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व्यक्तित्व:-हेमंत शेष:काम आदमी को बड़ा बनाता है-डॉ.ममता शर्मा

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, जनवरी 08, 2011 | शनिवार, जनवरी 08, 2011

डॉ. ममता शर्मा:-अलीगढ

‘जगह जैसी जगह‘ -2007
कोलाहल और भीड़ भरे समकालीन काव्य परिदृश्य में हेमन्त शेष सरीखे कवियों की अगर सचमुच कोई संगति या प्रासंगिकता बच रही है, तो शायद उसकी कुछ वजह  है । एक तो यह है कि अपनी निन्दा या स्तवन की फिक्र के बिना बहुत प्रशान्त अपने ही ढंग की विनम्र मौलिकता में वह कविता की नितान्त अपनी शर्तो पर कविता लिखने के पक्षधरों में है । प्रकट है कि ऐसी ईमानदार और ‘अपवाद‘ कविता के अपने संकट कई किस्म के हैं । भाषिक फैशनपरस्ती और इने-गिने काव्य-प्रयोजनों से खुद को भरसक बचाती ऐसी कविता, अपने ही सच खोजती और आविष्कृत करती है । दुर्भाग्यवश इस ढंग की कविता का लिखा जाना क्रमशः कमतर और कष्टकारक होता जा रहा है, पर हेमन्त शेष की ज्यादातर कविताएं हमारे भीतर सुरक्षित यथाथर््ा, स्वप्नों और स्मृतियों के संयोजन के अलावा हमारे इर्द-गिर्द फैली उन चीजों को, काव्य सत्यों में तब्दील करने की प्रतिज्ञा से जन्म लेती हैं, जो अपनी काव्यपरक अर्थवत्ता में नितान्त मर्मपूर्ण, कारुणिक और प्राणवान होते हुए भी प्रायः अलक्षित रह जाया करती हैं । पर हेमन्त शेष के कविता-संसार में वे कुछ नए रंगों, कुछ अनसुनी आहटों और अनजानी गंधों के लिए लगातार अवकाश पैदा करती आ रही हैं । सघन एंद्रिकता और विचारशीलता के अन्तर्विन्यास से यहां कई अमूर्त काव्यार्थ मूर्त होते हैं और कविता के भीतर से गुजरना किसी स्वप्न और किसी जागने के भीतर  गुजरने जैसा लगने लगता है । प्रख्यात कवि-रंगकर्मी-समीक्षक स्व. नेमिचन्द्र जैन के शब्दों में ‘‘.....उनकी कविता में जीवन सक्रिय है । इन कविताओं के भीतर मानवीय सम्वेदना की पटकथाएं खुलने लगती हैं तो कविता समाप्त हो जाने पर भी कथाएं समाप्त नहंीं होतीं । ‘‘

साहित्यकार हेमंत शेष 
कविता लिखने के ढंग अनगिनत हैं पर जिस तरह की कविता हेमंत शेष लिखते हैंं वह बहुत सारे ‘बाहर‘ की औपचारिक आक्रान्ति न हो कर आत्मा के भीतर जाने वाले लगभग नए रास्तों की खोज है । गहरी आत्माकुलता और अर्थगर्भी विकलता को काव्याशयों में बदलने वाली कोशिश । दूसरे समकालीन कवियों से ‘जगह जैसी जगह‘ में उनका कवि अपनी इस वैचारिक मौलिकता के कारण अनूठा है कि जिन पर आम तौर पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता वैसी जानी पहचानी चीजों और आसपास के रोज़मर्रा दृश्यों में भी वह जीवन के सत्य तलाश लेता है और यह भी एक कारण है कि निरे वर्तमान में स्खलित हो जाने की बजाए इधर की बहुत सी एकरूप कविता भाषा या सम्वेदना के विपरीत हम उन के यहां जैसे एक नई हार्दिकता और भावाकुलता का प्रशान्त और सरस साक्षात्कार करते हैंं । इधर की हिन्दी कविता में दुर्भाग्यवश जिन बहुतेरे अनुभवों को जैसे देशनिकाला सा दे दिया गया है उन ‘अस्पृश्य‘ विषयों पर भी लिखने का उन का आत्मविश्वास और प्राथमिकता कविचित्त की उस अदम्य स्वाधीनता का उद्घोष है जो विषय और विषयाभिव्यक्ति के किसी भी रूढ़ ढंगों का आंख मूंद कर अनुपालन कवि-विवेक और लेखकीय-स्वायत्तता की समाप्ति मानता है । काल-बोध के बहुत से नए आयाम हेमंत शेष की काव्य-यात्रा में देखे गए हैं और तुरंत ही ध्यान खींच सकने वाला उन का यह मूलतः दार्शनिक भावबोध काल-चेतना के आधुनिक आशयों का कुछ ऐसा रससिक्त सन्धान है जहां प्रकृति और जीवन के कई रंग हैं । प्रतीक्षा, विनोद, विरह और प्रेम की कई छटाएं । मृत्यु, उदासी, हर्ष और विषाद, करुणा, खेद, उल्लास के स्वर जो कविता के लिए निहायत मौलिक जगह उत्पन्न कर पाने के उपक्रम के रूप में ‘जगह जैसी जगह‘ जैसे संकलनों ही में देखे सुने गुने जा सकते हैं ।

