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हालिया पत्र पत्रिकाएँ- कथा-चक्र सम्पादक अखिलेश शुक्ल

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, जनवरी 28, 2011 | शुक्रवार, जनवरी 28, 2011


अखिलेश शुक्ल
http://katha-chakra.blogspot.com/
साहित्य अमृत’ का जन्मशती अंक

पत्रिकासाहित्य अमृतअंकफरवरी 2011, स्वरूपमासिकसंपादकत्रिलोकी नाथ चतुर्वेदीपृष्ठ: 154, रेखा चित्र/छायांकनजानकारी नहींमूल्य: 50रू.यह अंक(वार्षिक 200),  मेल: info@sahityaamrit.in , वेबसाईटउपलब्ध नहींफोन/मो. 011.23289777, सम्पर्क: 4/19, आसफ अली रोड़नई दिल्ली 110002


ख्यात पत्रिका साहित्य अमृत का समीक्षित अंक जन्मशती अंक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक को दिवंगत साहित्यकारों बाबा नागार्जुनकेदारनाथ अग्रवालशमशेर बहादुर सिंहगोपाल सिंह नेपाली तथा उपेन्द्र नाथ अश्क पर एकाग्र किया गया है। पत्रिका ने इन प्रतिष्ठित साहित्यकारों पर संस्मरणआलेख तथा उनकी प्रतिनिधि रचनाएं प्रकाशित कर नए पाठकों को हिंदी के अतीत तथा वैभव के संबंध में जानने समझने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है। प्रकाशित संस्मरणों में ‘मेरे आत्मीय बाबा नागार्जुन(महेन्द्र भटनागर), ‘बाबा नागार्जुन मेरी सरकारी धर्मशाल में मेरे अतिथि(बालकवि बैरागी), नागार्जुन ने मित्र से मुलाकात के लिए टिकिट लिया(राधा कांत भारती), नेपाली जी तीन प्रेरक प्रसंग(नरेन्द्र गोयल), गोपाल सिंह नेपाली(श्रीरामनाथ सुमन), लौट   पांखुरीःशमशेरबहादुर सिंह(केशव चंद्र शर्माविशेष रूप से संग्रह योग्य हैं। शोभाकांतलीला मोदीसी.आर.राजश्रीप्रिया ., भगवती प्रसाद द्विवेदीक्षेमचंद्र सुमनबालकवि बैरागीसुरेश गौतमशिवकुमार गोयलगोविंद कुमार गुंजन रमानाथ अवस्थीकृष्णदत्त पालीवालहरदयालशंभु बादलदीपक प्रकाश त्यागीअरूण कुमार वर्मारीतारानी पालीवालश्रीकृष्णकुमार द्विवेदीभवानीलाल भारतीय तथा राजकरण सिंह के संबंधित रचनाकारों-साहित्यकारों पर लेख उत्कृष्ट  गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।

 ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल से रामशंकर द्विवेदी की बातचीत हिंदी साहित्य के अतीत से लेकर उसके भविष्य के प्रति आकर्षक चिंतन है। उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानी ‘चारा काटने की मशीन’ तथा नाटक ‘अधिकार का रक्षक’ पुनः पढ़कर पिछली सदी के उस समय की याद दिला देती है जब हिंदी वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय होने के लिए छटपटा रही थी। शैलेष मटियानी का उपन्यास अंश ‘सीढ़ियां’ इसे पढ़ने की उत्कट इच्छा जाग्रत करता है। नागार्जुनगोपाल सिंह नेपालीबलबीर सिंह करूण तथा केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं प्रत्येक साहित्यप्रेमी को इन कविताओं के संबंध में वर्तमान समय के आधार पर व्याख्या करने के लिए प्रेरित करेगी। पत्रिका की अन्य रचनाएंसमीक्षाएं आदि भी उपयोगी  पठनीय है। पत्रिका के संपादक श्री चतुर्वेदी जी ने बिलकुल ठीक लिखा है कि, ‘पांच दिवंगत रचनाकारों के व्यक्तित्व और अवदान के विभिन्न आयामों को एक अंक में सम्मिलित करने का सीमित प्रयास करना खतरे से खाली नहीं है।’ लेकिन साहित्य अमृत ने इसे खतरे की अपेक्षा चुनौती मानकर उठाया और यह प्रयास सफल रहा है। संपादक के साथ साथ साहित्य अमृत की पूरी टीम इस पुनीत कार्य के लिए बधाई की पात्र है।

