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लोकरंग-2011 महोत्सव

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on रविवार, फ़रवरी 27, 2011 | रविवार, फ़रवरी 27, 2011


 26 - 27 अप्रैल 2011 को( Lokrang 2011, on 26, 27 April 2011 ) 

'लोकरंग-2' पुस्तक के प्रकाशन की तैयारी

'लोकरंग-2' पुस्तक का प्रकाशन अप्रैल 2011 के पूर्व करने की योजना है जिसमें देश के 20 से अधिक महत्वपूर्ण लेखकों की रचनाएं शामिल की जा रही हैं ।

विस्तृत कार्यक्रम

 सांस्कृतिक भड़ैन्ती, फूहड़पन के विरूद्ध, जनपक्षधर संस्कृति के संवर्द्धन के लिए 
भोजपुरी के विद्रोही स्वर-रामाधार त्रिपाठी `जीवन´ के स्मृति में आयोजित 

`लोक-रंग 2011´

( दो दिवसीय नाट्य समारोह एवं विविध साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम )
• क्षेत्रीय लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां-सोहर, कजरी, निर्गुन और भोजपुरी लोकगीत ।
• बुन्देलखण्डी कछवाहा अवधूत शब्द(अनहद) और आल्हा गायन ।
• अवधी लोक समूह द्वारा फरुवाही लोकनृत्य (फैजाबाद) ।
• पश्चिम बंग गण सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता द्वारा प्रस्तुत बाउल गायन
और नृत्य ।
• निर्माण कला मंच, पटना की नाट्य प्रस्तुतियां- बिदेसिया और हरसिंगार।
• गोष्ठी-`लोकगीतों में मिथ की प्रासंगिकता´ ।
• हिरावल (पटना) द्वारा जनगीतों की प्रस्तुति ।


26-27 अप्रैल 2011
स्थान-जोगिया जनूबी पट्टी, फाजिलनगर, कुशीनगर

आयोजक
लोकरंग सांस्कृतिक समिति, जोगिया, फाजिलनगर (कुशीनगर)

जिन्हें हम याद कर रहे हैं


पूर्वी उत्तर प्रदेश का विद्रोही स्वर, रामाधार त्रिपाठी `जीवन´(1903 ई0 सं 1977 ई0) 
 
गोरखपुर जिले के गजपुर गांव में जन्मे `जीवन´ जी पर आजादी की लड़ाई का प्रभाव पड़ा था । `जीवन´ जी लाला लाजपत राय और लाला हरदयाल की क्रान्तिकारी विचारधारा से आप्लावित थे । उनकी कविताओं में शोषित जन की पीड़ा थी तो मुक्ति की उत्कंठा भी। वे कहते थे कि -
यदि कला तुम्हारी जीर्ण-शीर्ण जर्जर जीवन में
नई चेतना, नई जिन्दगी, नये जागरण प्राण दे सके
एक नया निर्माण दे सके
तो कला कला है 
अगर नहीं तो कला व्यर्थ है, एक बला है।
`जियरा के पीर जनि खोलु रे पपिहरा, मोर-तोर एक जिनगानी रे पपीहरा´ या `हमरी नगरिया न आउ रे फागुनवा, जिनगी भइल बरसात रे´ जैसे गीतों के रचइता `जीवन´ जी की सुप्रसिद्ध प्रबंध रचना `तन्दुल´ 1942 में प्रकाशित होकर आयी जिसमें कृष्ण-सुदामा जैसे पौराणिक आख्यानों के माध्यम से उन्होंने समाजवादी विचारधारा की ओर अपने झुकाव को प्रकट किया । 
`पामर पूंजीवाद ! नाश हो तेरा जग से
अरे विश्व उन्माद ! नाश हो तेरा जग से ।
अपनी ही धुन की धारा में बहने वालों
संभलो, संभलो ओ महलों में रहने वालों ।
.....................................................................

अरे साम्य का तख्त कहां है, ताज कहां है?
मानवता का मधुर मनोरम राज कहां है ?


