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पुस्तक-समीक्षा:-''छपाक-छपाक'' पर रेणु व्यास की बेबाकी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on गुरुवार, जनवरी 27, 2011 | गुरुवार, जनवरी 27, 2011



‘छपाक-छपाक’ अशोक जमनानी का नवीन उपन्यास है। इस उपन्यास में नर्मदा में डुबकी लगा कर सिक्के बटोरने वाले एक बच्चे ‘नंदी’ की अछूती ज़िंदगी का विश्वसनीय एवं आत्मीय विवरण है। साथ ही विंध्य-अंचल अपने समस्त आकर्षण, सारी विशेषताओं और विद्रूपताओं के साथ इस उपन्यास में मौजू़द है। यह उपन्यास इस विडंबना को दर्शाता है कि विकास के तमाम दावों के बावज़ूद उसका जो चेहरा विंध्य के भीतरी अंचल में पहुँचा है, वह ‘नंदी’ के गणित के मास्साब का है। विकास का यह शोषक और क्रूर चेहरा शिक्षा से लेकर पुलिस तक एक जैसा है। इस आदिवासी अंचल का पारंपरिक ज्ञान और अंधविश्वास पड़िहार के माध्यम से तथा अवैध शराब, देह-व्यापार और ताक़तवर की गुंडई, दबंगई भैया जी, वीरेन्द्र और मदन के माध्यम से चित्रित है। यद्यपि इस उपन्यास में नर्मदा-विंध्य के आदिवासी अंचल की विश्वसनीय झांकी प्रस्तुत की गई है। किंतु इस उपन्यास के कथानक का अंत इसे अविश्वसनीय बनाता है। 

सूदखोर, ज़मीनखोर साहूकार का और फिर वीरेन्द्र का हृदय-परिवर्तन लेखक के हृदय की शुभत्व में आस्था का द्योतक है, किंतु अचानक हुआ यह परिवर्तन अस्वाभाविक लगता है। यह हृदय-परिवर्तन उपन्यास की कथा को लेखक द्वारा वांछित अंत तक तो पहुँचाता है किंतु यह उन सभी समस्याओं को हल करने में कोई मदद नहीं करता, जिनको लेखक ने उपन्यास में प्रभावशाली रूप में उठाया है। काश! सभी सूदखोर साहूकारों और बाहुबलियों को ऐसी अंतरात्मा मिल जाए, जैसी लेखक ने साहूकार और वीरेन्द्र को दिया है। नंदी और महुआ, बघनखा और सरना के मासूम और निःस्वार्थ प्रेम की कथाएँ इस उपन्यास का दिल को छूने वाला कोमल पक्ष है। किंतु इस उपन्यास में कथाक्रम से भी अधिक उल्लेखनीय है नर्मदा के प्रति लेखक की आत्मीयता है, जो इसे उपन्यास की वास्तविक नायिका का महत्त्व प्रदान करती है। 

 नर्मदा के इस पिछड़े अंचल की यह कहानी और अधिक पूर्ण होती, यदि इसकी वास्तविक समस्याओं का अधिक विश्वसनीय तरीके से समाधान दर्शाते। मुश्किल यह भी है कि इन समस्याओं का कोई शॉर्टकट समाधान है भी नहीं। अतः लेखक बदलाव की प्रवृत्तियों को रेखांकित मात्र करते हुए पूर्वनिर्धारित सरलीकृत समाधान से बच पाते तो यह कृति अधिक विश्वसनीय बन पाती। तेज प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित इस उपन्यास की छपाई, कागज, आवरण एवं साज-सज्जा आकर्षक है एवं मूल्य है - रु.250/-
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रेणु व्यास
शोधार्थी
29,नीलकंठ,सैंथी,
छतरीवाली खान के पास,
चित्तौडगढ,राजस्थान 

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