सुमन सागर 

पत्रिकासुमन सागरअंकजनवरी-मार्च2011, स्वरूपत्रैमासिकसंपादकसंजीव कुमार आलोकपृष्ठ: 22, रेखा चित्र/छायांकनजानकारी नहींमूल्य: 10(वार्षिक 40),  मेल: , वेबसाईटउपलब्ध नहींफोन/मो. 9835053651, सम्पर्कविनीता भवनसवेरा सिनेमा चैककाजीचक्रबाड़ 803213 बिहार

साहित्य पत्रिका सुमन सागर के समीक्षित अंक में बच्चों के सर्वागीण विकास के लिए अच्छी  पठनीय सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में पुष्पेश कुमार पुष्पडाॅराकेश कुमार सिन्हासिद्धार्थ शंकरचेतनसुरेशजमुआरबच्चनजीवने जितेन्द्रप्रकाशकिशननौशादडाॅरमेश तथा अन्य लेखकों की रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई है। आकांक्षा यादवरोहित यादवदेवेन्द्र मिश्राशामलाल कौशलवासुदेवनसुरेश प्रसादउषा किरणकृष्णा भटनागर की रचनाएं प्रभावित करती हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएंसमीक्षाएं  बच्चों के लिए उपयोगी पहेलियां तथा जानकारियां प्रशंसनीय है।

सुखनवर

पत्रिकासुख़नवरअंकनवम्बर-दिसम्बर 2010, स्वरूपद्वैमासिकसंपादकअनवारे इस्लामपृष्ठ: 48, रेखा चित्र/छायांकनजानकारी उपलब्ध नहींमूल्य: 25रू.(वार्षिक 170),  मेल: , वेबसाईटउपलब्ध नहींफोन/मो. 0755.2555789, सम्पर्कसी 16, सम्राट कालोनी अशोक गार्डनभोपाल .प्र.

हिंदी  उर्दू जबान के लिए समर्पित पत्रिका सुख़नवर का समीक्षित अंक अच्छी विचारपूर्ण रचनाओं से युक्त है। अंक में सुरेश पंडितडाॅसंजीव जैन के लेख विषयों के साथ विश्लेषणात्मक ढंग से विचार करते हैं। आरिफ शेखरमेश कंवलशरीफ कुरैशीकिशन स्वरूपअजीत सिंह बादलराजेश रेड्डीकी ग़ज़लें अच्छी  प्रेरणास्पद है। नईम कौसर एवं मनीष कुमार सिंह की कहनियां तथा रूखसाना सिद्दकी की लघुकथाएं ठीक ठाक हैं। बुद्धिलाल पालखुर्शीद हयात की कविताएं नयापन लिए हुए हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं आदि भी प्रभावित करती है।

 ‘संकेत

पत्रिकासंकेतअंकअक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूपत्रैमासिकसंपादकअनवर सुहैलपृष्ठ: 24, रेखा चित्र/छायांकनजानकारी उपलब्ध नहींमूल्य: 15रू.(वार्षिक 60),  मेल: , वेबसाईटउपलब्ध नहींफोन/मो. 07658.264920, सम्पर्कएफ-6, सूर्या अपार्टमेंटस के सामनेकटोरा तालाबरायपुर छतीसगढ़ पत्रिका

