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कविता:-सौरव रॉय''भागीरथ'' की कुछ रचनाएं

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on सोमवार, जनवरी 03, 2011 | सोमवार, जनवरी 03, 2011

(1)

चप्पल से लिपटी चाहतें



चाहता हूँ
एक पुरानी डायरी
कविता लिखने के लिए
एक कोरा काग़ज़
चित्र बनाने के लिए
एक शांत कोना
पृथ्वी का
गुनगुनाने के लिए |
चाहता हूँ
नीली – कत्थई नक्शे से निकल
हरी ज़मीन पर रहूँ |
चाहता हूँ
भीतर के वेताल को
निकाल फेकूं |
खरीदना है मुझे
मोल भाव करके
आलू प्याज़ बैंगन
अर्थशास्त्र पढ़ने से पहले |
चाहता हूँ कई अनंत यात्राओं को
पूरा करना |
बादल को सूखने से बचाना चाहता हूँ |
गेहूं को भूख से बचाना चाहता हूँ
और कपास को नंगा होने से |
रोटी कपड़े और मकान को
स्पंज बनने से बचाना चाहता हूँ |
इन अनथकी यात्राओं के बीच
मुझे कीचड़ से निकलकर
जाना है नौकरी मांगने…||


(2)

गाना गाया



जीवन के इस तरफ
उस तरफ का अन्धकार
उस तरफ
जाने क्या ?
आगे बढ़ा मैं
रेंगता हुआ
दौड़ जीता |
इस जीत में शामिल थे
मेरे चाहने वाले और
वो जो मुझे पसंद नहीं थे |
अन्दर को
बाहर कि तरफ पलटकर
मैंने कितनी बार
रूप बदला
भटका हुआ मैं
हर घर में
खामोश सा
रोशनी कि दरारों को बंद करता रहा |
पर हर बार
कहीं से रोशनी दीख जाती |
कितने अन्याय देखे
और
चुप रहा
मेरे नीचे कुचलकर कोई
धुंधले राह में
छूट गया
उसे उठाने के बजाय
इधर भाग आया |
और लड़ते लड़ते नहीं
भागते भागते
मारा गया
भीड़ के इस संसार में
हर कोई अकेला
ऐसा जीना भी क्या
कि घर से बहार निकलने के
हर दरवाज़े बंद |
घर भी ऐसा कि
दीवार से बड़ी दरार
भूकंप के बीच
मलबे पर खड़ा |
मैं फिर भी ज़िन्दा रहा
अपनी बातें सबसे कहता
और ख़ुद पर हँसता
और जब अर्थ कि अर्थी उठानी होती
कविता लिख लेता |
रहने और न रहने
के बीच
मैं
और मेरी कविताएँ |
हर गली नुक्कड़ से गुज़रा
अन्याय देखा
और गुण्डों को नमस्कार किया
बोलने का मन बनाकर
घर में ठिठका सा
बुदबुदाया और सो गया |
उठकर मैंने फिल्म देखी
गाना गाया
ज़िन्दगी में बड़ा मज़ा आया !!

(सौरव रॉय''भागीरथ'' हमारे इस मंच के लिए नए नवेले रचनाकार है मगर वे खुद बहुत लम्बे समय से रचना कार्य में लगे हुए हैं.जल्द ही हम उनकी और भी कविताएँ यहाँ प्रकाशित करेंगे.-सम्पादक) 

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