जीवन जी को परिवारिक सुख कभी नसीब न हुआ । आर्थिक विपन्नता में जीते जीवन जी का बेटा उपेक्षित ही रहा । राप्ती नदी के कटान में खेती समा गई । पिता श्री गणपति त्रिपाठी और माता श्रीमती सुखराजी के पास इतना धन न था कि वे बेटे को ठीक से पढ़ा सकें । जीवन जी ने गांव की पाठशाला से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की । बड़े होकर ख्याति प्राप्त साहित्यकार मन्नन द्विवेदी `गजपुरी´ के अल्पकालिक सानिध्य में कविता करने लगे । कुछ दिन तक पहलवानी की फिर पेट पालने के लिए गाड़ीवान बने और गुड़ का व्यापार किया । जीवन जी ने अपने पचास वर्षो की लम्बी काव्य यात्रा में ब्रजभाषा काव्य का अवसान, खड़ी बोली का उत्कर्ष, द्विवेदी युग और छायावाद का अभ्युदय, प्रगतिवाद का दर्प और नई कविता का तेवर देखा था । उनके मुख्य सग्रह हैं- धूप-छांह (1947), तूलिका (1945),`गीत-बेला´ (1961), पंख और पांव (1973), कलम और कुदाल (1973), जिन्दगी के गीत (1975) । ऐसे विद्रोही स्वर को याद करते हुए हम `लोकरंग 2011´ को जीवन जी को समर्पित कर रहे हैं ।

 
आमन्त्रित नाट्य संस्था: निर्माण कला मंच, पटना
निर्माण कला मंच, देश की प्रसिद्ध नाट्य संस्थाओं में से एक है । इस संस्था का गठन 20 अगस्त 1988 को किया गया था । अपने 21 वर्षीय रंगयात्रा के दौरान इसने हिन्दी रंग मंच पर बकरी, बिदेसिया, जसमा ओड़न, नल दमयन्ती, खड़िया का घेरा, हरसिंगार, रूस्तम सोहराब, कम्पनी उस्ताद, बड़ा नटकिया कौन, खुबसूरत बहू, जांच-पड़ताल, कहां गये मेरे उगना, घासीराम कोतवाल, हीरा डोम, अंधों का हाथी, उत्तर प्रियदर्शी आदि नाटकों के माध्यम से अलग पहचान बनाई है । संगीत प्रधान लोक नाटकों द्वारा इस संस्था ने जहां एक ओर नए कलाकारों को मंच प्रदान किया है वहीं हिन्दी लेखकों से उनका परिचय भी करवाया है । इस संस्था ने भिखारी ठाकुर रचित नाटक-`बिदेसिया´ की 500 से ज्यादा सराहनीय प्रस्तुतियां दी हैं ।

नाटक-`बिदेसिया´ के बारे में- दोस्त ने तारीफ कर दी कलकत्ता की तो हमारे नायक मचल उठे कलकत्ता जाने को । उधर नायिका के पैर के महावर अभी फीके भी न पड़े थे कि जुदाई की बात उठा दी गई । नायिका ने सुन रखा था-``पूरब देश में टोना बेसी बा, पानी बहुत कमजोर´´ तब भला वह नायक को जाने कैसे दे ? पर नायक के जिद के आगे उसकी एक न चली । नायक कलकत्ता गया तो नायिका को बिसरा दिया । ना कोई सन्देश, ना चिट्ठी-पत्री । हार कर नायिका ने बटोही बाबा से सन्देश भिजवाया । बटोही बाबा ने कलकत्ता में पाया कि नायक दूसरी कश्ती पर सवार है । वहां उसके दो बच्चे भी हैं । फिर....? जैसे-तैसे नायक रखेलिन को छोड़ वापस घर आया । पर यह क्या ? रखेलिन तो दोनों बच्चों के साथ घर आ धमकी थी । अब क्या होगा ? रखेलिन और नायिका लड़ेंगी-भिड़ेंगी और हार कर मान जायेंगी । पहले रोजी के लिए युवक गांव से शहर जाते थे अब विदेश जाते हैं । ब्रेन माइग्रेशन की यही कहानी है भिखारी ठाकुर के इस बिदेसिया नाटक की ।
निर्देशक के बारे में -संजय उपाध्याय को ऐसे रंग-निर्देशकों में गिना जाता है जिन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर नई पीढ़ी को नवीन रंगचेतना प्रदान की है । पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निर्देशन में स्नातक संजय `निर्माण कला मंच´ तथा `सफरमैना´ के निर्देशक हैं । रंग-संगीत के लिए विशेष रूप से विख्यात संजय उपाध्याय, भानु भारती, रोबिन दास, बंशी कौल, बी0एम0शाह, रामगोपाल बजाज, सत्यदेव दूबे, बैरी जॉन, देवेन्द्र राज अंकुर, आलोक चटर्जी, अवतार साहनी, त्रिपुरारि शर्मा और अजय मलकानी आदि निर्देशकों की प्रस्तुतियों में संगीत रचना कर चुके हैं । कोलिम्बया, सूरीनाम व कराकास आदि अन्तरराष्ट्रीय महोत्सवों में संगीत निर्देशन के साथ-साथ कई राष्ट्रीय उत्सवों में प्रेक्षक के रूप में कार्य किया है ।
1-नाटक : बिदेसिया ( लेखक-स्व0भिखारी ठाकुर /संगीत, परिकल्पना एवं निर्देशन- संजय उपाध्याय)
 

