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आलेख:-'बाजार का समाजीकरण जरूरी है':-शिवराम,कोटा,राजस्थान

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, जनवरी 28, 2011 | शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

शिवराम

शिवराम

जरूरी चीजों का उत्पादन जितना जरूरी होता है, उतना ही जरूरी होता है विनिमय। विनिमय की जरूरतों ने ही बाजार को जन्म दिया। प्रारम्भ में जो परस्पर विनिमय अस्तित्व में आया वह आपसी लेन-देन जैसा था। लेकिन प्रकृति को अधिकाधिक जानने और उसके अधिकाधिक उपयोग से अपने जीवन को आसान और सुन्दर बनाने की मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति ने क्रमशः उत्पादन और विनिमय के व्यवहार और पद्धतियों को भी निरन्तर विकसित किया। सच पूछा जाए तो मानव समाज की सभ्यता और संस्कृति के विकास का मूल आधार, जरूरत की चीजों के उत्पादन और विनिमय पद्धति की विकास यात्रा ही है।

अतिरिक्त उत्पादन और अल्प उत्पादन, विनिमय के प्रारम्भिक कारक थे। लेकिन बाद में विनिमय की आवश्कताओं के लिए भी उत्पादन किया जाने लगा। कार्य विभाजन और श्रम विभाजन के साथ-साथ निजी सम्पत्ति और निजी स्वामित्व की स्थितियां भी उत्पन्न हुई। आपसी लेन-देन से प्रारम्भ हुआ विनिमय व्यवहार, सामाजिक स्वरूप ग्रहण करने लगा। वस्तु विनिमय विकसित होकर मुद्रा विनिमय में परिवर्तित हो गया। वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक विनिमय व्यवहार ही बाजार है। बाजार हाट-मेलों से शुरू होकर अब मॉल संस्कृति तक विकसित हो चुका है। दूसरी ओर इसका विपरीत संस्करण भी अस्तित्व में आ रहा है – होम डिलीवरी, जिसमें उपभोक्ता या क्रेता विक्रेता के पास नहीं आ रहा है बल्कि विक्रेता उपभोक्ता या क्रेता के घर वस्तुएं या सेवाएं पहुंचा रहा है। गलियों में फेरी लगाने वाली विनिमय प(ति के विकास के रूप में भी इसे देखा जा सकता है।
उत्पादक कम्पनियां एक और किस्म का बाजार रूप रच रही हैं, जिसमें थोक व्यापारी, एजेन्ट, बिचौलिए व्यापारी और खुदरा व्यापारियों की बजाय उत्पादक कम्पनी, सप्लायार और उपभोक्ता की श्रृंखला होती है और विनिमय का लाभांश भांति-भांति के व्यापारियों के बीच बंटने के बजाय कम्पनी और उपभोक्ताओं में बंट जाता है। यह विनिमय की व्यापारी दुकानदार पद्धति को ही समाप्त करता प्रतीत होता है। सप्लायर-प्रणाली भी कम्पनी की ही एक इकाई होती है जिसे उसके वेतनभोगी कर्मचारी चलाते हैं। बाजार अभी निजी लाभ-लोभ की शक्तियों द्वारा संचालित है। यहां तक कि सहकारी बाजार भी पूंजीवादी व्यवस्था में निहित स्वार्थों के नियंत्रण में चले जाते हैं। भारत में भी सहकारी बैंक, सहकारी उपभोक्ता भण्डार, सहकारी उद्योग और तरह-तरह की सहकारी समितियां प्रभावशाली सम्पन्न शासक वर्गों द्वारा हथियाई जा चुकी हैं।
जब निजी हितों और सामाजिक हितों के अंतर्विरोध टकराने लगते हैं तो व्यवस्था संकटग्रस्त हो जाती है। उत्पादन और विनिमय व्यवस्था पर, पूंजी पर निजी स्वामित्व उन्हें निजी मुनाफे की रक्षा और वृद्धि की जरूरतों से संचालित करता है। सामाजिक जरूरतें उसके लिए गौण हो जाती है। वह सामाजिक जरूरतों के आधार पर नहीं बाजार की जरूरतों अथवा मुनाफे की जरूरतों के आधार पर अपनी नीतियां निर्धारित करता है। बाजार सामाजिक जरूरतों की वास्तविकताओं पर आधारित नहीं होता, उपभोक्ताओं की मांग और उत्पादकों की पूर्ति पर आधारित होता है। उपभोक्ता वह होता है जिसके पास अपनी इच्छाओं-जरूरतों के लिए क्रय करने को मुद्रा होती है। पूंजीवादी व्यवस्था क्रमशः जनता के बड़े हिस्से को निर्धन-विपन्न और मुद्राविहीन बना देती है।