संकेत का समीक्षित अंक कवि भास्कर चैधुरी की कविताआंे पर एकाग्र है। अंक में भास्कर चैधुरी की डहेलियाराजनीतिजिसके लिए कविताअम्मालेखकजगतराष्ट्रपति भवननींव में आदमीबिटियास्कूल पास कर चुकी लड़कियां तथा संसद किसलिए कविताएं प्रभावित करती हैं।

 हिमप्रस्थ

पत्रिकाहिमप्रस्थअंकदिसम्बर 2010, स्वरूपमासिकसंपादकरणजीत सिंह राणापृष्ठ: 56, रेखा चित्र/छायांकनसुरजीतमूल्य: 5रू.(वार्षिक 60),  मेल: himprasthahp@gmail.com ,फोन/मोउपलब्ध नहींसम्पर्कहिमाचल प्रदेश प्रिटिंग पे्रस परिसरघोड़ा चैकीशिमला 5(हिमाचल प्रदेश)


हिमाचल प्रदेश की यह पत्रिका निरंतर उत्कृष्ट  जनोपयोगी साहित्य का प्रकाशन कर रही है। समीक्षित अंक में यशपाल की कहानियां वस्तु एवं शिल्प(हेमराम कौशिक), प्रयोगवाद के पुरोधाः अज्ञेय(राजेन्द्र परदेसी), मानव कल्याण ही अज्ञेय की कविताओं का लक्ष्य है(डारामनारायण सिंह मधुर), भावी पीढ़ी और मीडिया(उमा ठाकुरतथा कबीर और हमारा समय(डाॅ जगन्नाथ मणि त्रिपाठीउल्लेखनीय आलेख हैं। कहानियों में नया कोट(डाॅमदन चंद्र भटट), नर से भारी नारी(विनोद राहीसमाज के संबंध में एक नया दृष्टिकोण सामने लाती है। प्रताप सिंह सोढ़ी एवं पंकज शर्मा की लघुकथाएं अच्छी  समसामयिक हैं। पवन चैहानवंदना राणाकृष्णा ठाकुर एवं विक्रम की कविताएं प्रभावित करती है। संतोष उत्सुक का व्यंग्य तथा भीम सिंह नेगी का चिंतन इतिहास साक्षी है प्रभावित नहीं कर सके हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएंसमीक्षाएं  समाचार अच्छे  जानकारी परक हैं।

रंग अभियान

पत्रिकारंग अभियानअंक: 20 , स्वरूपअनियतकालीनसंपादकअनिल पतंगपृष्ठ: 64, रेखा चित्र/छायांकनजानकारी उपलब्ध नहींमूल्य: 15रू.(वार्षिक 100 आठ अंक),  मेल: ranj.abhiyan@yahoo.com , फोन/मो. 09430416408, सम्पर्कनाट्य विद्यालयबाघापोसुहदनगरजिला बेंगूसराय(बिहार)851218

नाट्य  कला पर आधारित पत्रिका का समीक्षित अंक रचनात्मकता से भरपूर है। यह हर्ष का विषय है कि हिंदी में नाट्य विधा पर कार्य करके यह पत्रिका इस विधा में कमी को काफी हद तक पूरा कर रही है। अंक में धरोहर के अंतर्गत उत्तराखण्ड की लोक कथाएं  संस्कृति(डाॅशशि पवांर), लोक रंगमंच  रामलीला में लोक कल्याण की भावना(हनीफ भट्टीहमारी धरोहर के संबंध में अच्छी जानकारी उपलब्ध कराती है। नाट्यालेखों में मैं कोचवान बनूंगा(डाॅमनोज श्रीवास्तव), आग(रवीन्द्र राकेशकुआलोकतथा मैं इंसान हूं(सुरेश कांटकप्रभावशाली रचनाएं हैं। स्मृति शेष के अंतर्गत मुखर्जी दा पर सुधांशु कुमार चक्रवर्ती का लेख संग्रह योग्य रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएंसमीक्षाएं तथा सभी स्थायी स्तंभ प्रभावित करते हैं।

