कवितायन:-कुमार पलाश,धनबाद - अपनी माटी

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कवितायन:-कुमार पलाश,धनबाद


 (युवा प्रतिभा के रूप में आज यहाँ हम कुमार पलाश को शामिल करते हुए उनकी एक रचना प्रकाशित कर रहे हैं.)
  
केंदुआ बाज़ार
अब नहीं लगेगा
जब लिया गया था
यह फैसला
कोयला भवन में
फैसले का प्रारूप
किया गया था तैयार
राजधानी में
कारपोरेट दफ्तर में
कुछ  राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
कुछ राजनैतिक  और गैर राजनैतिक  दवाब में

तैयार की गई थी
एक रणनीति
मजदूरों से दूर रखने को
उनकी जरूरतें
दूभर करने को
उनका जीवन
केंदुआ बाज़ार
जो जीवन रेखा थी
काट दी गई

केंदुआ बाज़ार
जो धड़कता था
कोयला मजदूरों के ह्रदय में
बंद कर दिया गया
इसके साथ ही
छिन गए रोजगार
हजारों हाथों से
निर्भर हो गए मजदूरों के चूल्हे
बड़ी चमकीली दुकानों पर
और बदल गयी
अर्थव्यवस्था
घर की
जेब की
केंदुआ बाजार के बंद होते ही

जब बिलख रहा था
केंदुआ बाज़ार
जश्न मना रहे थे
अफसर
नेता
ट्रेड यूनियन
और व्यापारी वर्ग

देश में कई और
केंदुआ बाज़ार
अभी  होंगे बंद
मनेगा  जश्न
आत्म-निर्भरता बदलेगी
निर्भरता में

सुना हैं लोकतंत्र में
ऐसे उत्सव अभी जारी रहेंगे .

2 टिप्‍पणियां:

  1. ..............
    आत्म-निर्भरता बदलेगी
    निर्भरता में
    सुना हैं लोकतंत्र में
    ऐसे उत्सव अभी जारी रहेंगे.........
    ....सुनियोजित षड़यंत्र के चक्र-व्यूह में फंसे आम आदमी की पीड़ा को ज़ुबान देती कविता... शुभकामनाएं स्वीकारें...

    जवाब देंहटाएं
  2. पलाश की कविताओं का मैं नियमित पाठक हूँ.. आज के बाजारवाद से लडती उनकी यह कविता देश के सभी छोटे हाट-बाज़ार और कस्बो का प्रतिनिधित्व करती दिख रही है... पलाश को शुभकामना और मानिक को भी जिन्होंने पलाश को अपनी माटी का वेब्मंच दिया...

    जवाब देंहटाएं

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