भारत में 77 प्रतिशत जनसंख्या की आय 8 रू. से 20 रू. प्रतिदिन है। अर्थात् यह 77 प्रतिशत जनसंख्या, जीने की न्यूनतम जरूरतों की मांग ही बाजार के सामने उपस्थित कर पाती है। बाजार के कुल विनिमय में उसका हिस्सा बहुत थोड़ा है। इसलिए बाजार को भी उनकी कोई परवाह नहीं। निजी स्वामित्व के लिए इस 77 प्रतिशत आबादी का कोई खास महत्व नहीं। उसके लिए समाज के 15-20 प्रतिशत वे लोग महत्वपूर्ण हैं जिनके पास मुद्रा है, जो क्रेता बनकर जरूरतों के लिए ही नहीं इच्छाओं और शौकों के लिए भी बाजार में उपस्थित होते हैं।
निजी पूंजीपति – उद्योग और कम्पनियां इन्हीं 15-20 प्रतिशत उपभोक्ताओं के लिए उत्पादन करती हैं। इसी का परिणाम है कि ए.सी., कम्प्यूटर, कारें, भांति-भांति के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, घर में व्यायाम के उपकरण, आदि का उत्पादन बढ़ रहा है। यहां मंदी है। जबकि 77 प्रतिशत आबादी के लिए खाने का तेल, शक्कर, अन्न, दालों, सस्ते घरों का उत्पादन घट रहा है। यहां महंगाई है। पहले ही जिनकी आय 8 रू. से 20 रू. प्रतिदिन हो गई है, महंगाई ने उनकी कमर तोड़ दी है। भुखमरी फैल रही है, कुपोषण और भुखमरी के कारण, रोग प्रतिरोधक क्षमता के नष्ट होने के फलस्वरूप बीमारियां फैल रही है, रोगाणु हावी हैं। जब पेट भरने को पैसा नहीं है, इलाज के लिए पैसा कहां से आए, तबाही फैल रही है। जितने लोग महायुद्धों में नहीं मरे, उससे ज्यादा हर वर्ष बीमारियों, आत्महत्याओं और दुर्घटनाओं में मर रहे हैं। यह संख्या प्रतिवर्ष 1 करोड़ से अधिक है।
सीमित 15-20 प्रतिशत उपभोक्ता समाज भी आखिर बाजार में कहां तक मांग पैदा करेगा। वहां भी संतृप्ति आती ही है। परिणामतः मंदी अर्थात् उत्पादन व्यवस्था संकटग्रस्त, पूंजी जाम। जब पूंजी के लिए उद्योग-उत्पादन में उपयोग के अवसर नहीं होते तो वह सट्टे और जुए में संलग्न हो जाती है। उसका उत्पादक, विकासशील चरित्र समाप्त हो जाता है। वह ऐश-अय्याशी की अपसंस्कृति के प्रसार का आधार बन जाती है। बाजार मनुष्यता और सामाजिकता, संस्कृति और सभ्यता के विरूद्ध ही खड़ा हो जाता है। जब बाजार सामाजिक हितों के विरुद्ध खड़ा हो जाता है तो टकराहटें जन्म लेती हैं। बाजार पर, पूंजी पर, उत्पादन और विनिमय पर सामाजिक नियंत्रण के बिना व्यवस्था का संकट बढ़ता जाता है और अराजकता की स्थितियों को जन्म देता है। अराजक और उग्र जन कार्यवाहियां होने लगती हैं, अपराध विस्तार लेने लगते हैं। आंदोलित, संघर्षशील जनता के विरुद्ध दमनकारी, उत्पीड़क राजसत्ता जनतंत्रविरोधी तानाशाही रूप धारण करने लगती है। यहां तक कि जनता को धर्म, नस्ल, जाति और क्षेत्र के नाम पर, एक दूसरे के विरूद्ध भड़का कर उनमें फूट डालकर आपस में लड़ाते हुए तानाशाह और फासीवादी सत्ता का स्वरूप गढ़ने लगती है।
जिसे स्वतंत्र बाजार कहा जाता है वह वास्तव में स्वतंत्र नहीं होता, वह निजी पूंजीपतियों के बीच उन्मुक्त प्रतिद्वन्द्विता के नियंत्रण पर आधारित होता है। उन्मुक्त प्रतिद्वन्द्विता उत्पादन और विनिमय में अराजकता पैदा करती है। किसी चीज का अति उत्पादन तो किसी चीज का अल्प उत्पादन। विनिमय का चरित्र बाजार में खुली आपूर्ति की बजाय गोदामों में जमाखोरी और सट्टा बाजार की दिशा में बढ़ने लगता है। पूंजी का प्रवाह मुनाफे से संचालित होकर व्यवस्था को अव्यवस्था के संकट में डाल देता है। चक्रीय क्रम में मंदी का दौर आता है और समग्र पूंजीवादी व्यवस्था गहन संकट में फंस जाती है। फिर उसे युद्ध के हथियारों का उत्पादन और युद्धों का प्रसार ही संकट का हल दिखाई देता है। तृतीय विश्व युद्ध के परमाणु यु्द्ध में बदलने का खतरा दिखाई देता है। लेकिन उससे बचते हुए यह सीमित क्षेत्रिय युद्ध और आतंकवाद तथा आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध भी हथियारों की मांग और पूर्ति का बाजार खोलते हैं।