अवधि : 90 मिनट
पात्र परिचय

मंच पर:-शुभ्रो भट्टाचार्य और सुमन कुमार (सूत्रधार), सुमन कुमार (बिदेसी), शारदा सिंह (प्यारी सुन्दरी), मुस्कान (रखेलिन), अभिषेक शर्मा (बटोही), सन्तोष मेहरा (जोकर), राकेश कुमार (बुढ़िया), स्वरम और रजनीश (बिदेसी के बेटे), शुभ्रो भट्टाचार्य (देवर), मुस्कान, मनोज पटेल, मन कपूर, सुरजीत कुमार, जय भारती (सभी नर्तक), पप्पू ठाकुर और अंजारूल (समाजी), शारदा सिंह, रमेश प्रभात, स्वरम, पप्पू ठाकुर, राजू कुमार (गायन मण्डली), राजेश रंजन (ढोलक/तबला), सन्तोष कुमार (नाल), प्रभाकर (हारमोनिया), खंजड़ी (पप्पू ठाकुर), रंगनाथ सिंह (झाल), जानी (बैंजो), मो0नूर (क्लारिनेट),
नेपथ्य: पप्पू ठाकुर (मंच व्यवस्था), रजनीकान्त पाण्डेय (रूप सज्जा), राकेश कुमार और शारदा सिंह (वस्त्र सज्जा), राजेश सिन्हा (प्रकाश), धनंजय नारायण सिन्हा और डॉ0शैलेन्द्र (प्रस्तुति नियन्त्रक)
नाटक `हरसिंगार´ के बारे में- शिव का प्रिय हरसिंगार का सफेद फूल अपनी अल्पजीविता के लिए प्रसिद्ध है । इस पुष्प की संज्ञा, निजी विशेषता पर नहीं बल्कि दूसरे की पसन्द पर आधारित है । बाजारवाद ने समाज के हर महत्वपूर्ण पद को सतही बनाया है । सबसे गम्भीर मानवीय रिश्ता इस प्रवृत्ति को टटोलने की कोशिश करता है । कलाएं भी इससे अछूती नहीं हैं । खासतौर पर रंगमंच, जो समूह के रिश्तों की कला है ।
यह नाटक अपने बिखरे वितान में इसी पतनशील प्रवृत्ति को टटोलने की कोशिश करता है । पश्चिम के नवधनाढ्य कौतुहल का शमन करने के लिए पारंपरिक रंगप्रयोग का आयोजन हुआ है । पर वित-पोषण की नीयत से शुरू हुई यह प्रक्रिया नाना प्रकार के छल-फरेब से गुजरते हुए एक अद्भुत मानवीय सम्बंधों के भंवर में पड़ जाती है । पारंपरिक लोकनाट्य `डोमकच´ के `हरबिसन दम्पति´ की कथा अन्तत: स्त्री-पुरुष सम्बंधों के कई अनछुये पहलुओं को उजागर करते हुए जीवन की जीत की गाथा में बदल जाती है । शिल्प के स्तर पर नाटक को विश्रृंखल और अव्यवस्थित बनाया गया है ताकि जीवन और कलाओं को जिस अवस्था ने प्रभावित किया है, उसे महसूस किया जा सके ।
 

2-नाटक: हरसिंगार (लेखक- श्रीकान्त किशोर / संगीत, परिकल्पना एवं निर्देशन- संजय उपाध्याय) .