 ‘अरावली उद्घोष

पत्रिकाअरावली उद्घोषअंकदिसम्बर 2010, स्वरूपत्रैमासिकसंपादकबी.पीशर्मा ‘पथिक’, अतिथि संपादकशंकर लाल मीणापृष्ठ: 80, रेखा चित्र/छायांकन: --, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 80),फोन/मो.: 0294.2431742, सम्पर्क: 449, टीचर्स कालोनीअम्बामाता स्कीमउदयपुर 313001 राजस्थान

आदिवासी मीडिया  साहित्य के लिए समर्पित पत्रिका अरावली उद्घोष का समीक्षित अंक श्रेष्ठ रचनाओं से युक्त है। अंक में संस्कृति विमर्श के अंतर्गत डाॅधर्मचंद्र विद्यालंकारस्वामी वाजिद काजमीडादेवीप्रसाद मोर्य के लेख हमारे आसपास की अच्छी तरह से पड़ताल करते हैं। अरविंद केजरीवाल तथा भागीरथ ने आज के ज्वलंत प्रश्न प्रश्नों पर अच्छे समाधान सुझाने का प्रयास किया है। स्वशिवराममंजू अरूणवेदप्रकाश अग्रवाल तथा देवेन्द्र कुमार मिश्र की कविताएं समसामयिक हैं। ख्यात कवि प्रभात की सभी कविताएं आज के बदलते समाज पर विमर्श प्रस्तुत करती है। सुरेश नायक  डाॅपूरन सिंह की कहानियां साधारण होते हुए भी असाधारण विषय उठाती हैं। नारी विमर्श के अंतर्गत रमणिका गुप्ता  सुरेश पण्डित के लेख तत्कालीन विषय  उसके निहितार्थ पर एक विहंगम दृष्टिपात है। पत्रिका की अन्य रचनाएंसमीक्षाएं  समाचार  पत्र आदि उपयोगी हैं। अतिथि संपादक शंकर लाल मीणा का संपादकीय वर्तमान शिक्षा जगत में बढ़ती मुनाफाखोरी पर गहराई तक प्रहार करता है।

मॉरिशस से प्रकाशित विश्व हिंदी पत्रिका का नया अंक

पत्रिका : विश्व हिंदी पत्रिकाअंक : द्वितीयस्वरूप : वार्षिकसंपादक : डॉराजेन्द्र प्रसाद मिश्रपृष्ठ : 205, रेखा चित्र/छायांकन : जानकारी उपलब्ध नहींमूल्य : प्रकाशित नहीं मेल:whsmauritius@intnet.mu,फोन/मो. 002306761196, सम्पर्क : World Hindi Secretariat, Swift Lane, Forest Side Mauritius

