक करती है बेदम.
दादी खाट-खंखार में जीती,
बाबा चिट्ठी-पाती में,
बाबू ने पढ़ देहरी लांघी,
छोटू पढता बाती में.  
नीम की छत प़र कव्वा चीखे,
बहना हिचकी से बेज़ार,
पहुने आये रिश्ता बनकर,
भैया-भाभी नदियों पार.
नए गणित को परिभाषा दो,
उचित यही है समीचीन,
समीकरण भी बदल रहे हैं,
खुद्दारी है अर्थहीन.
खुद्दारी है अर्थहीन.

बूढी त्रासदी


मैं बच्चों के साथ----
खेलना चाहता हूँ
लेकिन मेरे बच्चे
मुझे खेलने नहीं देते

मुझे खेलता देख
उनकी आँखें लाल हो जाती है 
होंठों पर बेआवाज़ थरथराते शब्दों का
तांता लग जाता है
मुट्ठियाँ भींचे पाँव पटकते वे
अपनी माँ पर जाकर बरस पड़ते हैं

भला ये भी उम्र है खेलने की
लड़कियों के बीच चुहलें करने की
उनसे कहें कि वह छत से नीचें आएं
पूजा की वेदी पर बैठकर
ईश्वेर से ध्यान लगाएं
उन्हें खेलता देख मुझे शर्म आती है
सुनकर बच्चों की माँ--------
सन्न रह जाती है

समय बदल गया है
यही बच्चे पहले खेलने के लिये मुझे उकसाते थे
घोड़ा और खच्चर बनाते थे
चाहते थे कि मैं उछलूँ  कूदूं
उछल-उछलकर चाँद को छूलूं

तब मैं बुखार में भी तपकर
उनकी इच्छाओं को पूरा करता था
उनकी नादान हरकतों पर
नाटकीय अट्टहास लगाता था
गृहस्ती में फँसी 
थकी-हारी पत्नी को इन्हीं दृश्यों में
अपने भविष्य का सुख नज़र आता था

आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं
आज हम पति-पत्नी
फिर से जीना चाहते हैं
खुले वातावरण में सांस लेना चाहते हैं
चाँद की ऊंचाइयां नाप लेना चाहते हैं
अपनी ही शरारतों पर हँसना चाहते हैं

मगर सारे दृश्य-परिदृश्य बदल चुके हैं
उम्र के झुर्रियोंदार सांचे में
बीते लम्हों के खिलौने
एक-एककर ढल चुके हैं
कारण सब जानते हैं
कुछ मन ही मन कलपते हैं
कुछ हँसते रहने का अभिनय करते हैं
क्योंकि.......

बुढापे के कन्धों पर-------------
कांक्रीट की संस्कृति उग आई है
महान परम्पराएं
लोहे की सरियों के जाल में फंसकर
शाफ्ट के मल्गुन्जे अंधेरों में
नयी उम्र की कच्ची परछाइयों के साथ
जीने की आदत डाल रही हैं
बच्चों को मॉल फास्टफुड पब
तेज़ चौंधियाती रोशनियों
और न्योंसाइनों की संस्कृति
रास आ गयी है

रिश्तों के जंगल पथरा  गए हैं
गमलों में मूल्यविहीन पौधों  के बीच
नागफनी उग आये हैं
ऐसे में हताशा ने
मुझे भाग्यवादी बना दिया है
मेरी पत्नी को बिस्तर से लगा दिया है
समय का चक्र चलायमान है
शाएद यही विधि का विधान है


रचनाकार का परिचय,जिन्हें यहाँ छाप कर आज  'अपनी माटी'  परिवार का मान बढ़ा हुआ पाते हैं.सम्पादक  :-

  • एम.ए. हिन्दी, पी-एच.डी., अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ उ0प्र0
  • शोध-विषय: हिन्दी उपन्यासकार राही मासूम रज़ा: कृतित्व एवं उपलब्धियां
  • पूर्व-प्रकाशन :-कहानी संग्रह-पर्त दर पर्त, रू-ब-रू, नसीरुद्दीन तख्ते खां, जड़ें तथा अन्य कहानियां, एक हथेली आधी दस्तक।
  • उपन्यास-;प्रकाशित:-और गिद्ध उड़ गया, बेगम साहिबा,   हिंसा-अहिंसा,
  • काव्य संकलन- नूर
  • प्रकाशन: ;2010 
  • रंजन जैदी की कहानियां ; खारे पानी की मछलियां  ;कहानी संग्रहद्ध ; अक्षर-अक्षर सत्य ;आलोचनाद्ध ;हिन्दी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान ;संपादन;  आधी आबादी का सच ;सर्वेक्षणद्धय 


  • प्रकाश्य-अल्ला बस, बाकी हवस ; ;काव्य संकलनद्ध
  • रेडियो नाटक: ;प्रसारितद्ध-लगभग: 40
  • वीडियो,-आडियो गीत-अब हमको आगे बढ़ना है, अपना इतिहास बदलना है, अब आगे बढ़ो...और बढ़ते चलो!, 35एमएम फ़िल्म अनन्या। ;महिला एवं बान विकास मंत्रालय, भारत सरकारद्ध; संगीतः आदेश श्रीवास्तव, गायकः उषा उत्थुप तथा अन्य/15 भाषाओं में। मूल हिन्दी गीत की गायिकाः श्रेया घोषाल।
  • असंख्य लेख, साक्षात्कार, समीक्षाएं देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में।
  • पुरस्कार- सारिका कहानी पुरस्कार, 1985, साहित्यकृति पुरस्कार,  दिल्ली हिन्दी अकादमी-1985-86, महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता पुरस्कार-1999)   

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1 टिप्पणी:

  1. आज सुबह सुबह जब अपना मेल बाक्स खोला तो पाया कि रंजन जैदी साहब की कवितायें अपनी माटी में सो रही हैं.. मैंने उन्हें जगाया तो पाया कि कितनी खूबसूरत हैं ये कवितायेँ... बूढी त्रासदी और परिवर्तन .. जिंदगी की तल्ख़ हकीकत को इतनी सहजता से अभिव्यक्त किया जा सकता है.. अच्छा लगा.. फिर पाया कि वे मेरे पडोसी हैं तो फ़ोन किये बगैर रह ना सका.. बात करके लगा कि ये एक ऐसे कवि हैं जो कविता को जीते हैं.. महसूस करते हैं... वरना महानगर में सोमवार की सुबह जब सांस लेने का वक्त नहीं देता कोई बात करने के लिए कैसे वक्त निकल सकता है... मानिक तुम्हारा विशेष शुक्रिया...

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