घर-बाहर 1988
आज की हिन्दी कविता के एक महत्वपूर्ण युवा कवि हेमन्त शेष की ये कविताएं हमारे अपने रोजमर्रा संसार के छोटे-बड़े सुखों और दुःखों को जिस अन्तरंगता से सामने लाती हैं वह एक औसत आदमी की सामाजिक और वैयक्तिक स्थितियों को मार्मिक अन्दाज में रेखांकित करने की कोशिश ह । अपनी इन कविताओं में हेमन्त शेष दूसरे सम-सामयिक युवा कवियों की तरह भाषा और शिल्प के छद्म चमत्कारों के प्रति आग्रह न रखते हुए भी लगातार पठनीय और आत्मीय बने रहते हैं तो यह बात कवि कर्म के प्रति उनकी गंभीर अर्न्दृष्टि और आस्था का ही प्रमाण है। ‘घर-बाहर’ हमारी दिन-प्रतिदिन की दुनिया की विसंगतियों को पहचानने का रचनात्मक उपक्रम है, जिसमें रहना और बने रहना एक विवशता है। पर इस सब के बावजूद हताश या परास्त हो जाने का संदेश इन कविताओं से नहीं है। वे हमारी अपनी धड़कनों में बजती हुई उस दुनिया की ही तरह आत्मीय हैं जिसमें अन्ततः बदलाव का मर्म छिपा है।

नींद में मोहनजोदड़ोे 1988
अपनी भाविक-संरचना में विलक्षण रूप से सरल होते हुए भी प्र्रस्तुत संकलन की कविताएँ गहरी अर्थप्रवणता और प्रचलित से भिन्न विचार भूमि पर खड़ी दिखलाई देती हैं। इस पूरी काव्य यात्रा के दौरान हेमन्त शेष ने हमारे जीवन की शायद सबसे बड़ी सचाई काल को जिस सहजता से मूर्त करने का उपक्रम किया है, वह इस बात का प्रमाण है कि उनमें व्यापक संवेदनाओं और सरोकारों को परिभाषित करने का आग्रह मौजूद है। दूसरी ओर ये कविताएँ इस बात की भी गवाही है कि अपनी अग्रगामी संचेतना के अलावा सम्प्रेषणीयता हर दीर्घ जीवीरचना की बुनियादी शर्त है। इधर की कविता में प्रचलित शब्द-अपव्यय या सपाट होने की फैशनपरस्ती से अलग, इन कविताओं की दुनिया उन संश्लिष्ट और ऐन्द्रिक संवेदनाओं के महीन रेशों से गुंथ कर बनी है, जिनमें मानवीय सम्प्रक्तियों के प्रभविष्णु रंग तो हैं ही, कहीं भीतर से फूटती काल-बोध की सर्जनात्मक अन्वितियाँ भी हैं। इनमें निरन्तर उपस्थित रही हैं-करुणा, आत्मावलोकन, स्मृतियों, विषाद और ‘इमोशन’ की मिली जुली परछांइयां, जो प्रकारान्तर से व्यक्ति, परिवार समाज और प्रकृति की बदलती हुई संगतियों की ओर इशारा करती हैं। उनके पीछे यह मंतव्य भी अन्तर्निहित है कि बनती, बिगड़ती या चेहरे बदलती दुनिया के रूपाकारों को, कविता की अपनी अंतरंगता के भीतर ही जांचा-परखा जाना चाहिए। नींद में मोहनजोदड़ो हमारे भीतर सदैव मौजूद समय-बोध की निजी, किन्तु अलग काव्यानुभव जगाने वाली स्मृतिपरक पड़ताल है।