मॉरिशस से प्रकाशित पत्रिका विश्व हिंदी पत्रिका का समीक्षित अंक साहित्यिक रचनाओं से भरपूर है। अंक में विश्व के विभिन्न भागों में निवासरत हिंदी विद्वानों के आलेख प्रकाशित किए गए हैं। प्रकाशित आलेख विश्व में हिंदी भाषा एवं साहित्य की उपयोगिता  वैश्विक स्तर पर स्वीकारता पर प्रकाश डालते हैं। प्रकाशित प्रमुख लेखों में साहित्य पुरूष भारतेंदु(डॉरत्नाकर पाण्डेय), हिंदी का सबसे पहला कवि सम्मेलन(श्रीनारायण चतुर्वेदी), अमरीका में हिंदी एक सिंहावलोकन(सुषम बेदी), रोमानिया में हिंदी का स्वर  स्वरूप(रणजीत साहा), फीजी में हिंदी : नए आयाम(शरद कुमार), सूरीनाम में हिंदी : वर्तमान स्थिति(भावना सक्सेना), दक्षिण अफ्रीका में हिंदी का अनोखा सफर(चंपा वशिष्ठमुनि), इटली में हिंदी भाषा शिक्षण(डॉघनश्याम शर्मा), दक्षिण कोरिया और हिंदी : हार्दिक मिलन दो देशों का(प्रो.दिविक रमेश), दक्षिण कोरिया में हिंदी शिक्षण(किम  जो), हिंदी उर्दू फ्लेगशिप : संभावनाओं की ओर(विष्णु शंकर), फिनलैंड में हिंदी(डॉअनीता गांगुली), नीदरलैंड में हिंदी की स्थिति और विकास(पुष्पिता अवस्थीके लेखों में विश्व स्तर पर हिंदी के लिए हो रहे विकास  कि्रया कलाप की जानकारी है। इनसे पता चलता है कि आज हिंदी किस तरह से चारों ओर अपना परचम लहरा रही है। अन्य लेखों में मॉरिशस मे ंहिंदी : वर्तमान स्थिति(सत्यदेव सेंगर), मॉरिशस में हिंदी : एक सर्वेक्षण(जयप्रकाश कर्दम), वियतनाम में हिंदी(साधना सक्सेना), न्यूजीलैंड में हिंदी भाषा और संस्कृति(सुनीता नारायण), हिंदी धैर्य की भाषा हैउत्तेजना और हिंसा की नहीं(बालकवि बैरागी), संयुक्त राष्ट्र में हिंदी पृष्ठभूमिप्रस्ताव एवं पहल(नारायण कुमारप्रभावित करते हैं। पत्रिका ने हिंदी भाषाशैली  साहित्य पर विविधतापूर्ण आलेख प्रकाशित किए हैं जो शोध छात्रों सहित आम पाठकों के लिए समान रूप से संग्रह योग्य हैं। इनमें हिंदी की विदेशी शैलियां(विमलेश कांति वर्मा), हिंदी उर्दू और हिंदुस्तानी(रवि श्रीवास्तव), भारतीय समाज में बहुभाषिकता और हिंदी(सदानंद शाही), विस्थापन का दर्द और ॔मानस’ का मरहम(सुरेश ऋतुपर्ण), मॉरिशस का भारतीय आप्रवासी स्वर(अभिमन्यु अनंत), प्रवासी हिंदी कहानियों में वृद्घावस्था(विजय शर्मा), हिंदी का प्रचार प्रसार ही एकमात्र धर्म(जितेंद्र कुमार मित्तल), कम्प्यूटर और हिंदी(लीना मेहदेले), वैश्विक हिंदी की चौतरफा बयार(राकेश पाण्डेय), उपनिवेशवाद की समाप्ति(चरणदास महंतशामिल है। अंक में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का उद्घाटन भाषण एवं सर शिवसागर रामगुलाम का अध्यक्षीय भाषण भी साहित्यप्रेमियों की जानकारी के लिए प्रकाशित किया गया है। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल होने वाले विद्वानों के संस्मरण सहेजकर रखने योग्य हैं। इनमें रामदेव धुरंधरसूर्यदेव सिबोरतमहेश रामजीयावन तथा सुरेरश रामवर्ण के संस्मरण विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। मॉरिशस के हिंदी प्रकाशनों पर महत्वपूर्ण  जानकारीपरक परिशिष्ठ भी जानकारीपरक है। पत्रिका के प्रधान संपादक डॉराजेन्द्र प्रसाद मिश्र का यह कहना बिलकुल सही है कि "आज की बदलती हुई वैश्विक परिस्थितियों में भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरकर आया है।संपादक गंगाधर सिंह सुखलाल ने भी स्पष्ट किया है कि "विश्व हिंदी पत्रिका 2010 में शामिल किए गए लेख हिंदी की समृद्धि का अच्छा प्रमाण है।पत्रिका संग्रह योग्य  उपयोगी है।

