Latest Article :
Home » , , » पत्र-पत्रिकाएँ:-प्रतिश्रुति संपादक डा. रमाकांत शर्मा

पत्र-पत्रिकाएँ:-प्रतिश्रुति संपादक डा. रमाकांत शर्मा

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, जनवरी 08, 2011 | शनिवार, जनवरी 08, 2011

लोक चेतना की साहित्यिक पत्रिका ‘कृति ओर’ का यह अंक-


लोक धर्मिता की हृदय-स्पर्शी कविताओं और लोक दृष्टि के तत्वों से सम्पूरित आलेखों से संकलित ‘कृति ओर’ का अक्टूबर-दिसम्बर ’10 का 58 वाँ अंक कई अर्थों में विशेष उल्लेखनीय हैं। लोक, जनपद और काव्यभाषा पर संदर्भित संपादक विजेन्द्र का आलेख ‘कृति ओर’ से जुड़े कवि, लेखक तथा पठकों को यह सोचने को विवश कर देता है कि हिन्दी और संस्कृत की कविता तथा उसका काव्यशास्त्र या आलोचना की आत्मा भारतीय आत्मा से भिन्न नहीं है- फिर भी जनजातियांे की जीवनशैली और संस्कृति इस कथित भारतीयता से मेल नहीं खाती। इस अभिप्राय का मंथन सदियों से चला आ रहा है। संपादक का विचार इस संबन्ध में वही है- जो कबीर का था- 
गंग तीर मोरी खेती बारी
जमुन तीर खरियाना
सातों बिरही मेरे निपजै
पंचू मोर किसाना।

सत्येन्द्र पाण्डेय का आलेख ‘समकालीन कविता में लोक दृष्टि’ तथा रामनिहाल गुंजन की ‘केशव तिवारी की काव्य चेतना’ में जहाँ कविता में लोक तत्व की मुखरता है वही सामाजिक कुरीतियाँ एवं राजनैतिक पाखण्ड के प्रति विद्रोह के शब्द गरजते हैं। 
हसी तरह शहंशाह आलम की कविता ‘धार्मिक विचारों को लेकर’ उसी धार्मिक ढोंग को रेखांकित करती है - जो अभी सम्पूर्ण विश्व की ज्वलन्त समस्या है। अन्य कविताएँ भी पठनीय है। 

ऐसा सोचा कीजिए, जब मन होय उदास
एक सुंदर-सा स्वप्न है,अब भी अपने पास
                                                     
जोधपुर के मरुस्थल से भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिश्रुति’ (त्रैमासिक) का अक्टूबर-दिसम्बर ’10 अंक विचारोत्तेजक आलेख एवं मर्मस्पर्शी कविताओं के कारण हिन्दी पत्रिकाओं की शीर्ष पँक्ति में स्थान पाने को सक्षम है। संपादक डा. रमाकांत शर्मा ने अपने संपादकीय में आज की मुखर और वाचाल कविता ही नहीं, जिन फूहर कविताओं की ओर अंगुली उठाई है- वस्तुतः वह सपाटबयानी है और ऐसी कविताओं ने हिन्दी साहित्य का घोर अनिष्ट किया है। यही नहीं ‘उद्वोधन’ और ‘उपदेश’ भी कविता का क्षेत्र नहीं है। संपादक के अनुसार जीवन और जगत के मार्मिक चित्र मनुष्य को क्रियाशील बनाती है कविता। कविता अनुभव का हिस्सा बनकर संवेदनात्मक और इन्द्रियबोधात्म रूप में प्रस्तुत होती है तब वह प्रभावी, विश्वसनीय और आत्मीय हो जाती है। यह मार्गदर्शन भावी काव्यकारों के लिए सर्वथोचित है।

इस अंक के आलेख ‘पाठकों की बदलती रूचि और सृजन का संकट’ मे लेखक प्रेमपाल शर्मा अपने लंबे शैक्षणिक प्रशासनिक अनुभवों के आधार पर बेखौफ कह सकते हैं कि अनेकानेक वैज्ञानिक उपकरणों के कारण अब सृजन भी ‘हईटेक’ हो चुके हैं। फिर भी सृजन में संकट है- किन्तु सर्जक का संकट नहीं। निर्माण और ध्वंस का क्रम चलता रहेगा, लाख संकट में भी सृजन होते रहेंगे। 

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, साहित्यकार और माक्र्सवादी विचारक शिवराम जी पर महेन्द्र नेह का स्मृति शेष आलेख ‘नहीं बुझेगी दृढ़ संकल्पों की मशाल’ उनके संघर्षशील और क्रांतिकारी विचारों को सलाम करता है। अंक से सुधीर विद्यार्थी की एक छोटी कविता ‘बीज’ 
-यदि मैं कठफोड़वा होता /तो दुनिया भर के /काठ हो चुके लोगों के / सिरों को फोड़ कर / भर देता जीवन के बीज  

संपर्क-संपादकः रमाकांत शर्मा, ‘संकेत’ ब्रह्मपुरी-प्रतापमंडल, जोधपुर-342 001.(राजस्थान) मोबा.- 09414410367.

Share this article :

1 टिप्पणी:

  1. जी भाई... स्वागत है.. समीक्षक- अरविन्द श्रीवास्तव , संभव हो तो दें ..। आभार सहित !

    उत्तर देंहटाएं

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template