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कविता:-सौरव रॉय''भागीरथ'' की कुछ रचनाएं

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, जनवरी 08, 2011 | शनिवार, जनवरी 08, 2011

दाढ़ी बना डाला

घर में बैठे
जब मुझे घर की याद आई
खुन्नस में मैंने ब्लेड निकाला
नस काटने की हिम्मत नहीं थी
दाढ़ी बना डाला |
मेरी सूरत देखती है कि बदला नहीं-
जब उगने-उगाने को कुछ नहीं बचता
दाढ़ी उग-उग आती है |
नयी ब्लेड को चमकाकर
बेवकूफ की तरह मैंने कहा-
“अँधेरा छोटे-छोटे बालों की तरह उगा है
काटोगे तो फिर से उग जायेगा |”
पर खुन्नस में मैंने ब्लेड निकाला
नस काटने की हिम्मत नहीं थी
दाढ़ी बना डाला |
अँधेरा मेरे कमरे के आकार का अँधेरा था |
मेरा साया दीवार पर डोलता सा
तिनकों में बना वो पिंजड़ा खोलता सा
नहीं खुला !
पिंजड़ा सहित पेड़ पर उड़ जा बैठा;
मैं स्वतंत्र हूँ ?
मेरा चेहरा एक समतल सीढ़ी था
जिस पर मैं चढ़ता-उतरता…
नहीं, चलता था |
सामने एनरीके की तस्वीर
और उसकी दाढ़ी
अलबत्ता, टेबुल पर मेरी |
मेरा कटघरा मेरी दाढ़ी में सिमट गया है
दाढ़ी में समय खपाकर
दाढ़ी में कलम खपाकर
ज़िन्दगी का अजीब जोकर लगता हूँ
इसी खुन्नस में मैंने ब्लेड निकाला
नस काटने की हिम्मत नहीं थी
दाढ़ी बना डाला |
मैं अपनी ही दाढ़ी पर
उगा हुआ था |