नन्द चतुर्वेदी ने लिखा है: ‘हेमन्त शेष की कविता पढ़ कर बहुत से समीक्षात्मक मंतव्य प्रकट किये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए कविता-प्रयोजन सामाजिक सरोकार और कथ्य की अहमियत के साथ वे सारे कलात्मक दावे, जो कविता की मुक्ति के और विचारधारा की जकड़न से छिटक जाने के पक्ष या विपक्ष में हो सकते हैं। लेकिन ऐसा कर के भी हम साधिकार यह नहीं कह सकते कि यही कविता लिखने की ऊर्जा या आकांक्षा है या कि रहस्य है जिसे बहुत से आलोचक जानने का अहंकार करते हैं। विचारणीय यह है कि हेमन्त षेष की कविताओं का सम्मोहन क्या है? दरअसल हेमन्त शेष के पास रचनाषील भाषा को प्रयोग में लाने का संकल्प और अद्भुतषक्ति है। उनकी कविता में हमें बनी-बनायी दुविधा ऩजर नहीं आती, जिसका विध्वंस हो रहा है या जिसके गिरते कंगूरों, विषाल गुंबजों को रंग-रोगन और नक्काषी की जरूरत हो। उनकी कविता में वैसी दुनिया भी नहीं है, जिसकी व्याख्या समाजषास्त्र या अर्थषास्त्र के सिद्धांतों पर होती है। यहां एक किस्म की स्वाधीनता हैः रचना की, प्रेम की अनंत यात्रा की, लौटने की, उल्लसित होने की, पछतावे की या प्रतीक्षा की, कुछ भी याद न रखने की और सब कुछ याद रखने की। हेमन्त शेष की इस विषेषता की ओर भी ध्यान देना आवष्यक है कि वे अपने भाषा-सम्मोहन को ‘‘ऐब्सर्डिटीज़’ और अप्रासंगिक दृष्य-बिंबों से नहीं जोड़ते और न उस कल्पनाषीलता को अवरुद्ध होने देते हैं, जहां कविता के अनंत ‘शक्ति-óोत हैं। उनकी प्रायः सब कविताओं में कल्पनाषील की वह आभा है जो प्रायः विषाद, बेचैनी और ठिठुरते हुए अनुभवों के बीच से रास्ता बनाती है। कलात्मकता का सारा रहस्य यही है कि वह थकती हुई और एकआयमी, एक से चेहरे वाली दुनिया को भी कुछ न बचा सकने वाली उदासी से बचा लेती है। हेमन्त की कविताओं की एक विषिष्टता यह भी है कि वे अपनी भाषा को लगातार जानी-पहचानी, विष्वसनीय और अक्लांत रखने की कोषिष करते हैं । मै उनकी कविताओं की मोहिनी से बंधा हूं. ।’’

वृक्षों के स्वप्न 1988
मनुष्य और प्रकृति के बहुआयामी अन्तर्सम्बन्धों की साक्षी प्रस्तुत संकलन की कविताएं एक ऐसे अनुभव-संसार में ले चलने का मर्म अपने भीतर संजोए हैं, जिसकी मौजूदगी इधर लिखी जा रही हिन्दी कविताओं में दुर्लभ है। भाषा के आत्मीय और छद्मरहित, किन्तु अर्थबहुल और सघन रचाव के जरिए हेमन्त शेष पाठक के लिए संवेदना और विचार की मौलिक जमीन तोड़ते हैं। उनकी इस पूरी काव्य-प्रक्रिया में ‘भावना‘ (इमोशन) के लिए पर्याप्त अवकाश है  । शायद इसलिए यह आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह की सभी रचनाओं में वर्तमान कविता-परिदृश्य में लगभग अनुपस्थित ‘इमोशन’ को पूरी कलात्मक संवेदना के साथ रूपायित करने की कुछ ऐसी कोशिश दीख पड़ती है, जिसका स्वाद नितान्त वैयक्तिक और जिसका मिजाज औरों से भिन्न है। ‘वृक्षों के स्वप्न’ की इन कविताओं के बहाने हम अनेकरूपा प्रकृति और मनुष्य की जटिल, किन्तु अंतरंग रिश्तेदारी तक पहुंच सकते हैं, जहां आदमी की स्मृतियों, उनके अपने अंधकार और उनके भीतर की अमूर्त आशाओं-आकांक्षाओं को एक सरल सजग भाषिक कुशलता के जरिए कविता से इतर किसी तात्कालिक जरूरत तक नहीं, अपितु उसकी ‘शाश्वत’ अस्मिता तक ले जाया गया है, क्योंकि मनुष्य के ऐसे संवेदनापूर्ण सरोकारों का निकटतम अभीष्ट सिर्फ़ प्रकृति ही हो सकती है।