हिंदुस्तानी जबान

पत्रिकाहिंदुस्तानी जबानअंकजनवरी-मार्च10, स्वरूपत्रैमासिकसंपादकडासुशीला गुप्तापृष्ठ: 80, रेखा चित्र/छायांकनउपलब्ध नहींमूल्य: 10रू.(वार्षिक 120),  मेल: hp.sabha@hotmail.com ,फोन/मो. 022.22812871, सम्पर्कमहागांधी मेमोरियल रिसर्च सेंटरमहागांधी बिल्डिंग, 7 नेताजी सुभाष रोड़ मुम्बई 400002

हिंदी  उर्दू में एकसाथ प्रकाशित गांधीवादी साहित्य के लिए समर्पित पत्रिका के समीक्षित अंक में अन्य उपयोगी रचनाओं को भी समुचित स्थान दिया गया है। अंक में प्रकाशित रचनाओं में समकालीन हिंदी कविता पर भूमंडलीकरण का प्रभाव(मृत्युंजय उपाध्याय), जनकवि नागार्जुन(त्रिभुवन राय), डाभीमराव अम्बेडकर  उनका सामाजिक चिंतन(डासुरेश उजाला), अभिज्ञान शाकुन्तलम के उर्दू अनुवाद(जहां आरा), संस्कृतिसाहित्य और समाज की सौगातलोकगीत(रामचरण यादव), राजभाषा हिंदी के विकास के अवरोधक तत्व(बैजनाथ प्रसादएवं रतिलाल शाहीन की लिखी हुई पुस्तक समीक्षा अच्छी रचनाओं में शुमार की जा सकती हैं।


साहित्य के समय के साखी

पत्रिका : समय के साखी, अंक : नबम्बरदिसम्बर10, स्वरूप : मासिक, संपादक : डॉ. आरती, पृष्ठ : 56, रेखा चित्र/छायांकन : उपलब्ध नहीं, मूल्य : 20रू.(वार्षिक 220), ई मेल : samaysakhi@gmail.com , वेबसाईट :http://www.samaykesakhi.in/ , फोन/मो. 9713036330, सम्पर्क : बी.308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हॉस्पिटल के पास, भोपाल म.प्र.

प्रगतिशील साहित्य के लिए समर्पित पत्रिका समय के साखी के समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण जनोपयोगी रचनाएं प्रकाशित की गई हैं। अंक में वरिष्ठ कवि व रचनाकार भगवत रावत से राजेन्द्र परदेसी जी की बातचीत साहित्य व उसके समय पर विचार करती है। सुरेश पण्डित तथा हरमेन्द्र सिंह बेदी के लेख अपने अपने विषय के विस्तार में जाकर उपयोगी व जानकारीपरक सूचनाएं सामने लाते हैं। पीताबम्बर दास तथा डॉ. पूरन सिंह की कहानियां अच्छी व संदेशपरक हैं। कुमार सुरेश, केशव शरण तथा शैलेन्द्र चौहान की कविताएं प्रभावित करती हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व समीक्षाएं व अच्छी है।


"कथन"

पत्रिका : कथन, अंक : जनवरीमार्च11, स्वरूप : त्रैमासिक, संपादक : संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ : 98, रेखा चित्र/छायांकन : जानकारी नहीं, मूल्य : 25रू.(वार्षिक 100), ई मेल : kathanpatrika@hotmail.com , फोन/मो. 011.25268341, सम्पर्क : 107, अक्षरा अपार्टमेंटस, ए3, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली 110063