ख़ुशी

आज मैं ख़ुश हूँ |
रोज़ की तरह
आज भी ख़ुश हूँ |
एक बेटी अपने पिता की छाती पर
लात रख छत पर टांक दी गयी |
मैं ख़ुश हूँ |
एक बूढा अपने कब्र में पैर टांग
गुरुत्वाकर्षण को बुला रहा है |
मैं ख़ुश हूँ |
एक पिता अपने बच्चे की लाश धरे सोच रहा है;
“वोट देने दो कोस जाने पड़ते हैं
चिकित्सा को बाईस कोस क्यों ?”
मैं तो ख़ुश हूँ |
आज दो महा दैत्य (देश) टकरा रहे हैं
और बीच फसें कीट पतंग छटपटा रहे हैं |
मुझे क्या ?
आज एक वैज्ञानिक अपनी खोज को
किसी और के नाम पढ़ रहा है |
मैं ख़ुश हूँ |
एक बच्ची आज बिस्तर पर नग्न लेटी है
किसी अनजाने व्यापारी की प्रतीक्षा में |
मैं ख़ुश हूँ |
एक सिपाही आज अपने शत्रु को मार
आंसू बहा रहा है, सरहद को गालियाँ दे रहा है |
मैं तो ख़ुश हूँ न !
मेरी ख़ुशी में शामिल है
वह जो चौक पर मरा पड़ा है |
एक पिता जो अपनी लाश को मुखाग्नि दे रहा है |
जन्नत की वादियों पर
लहू जो गीत गाता बह रहा है |
एक मज़दूर भूखे पेट सो गया |
मैं ख़ुश हूँ |
गोरैय्या आज बही क्षितिज नहीं छू सकी |
मैं ख़ुश हूँ |
विएतनाम में फिर से चीखें गूँज रही हैं |
मैं ख़ुश हूँ |
गर्मी की तपिश में कोई देह आत्मदाह कर रहा है |
मैं ख़ुश
हूँ |
एक बुढ़िया अपने मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए
अफसर के पांव लोट रही है |
मैं ख़ुश हूँ |
आज एक कमज़ोर अन्याय से टकरा कर
छिन्न भिन्न हो गया |
मैं फिर भी ख़ुश हूँ |
कुछ नौजवान सिगरेट के धुंए में
अपना अतीत, वर्त्तमान, भविष्य खोज रहे हैं |
मैं ख़ुश हूँ |
पृथ्वी के गाल पर आंसू
आज बाढ़ बन कितनों को रुला रहे हैं |
मैं ख़ुश हूँ |
सात साल का एक बच्चा आज बन्दूक लिए
सरहद पार उतर रहा है |
मैं ख़ुश हूँ |
एक अधेड़ उम्र की स्त्री
अपने झुर्रियों के जाल में उलझ कर चीख रही है |
मैं ख़ुश हूँ |
अमावस की रात में व्योम सोच रहा है-
“अगर मेरे तारे एक हो जाते
तो चाँद के नखरे न सहने पड़ते |”
मैं ख़ुश हूँ |
एक नौजवान आज विधवा का हाथ थामे
समाज के लांछन सह रहा है |
मैं ख़ुश हूँ |
एक द्रोही अपनी चिराकर्षित
मौत पर ख़ुश है |
मैं भी ख़ुश हूँ |
एक पति अपनी सावित्री सी बीवी पर
लांछन लगा कर ख़ुश है |
मैं भी ख़ुश हूँ |
एक देश भक्त दस शत्रुओं के
घर जला कर ख़ुश है
मैं भी ख़ुश हूँ |
एक बच्चा बूढ़े माली का
सर फोड़ कर ख़ुश है |
मैं भी ख़ुश हूँ |
एक कर्मनिष्ठ छात्र अपने प्रतिद्वंदी को
फ़ेल होता देख ख़ुश है |
मैं भी ख़ुश हूँ |
एक कवि आज अपनी ही कविता को
पढ़कर; न समझकर ख़ुश है |
मैं भी ख़ुश हूँ |सारा जग अपनी ख़ुशी में नाच रहा है |
मैं भी उसी ख़ुशी में शामिल हूँ |
ये आँसू जो मेरे गाल पर बह रहे हैं
विश्वास करें
ख़ुशी के ही हैं !!

क्योंकर आखिरकर

‘वो’ आते हैं |
अकस्मात् कुत्ते ज़ोर-ज़ोर से
रो जाते हैं |
अपने ऊपर ढही हुई इस रात में
सन्नाटा
एक स्थिर गाढ़ापन है
जो आधी धरती से लिपट पड़ती है
जिसमे ‘वो’ तुम्हे
फेंक देते हैं
कंकड़ की तरह
और ख़ूनी लहरें
लाल व्याहत अँधेरे में
ऊब-डूब हिलतीं हैं |
तुम सड़ रहे हो मर कर
लड़ोगे ? क्योंकर ? आखिरकर ?
टूटी तेरी इमारत की
धसकती मुंडेर पर
चील कौवे बैठ देखते हैं तुम्हे
गर्दन टेढ़ी कर
तुम मिन्नतें मांगते हो
हाथ पैर जोड़ते हो
हो निहत्थे भर
हड़बड़ी में इधर उधर
भागते हो ‘उससे’
पर ‘वो’ तुम्हे
कुल्हाड़ी की तरह पटक देतें हैं
पेड़ों पर
लड़ोगे ? क्योंकर ? आखिरकर ?
कटे हाथों से
भिन-भिनाती एक मक्खी नहीं भगा सकते
जो चाटती, पीबती है
रिसते घाव पर |
किसी की पीठ क्या थपथपापोगे ?
कांपते हो थर थर
लड़ोगे ? क्योंकर ? आखिरकर ?
कल का गणतंत्र
आज का गणीकाना है
तुम्हे अपनी
हुल्लड़ मौत को ओढ़
ताली बजाना है |
मौत का मातम हो ऐसा
कि अपनी परछाई से जाओ डर
सूर्य, चन्द्र, आकाश
शस्त्र बन, चोट कर
रह गायें हैं शास्त्र भर
इस प्रलय की घड़ी पर
लड़ोगे ? क्योंकर ? आखिरकर ?
रक्त वर्षा ऐसी की
अँधेरा भी लाल !
‘वो’ तुम्हे बोटियों में बाँट कर
वर्तुल में देंगे उछाल |
गटर में पड़े तरसते हो
बूँद बहर गंगाजल को
गंगा कबकी सूखी पड़ी !
तरसते हो
बूँद भर पानी को
पानी गाढ़ा हो
सड़
बना है यह गटर
‘वो’, खुद, ख़ुदा,
मक्खी, कुत्ते,
चील-कौवे,
शस्त्र, शास्त्र,
पानी या गटर ?
किससे लड़ोगे ? क्योंकर ? आखिरकर ?