अशुद्ध सारंग 1992
काव्यानुभव के प्रति अक्सर एक अपूर्व तटस्थता से शुरू होकर सघन आस्वाद में बदल जाने वाली ये कविताएँ हेमन्त शेष के कवि की निरन्तर सक्रियता और खोज का प्रमाण हैं। मानवीय संवेगों और संवेदनाओं के आत्मीय रंगांे से विन्यस्त इन कविताओं को हिन्दी कविता में हो रही तब्दीलियों और उसके सरोकारों की ऐसी प्रवृत्ति के रूप में पहचाना जा सकता है, जो उसकी एकतानता को सहज ढंग से तोड़ती है। अपने ही तरह के मुहावरे में सरलतर और क्रियाशील भाषिक-संधान के जरिए, यहाँ आधुनिक मनुष्य की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चिन्ताओं को खंगालने की कोशिश लगातार मौजूद है। एक ऐसा रचनात्मक पड़ाव, जहाँ समकालीन काव्य-परिदृश्य में निरन्तर उपस्थित एक सक्षम कवि के आत्मविश्वास और उसकी सर्जनात्मक अनुगूँजों को साफ सुना और समझा जा सकता है।  कलेवर में छोटे होते हुए भी इन शीर्षकविहीन कविताओं के आश्रय बड़े हैं और इस अर्थ में भी “अशुद्ध सारंग” की कविताओं से गुजरना एक भिन्न काव्य-अनुभव से गुजरने जैसा है।

लेखक की वर्ष 1999-2008 की अवधि में प्रकाशित  पुस्तकें और उनके प्रकाशकों के नाम व पते:
ऽ कृपया अन्यथा न लें (लम्बी कविता) 1999/शिल्पी प्रकाशन, जयपुर
ऽ सौन्दर्य शास्त्र के प्रश्न (कला-आलोचना संचयनःसंपादन ) 2000/ नेशनल पब्लिशिंग हाउस,नई दिल्ली
ऽ कला-विमर्श (कला-आलोचना संचयनःसंपादन ) 2000 नेशनल पब्लिशिंग हाउस,नई दिल्ली
ऽ भारतीय कला-रूप  (कला-आलोचना) संचयनःसंपादन 2000/ नेशनल पब्लिशिंग हाउस,नई दिल्ली
ऽ आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी (कविता-संग्रह) 2001/नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली
ऽ जलती हुई नदी (कविता-संचयनःसंपादन) 2006/शिक्षा विभाग, बीकानेर
ऽ जगह जैसी जगह (कविता संग्रह) 2007/ भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
ऽ बहुत कुछ जैसा कुछ नहीं (कविता संग्रह) 2008/ वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
ऽ कलाओं की मूल्य-दृष्टि (कला-आलोचना) 2009/वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

 लेखक के बारे में अन्य महत्वपूर्ण जानकारी:
व्यापक लेखन और प्रकाशन रचनाएं , भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित, चर्चित एवं प्रकाशित । कुछ पुरस्कार । चित्रों की 6 एकल-प्रदर्शनियां । त्रैमासिक-द्विभाषी पत्रिका ‘कला-प्रयोजन का 1995 से नियमित सम्पादन । अब तक पत्रिका के 57 अंक प्रकाशित ।

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