कथाप्रधान त्रैमासिकी कथन के समीक्षित अंक में कहानियों के साथ साथ कहानी के आंदोलन की जरूरत पर एक संवाद प्रकाशित किया गया है। ख्यात कथाकारसाहित्कार एवं कथन के पूर्व संपादक रमेश उपाध्याय से अशोक कुमार पाण्डेय की बातचीत पर आधारित इस परिचर्चा से कहानी विधा के लिए आंदोलन की आवश्यकता पर विचार किया गया है। इस परिचर्चा में योगेंद्र आहूजा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मनोज कुलकर्णी, प्रियदर्शन, प्रभात रंजन एवं राकेश बिहारी ने भाग लिया है। परिचर्चा के अंत में श्री उपाध्याय जी ने नाम की अपेक्षा आंदोलन की आवश्यकता पर बल दिया है। आज कहानी के साथ साथ समस्त साहित्य पर पुर्नविचार करने व सकारात्मक आंदोलन की जरूरत है। क्योंकि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में आम भारतीय टी.व्ही. पर साहित्य के नाम पर दिखाए जाने वाले सस्ते एवं फूहड़ मनोरंजन को ही साहित्य समझ बैठा है। पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित कहानियों में जिस मिट्टी से बने हैं हम(इसाबेल अलेन्दे्रअनु. जितेन्द्र भाटिया), समाधि लेख(केन सारोविबा, अनु. रमेश उपाध्याय) तथा इक्कीसवीं सदी के लिए(तौफिक अल हाकिम, अनु. रमेश उपाध्याय) प्रकाशित की गई है। इन अनुदित कहानियों के कारण अंक कुछ बोझिल सा हो गया है। किसी भी पत्रिका में एक से अधिक अनुदित रचनाएं होने पर पाठकों का क्रम भंग होता है। वैसे भी अनुवाद में कितना भी ध्यान रखा जाए वह दुरूह हो ही जाता है। फिर भी समाधि लेख एक अच्छी कहानी है जिसका कथानक प्रभावित करता है।

जवरी मल्ल पारख का लेख (स्तंभपरदे पर) यह रात भी गुजर जाएगी’’ फिल्मों में उठाए गए विभिन्न मुद्दों जैस भ्रष्टाचार, शिक्षा आदि पर एक अच्छा विश्लेषण है। वरिष्ठ कवि साहित्यकार लीलाधर मंडलोई ने संग्रह अब भी’(चंद्रेश्वरउदभावना प्रकाशन) की समीक्षा इतने अच्छे ंग से की है कि इस संग्रह को पॄने की इच्छा वलवती हो जाती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं। आज हिंदी वैश्विक भाषा का स्वरूप धारण कर चुकी है। इस स्थिति में पत्रिका को भारतीय सीमा से बाहर निकालने की जरूरत है।अमरीका, कनाड़ा, मॉरिशस, फिजी, सूरिनाम तथा दुनिया के अन्य देशों में रचनाकार हिंदी में अच्छा व विश्व स्तरीय लिख रहे हैं। उन्हें भी भारतीय साहित्यिक पत्रिकाओं में पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। उम्मीद है संपादक संज्ञा उपाध्याय ध्यान रखेंगी।

समावर्तन

पत्रिका: समावर्तन, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 98, रेखा चित्र/छायांकन: अक्षय आमेरिया, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250), फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.

साहित्य एवं कला के लिए समर्पित पत्रिका समावर्तन के समीक्षित अंक में आम पाठक सहित शोर्धियों के लिए उत्कृष्ट सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में ख्यात कवि एवं साहित्यकार नरेश मेहता पर अच्छे व संग्रह योग्य आलेख प्रकाशित किए गए हैं। पत्रिका के संपादक रमेश दवे, तथा डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय व प्रमोद त्रिवेदी से नरेश मेहता की परिसंवाद शोध छात्रों के लिए उपयोगी है। धनंजय वर्मा, ज्योति जैन तथा श्री परमानंद श्रीवास्तव के लेख साहित्य के वर्तमान स्वरूप पर गहन विचार करते हैं। विमल कुमार, वसंत सकरगाए, मुस्तफा खान एवं सुधीर सक्सेना की कविताएं आकर्षक हैं। निरंजन श्रोत्रिय जी द्वारा नीलोत्पल की चुनी हुई कविताएं तथा प्रतापसिंह सोढ़ी की लघुकथा प्रभावित करती है। रंगशीर्ष के अंतर्गत पदश्री वसुंधरा कोमकली पर सभी रचनाएं अद्वितीय हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार, समीक्षाएं व लेख भी प्रभावशाली हैं।