मैं आप वो

मैं ‘मैं’ हूँ !
‘आप’ कौन हैं
ये आपसे बेहतर कौन जानता है ?
वो तो ख़ैर वो ही है…
जब मैं और आप नहीं थे
वो था |
जब मैं और आप नहीं होंगे
वो बन जायेंगे |
आप के लिए
आप मैं और मैं वो है |
वो के लिए
वो तो
वो ही है |
दरअसल वो के लिए
मैं और आप भी
वो हैं |
मैं आप को आप
और
वो को वो
मानता हूँ |
शायद  इसीलिए
मैं खुद को उत्तम कहता हूँ
परन्तु वो के सभी
अन्य है |
इसीलिए आजतक मैं और आप
हर किसी को वो बनाते रहे हैं |
वो की बची-खुची आस्था
मेरे मैं
और आपके आप होते ही
ख़त्म हो गयी |
अगर आप और मैं नहीं होते
वो उत्तम…
शायद सर्वोत्तम पुरुष होता |
पर हमने वो का
स्वत्व छीन लिया |
वो से उसका भव मांग कर
‘मैं’ मैं बना
और
आप ‘आप’ बने |
सच !
कितने लोभी हैं
मैं और आप |
और कितना दानी है वो !
शायद इसीलिए
मैं खुद से नफ़रत
आप से बगावत
और वो की इज्ज़त करता हूँ ||

बोकारो

छोटे छोटे स्टेशन देहाती
इधर से राधागाँव
उधर से तुपकाडीह
बीच में गलियाँ

जहां छोड़ आया मैं
खुदको
दोस्तों संग
साइकिल पर
घंटों का रास्ता
मिनटों में तय करते हुए |
जहां साढ़े चार बजे
मैं आज भी दोस्तों को आवाज़ देता हूँ -
सोनू ! बाबू !
जहां माँ आज भी शाम को
पड़ोसन
नहीं बहन के संग बैठकर
बुनती है गर्म स्वेटर |
जहां खिड़की की ओर नज़र कर
कल डराकर सुलाया था माँ ने मुझे -
बाहर
लोमड़ी
बैठी
है |
वो खिड़की अभी जाने किसे सुलाती होगी ?
जिसे आज भी मैं अपना घर मानता हूँ
नहीं ये मेरा घर नहीं है |
वक़्त नहीं थमता
कदम थमते हैं |
वक़्त क्यों नहीं थमता ?
ग़र थमता तो रोक देता उसे |
गेंद से दीवाल पर खेलता था
जाने वो निशां मिटे होंगे कि नहीं ?
वहीँ ज़मीन पर
नींबू का घाना मंडप
जिसमे कोई अकेला नींबू
टूटने से छूट जाता
और तब दिखलाई देता
जब पककर लाल बहुत हो जाता -
जैसे मेरे(?) आँगन में
सुबह को शाम का सूरज
या शायद
शाम को सुबह का सूरज
छूटकर रह गया पूरब में |
छूटकर रह गया वहां दिन
छूटकर रह गया मेरा दिन वहां
जैसे मैं छूटकर रह गया वहाँ ||

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