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आलेख:-'नारी विकास में निहित भारत विकास'-मिथिलेश धर दुबे

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, जनवरी 07, 2011 | शुक्रवार, जनवरी 07, 2011


मिथिलेश धर दुबे 
स्वंतंत्र टिप्पणीकार
संपर्क  सूत्र---  09457582334 
                                                                                                                                                                                        नारी के महान बलिदान योगदान के कारण ही भारत प्राचीन में सम्पन्न और विकसित था । प्राचीन काल में नर-नारी के मध्य कोई भेद नहीं था और नारियां पुरुषों के समकक्ष चला करती थी फिर चाहे वह पारिवारिक क्षेत्र हो या धर्म, ज्ञान विज्ञान हो या कोई अन्य , सर्वांगीण विकास और उत्थान में नारी का योगदान बराबर था । नारी न सिर्फ सर्वांगीण विकास में सहायक थी पुरुष को दिशा और बल भी प्रदान करती थी। भारत के विकास में नारी योगदान अविस्मरणीय है । शायद इनके योगदान बिना भारत के विकास का आधार ही न खड़ा हो पाता । 
प्राचीन भारत को जो सम्मान मिला उसके पीछे नारियों का सहयोग व सहकार की भावना सन्निहित रही है । वर्तमान समय में भले ही नारी शिक्षा का अवमूल्यन हो रहा हो, अन्धानुकरण के उफान में भले ही उसकी शालीनता, मातृत्वता को मलीन और धूमिल किया जा रहा हो परन्तु प्राचीन में ऐसा नही था । तब चाहे कोई क्षेत्र हो समाज में नारी को समान अधिकार प्राप्त था। वैदिक ऋचाओं की द्रष्टा के रुप में सरमा, अपाला, शची, लोवामुद्रा, गोधा, विस्वारा आदि ऋषिकाओं का आदरपूर्वक स्थान था। यही नहीं सर्वोच्य सप्तऋषि तक अरुंधती का नाम आता है ।

नर और नारी में भेद करना पाप माना जाता है। इसी कारण हमारे प्राचीन इतिहास में नारी को अभेद माना जाता रहा है। ब्रह्मा को लिंग भेद से परे और पार माना जाता है । ब्रह्मा के अव्यक्त एंव अनभिव्यक्त स्वरुप को सामान्य बुद्धि वाले लोग समझ सके इसीलिए ब्रह्मा नें स्वयं को व्यक्त किया जो वे नर और नारी दोनों रूप प्रकट हुए । नर के रूप को जहां परमपुरुष कहा गया वहीं नारी को आदिशक्ति परम चेतना कहा गया । नर और नारी में कोई भेद नहीं है, केवल सतही भिन्नता है और यही भ्रम नारी और पुरुष के बिच भेद कि दीवार खड़ी करती है। 

शास्त्रों में ब्रह्मा के तीनों रुपों को जहां ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा गया तो वहीं नारियों को आदिशक्ति, महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली कहा गया। देवासुर संग्राम में जब देवताओं को पराजय का मुंह  देखना पड़ा था तब देवीशक्ति के रुप में देवताओं की मदद करना तथा राक्षसों को पराजित करना अध्यात्म क्षेत्र में नारी को हेय समझने वाली मान्यताओं को निरस्त करती है । नारी शक्ति के बिना भगवान शिव को शव के समान माना जाता है। पार्वती के बिना शंकर अधूरे हैं । इसी तरह विष्णु के साथ लक्ष्मी,  राम के साथ सीता को हटा दिया जाये कुछ अधूरा सा लगता है। रामायण से अगर सीता को हटा दिया जाये तो रामायण अधूरा सा लगता है। द्रोपदी, कुंती, गांधारी का चरित्र ही महाभारत को कालजयी बनाता है अन्यथा पांडवो का समस्त जीवन बौना सा लगता। 

नारी कमजोर नहीं है, अबला नहीं है, वह शक्ति पर्याय है। देवासुर संग्राम में शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड, रक्तबीज, महिषासुर आदि आसुरी प्रोडक्ट को कुचलने हेतु मातृशक्ति दुर्गा ही समर्थ हुई । इसी तरह अरि ऋषि की पत्नी अनुसूइया ने सूखे-शुष्क विंध्याचल को हरियाली से भर देनें के लिए तपर्श्चया की और चित्रकुट से मंदाकिनी नदी को बहने हेतु विवश किया। सह घटना भगीरथ द्वारा गंगावतरण की प्रक्रिया से कम न थी। साहस और शौर्य के क्षेत्र में भी नारी बढी चढी थी। माता सीता उस शिवधनुष को बड़ी सहजता से उठा लेती थीं जिसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा पातें थे। इनके अलावा नारियां वर्तमान समय में भी विभिन्न क्षेत्रों में अपने आप को प्रस्तुत कर रही हैं । इस तरह ऐसे बहुत से प्रमाण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि भारत के विकास के लिए आदर्शवादी नारियों ने अपनी क्षमता योग्यता का योगदान दिया । समाज में नारी के विकास के लिए समुचित व्यवस्थाएं का जाए । नारी के विकास से ही भारत अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान, और गौरव को पुनरू प्राप्त कर सकता है।   
                            
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