‘शुभ तारिका’

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: जनवरी2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 38, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 12रू.(वार्षिक 120), ई मेल: urmi.klm@gmail.com , फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालानी अंबाला छावनी 133001 हरियाणा

लगातार 39 वर्ष से प्रकाशित पत्रिका शुभ तारिका के समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में पंकज शर्मा, सुरेश चंद्र वर्मा, किशोर श्रीवास्तव, कालीचरण प्रेमी, अशफका कादरी, शैल वर्मा तथा अनिल कुमार जैन की लघुकथाएं प्रकाशित की गई है। पत्रिका में प्रकाशित कविताओं में महेश चंद्र श्रीवास्तव, महेन्द्र जैन, पुष्पा सिंधी, प्रद्युम्न श्रेष्ठ, भवानीशंकर, डाॅ. भावना, रेखा शर्मा, डाॅ. अर्पणा चतुर्वेदी, आशा शैली तथा दिनेश प्रसाद प्रभावित करते हंै। कृष्ण कुमार यादव की कहानी अच्छे केनवास पर रची बुनी गई है जिसमें वर्तमान समाज की विसंगतियों के साथ साथ पूर्वजों के लिए आदर का भाव निहित है। संपादकीय का लक्ष्य और उद्देश्य पर डाॅ. महाराज कृष्ण जैन का लेख नवोदित संपादकों के लिए मार्गदर्शक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि अच्छी जानकारी प्रदान करते हैं।


साहित्य परिक्रमा

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: जनवरी-मार्च2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संरक्षक: डा. बलवत जानी, प्रबंध संपादक: जीत सिंह जीत, संपादक: मुरारी लाल गुप्त गीतेश, पृष्ठ: 128, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 15रू.(द्विवार्षिक 100), फोन/मो. 09425407471, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क, ग्वालियर म.प्र.

ख्यात साहित्यिक पत्रिका साहित्य परिक्रमा का समीक्षित अंक उसमें प्रकाशित आलेखों के कारण महत्वपूर्ण है। अंक में मानव जीवन की आस्था, साहित्य एवं संस्कृति से संबंधित आलेख का प्रकाशन किया गय है। प्रकाशित प्रमुख लेखों में डा. नंदलाल मेहता, आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी, प्रो. धर्मपाल मैनी, डा. बद्री प्रसाद पंचोली, दयाकृष्ण विजयवर्गीय, रामेश्वर मिश्र पंकज, एन. सुदरम, उमेश कुमार सिंह, विश्वमोहन तिवारी, डा. देवेन्द्र दीपक, भुवनेश्वर प्रसाद गुरूमैना, यतीन्द्र तिवारी, हदयनारायण दीक्षित, मिथलेश दीक्षित, नीरजा माधव, कमलकांत झा, अजित गुप्त, श्रीमती संपत देवी मुरारका, डा. श्रीराम परिहार, वासुदेवन शेष, कृष्णचंद्र गोस्वामी, म्रत्युन्जय  उपाध्याय, कन्हैया सिंह, शिवकुमार पाण्डेय, डा. कृष्ण मुरारी शर्मा, निर्झरी महेता, संजय पंकज, रामप्रकाश अनुरागी, शशि प्रभा क्रांति कनाटे, रवीन्द्र कुमार उपाध्याय, ज्वाला प्रसाद कौशिक के लेख उल्लेखनीय हैं। अन्य रचनाओं में रानू मुखर्जी, कुसुम शर्मा प्रभावित करते हैं। पत्रिका का संपादकीय आस्था तत्व और भारतीय साहित्य प्रभावित करता है।

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