वैश्विक पूंजीवाद ने युद्ध का यह नया रूप ईजाद किया है। लेकिन इससे किस तरह की वैश्विक अशांति और अराजकता जन्म ले रही है यह किसी से छिपा नहीं है। हथियारों का बाजार तो पनप रहा है लेकिन आतंकवाद से ग्रस्त देशों में उपभोक्ता बाजार का भारी संकुचन हो रहा है। कृषि उत्पादन और दैनंदिन उपयोग का औद्योगिक उत्पादन संकुचित हो रहा है। इससे न केवल खाद्य संकट बल्कि दैनंदिन उपयोग की वस्तुओं की अनियंत्रित महंगाई की भारी वृद्धि से भुखमरी और मध्य वर्ग के बड़े निचले हिस्से का टूटकर विपन्न समाज में लुढ़क जाने से बाजार में मांग और पूर्ति के संतुलन के और अधिक बिगड़ने की स्थिति उत्पन्न हो रही है। सामाजिक तबाही और अर्थव्यवस्था का समग्र संकट बढ़ रहा है।
इसलिए फिर से अर्थव्यवस्था में ‘कीन्स’ का फार्मूला याद आ रहा है। उन्मुक्त बाजार की जगह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा अर्थात् राज्य का बाजार पर, उत्पादन और विनिमय पर सीमित नियंत्रण तो होना ही चाहिए ताकि पूंजी के निजी स्वामियों के स्वार्थों और सामाजिक हितों के बीच संतुलन बना रहे। लेकिन ‘कीन्स’ की थ्योरी पर आधारित अर्थव्यवस्थाएं भी संकटग्रस्त हुई ही थीं। उससे निकलने के लिए ही पूंजीवाद ने सार्वजनिक क्षेत्र के पूर्णतया निजीकरण और उत्पादन-विनियम के उन्मुक्त वैश्वीकरण का रास्ता निकाला। ताकि बड़ी पूंजी के वैश्विक स्वामी दुनिया के कमजोर, अविकसित और पिछड़े देशों के प्राकृतिक और श्रम संसाधनों का दोहन करके, उनके बाजारों को अपने मालों से पाटकर तथा अपनी पूंजी का वहां निर्बाध निवेश करके अपना संकट हल कर सकें। पूंजीवादी व्यवस्था का संकट फिर भी हल होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है।
जाहिर है अब अर्थव्यवस्था विकास के उस मुकाम पर पहुंच गई है जब पूंजी पर, उत्पादन और विनिमय व्यवस्था पर, बाजार पर निजी स्वामित्व के स्थान पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना होगा। मुनाफे की जरूरतों पर नहीं समग्र व्यवस्था को सामाजिक जरूरतों पर आधारित करना होगा। पूंजीवाद ने अर्थव्यवस्था को विकास के अंतिम चरण में पहुंचा दिया, सामाजिक विकास में अब उसकी भूमिका समाप्त हो गई है जैसे कि एक दौर में सामंतवाद की भूमिका समाप्त हो गई थी। अतः अब जरूरी हो गया है कि वैश्विक समाजवादी व्यवस्था को अस्तित्वमान किया जाए। तभी विश्व समाज के सभी संकट हल हो सकेंगे। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण नहीं, अंतर्राष्ट्रीय समानता-स्वतंत्रता और बंधुत्व के आधार पर समाजवादी वैश्वीकरण की ओर उन्मुख हुआ जाये।
विश्व की उत्पादक शक्तियों की अग्रिम कतारों को इस हेतु आगे आना होगा। बाजार पर सामाजिक नियंत्रण ही वर्तमान व्यवस्था के संकट के हल की कुंजी है। बाजार पर सामाजिक नियंत्रण तभी सम्भव है जब पूंजी और अर्थव्यवस्था पर सामाजिक स्वामित्व हो। सामाजिक नियंत्रण के बिना बाजार छुट्टा सांड हो जाता है।
प्रस्तुति:-
संस्कृतिकर्मी 
रावतभाटा 
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