अवधि-90 मिनट ।
पात्र परिचय

मंच पर:-शुभ्रो भट्टाचार्य (सूत्रधार/नट), शारदा सिंह (सूत्रधार/नटी), राजेश सिन्हा (हरबिसना), अर्चना सोनी (हरबिसनी), सुमन कुमार/ अभिषेक शर्मा (राजा), माधुरी शर्मा (रानी), पप्पू ठाकुर (दरोगा), मन कपूर (सन्तरी), सन्तोष मेहरा (दीवान), पप्पू ठाकुर (व्यापारी), रमेश प्रभात (दलाल), रजनीश रंजन (मलुआ), मनोज पटेल (नर्तक), राजेश रंजन (ढोलक/नाल), जानी (हारमोनिया) ।
नेपथ्य: पप्पू ठाकुर/अंजरूल (मंच व्यवस्था), धनंजय नारायण सिन्हा (रूप सज्जा), शारदा सिंह (वस्त्र सज्जा), पी0के0गुंजन (प्रकाश), अंजरूल/जय भारती (रंग सामग्री), धनंजय नारायण सिन्हा/सुनील कुमार पांडेय और डॉ0शैलेन्द्र (प्रस्तुति नियन्त्रक) ।
आमन्त्रित अन्य सांस्कृतिक संस्थाएं-

हिरावल (जसम की नाट्य एवं गीत इकाई )- हिरावल, पटना का गठन वर्ष 1981 में जनप्रतिरोध की संस्कृति के संरक्षण,संवर्द्धन के लिए किया गया था । संस्था ने अपनी अब तक की तमाम प्रस्तुतियों के आधार पर प्रगतिशील संस्कृति को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
हिरावल ने अपने रंग सफ़र की शुरुआत नुक्कड़ नाटक और जनगीतों की प्रस्तुतियों से की। आगे चलकर इसने मंच नाटकों की ओर भी क़दम बढ़ाया। मुख्य रूप से पटना में सक्रिय यह नाट्य दल बिहार-झारखण्ड के गांव-कस्बों से लेकर देश के विभिन्न प्रान्तों में अपने नाटकों का प्रदर्शन कर चुका है। यह संस्था `लोकरंग 2011´ में अपने जनवादी गीतों के क्रान्तिकारी तेवर के साथ उपस्थित होगी ।

अवधी लोक समूह- `घरौन्दा´ शाहजहांपुर, देवकाली मार्ग, फैजाबाद- 224001, उ0प्र0 की यह संस्था, शीतला प्रसाद वर्मा के नेतृत्व में अवधी फरूवाही गायन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर चुकी है । इस संस्था ने देश के महत्वपूर्ण मंचों यथा, क्वीन बेटेन रिले दौड़, राष्ट्रमण्डल खेल, लखनऊ और श्रावस्ती महोत्सव, सहित तमाम महत्वपूर्ण मंचों पर युवा लोक कलाकारों की लयबद्ध प्रस्तुतियों से लोकसंस्कृति के संवर्द्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । यह संस्था `लोकरंग 2011´ में फरुवाही नृत्य प्रस्तुत करेगी ।

पश्चिम बंग गण सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता-इस वर्ष लोकरंग समारोह में बाउल गान की प्रस्तुति, इस विधा के अन्तरराष्ट्रीय हस्ती प्रो0 शक्तिनाथ झा के निर्देशन में नौ सदस्यी टीम द्वारा की जायेगी जिनके नाम हैं-सौमेन बिस्वास, दिलीप दास, लालू फकीर और दो महिला गायिकायें । इनके साथ पार्थ घोष (श्री खोल और तबला वादक), सिकन्दर (बांसुरी वादक) और ललित (दतूरा वादक ) होंगे ।
बाउल के बारे में-बंगाल में अनेक लोकधर्मों और धार्मिक मतों की परंपरा है । इन में जो बात समान है वह यह कि ये वेद को अन्तिम प्रमाण नहीं मानते और इसलिए ये सभी मत ब्राह्मणवाद के सख्त विरोधी हैं । ये सभी मत इस अर्थ में भौतिकवादी हैं कि इनमें परलोक की कोई संकल्पना नहीं मिलती और वे ज्ञान के लिए अनुमान पर आश्रित नहीं हैं । ये सभी मत गुरुमुख से चलते हैं । ये शरीर की अराधना करते हैं । इनकी अराधना का सीधा सच्चा रास्ता है गीत गाना । इन गीतों और उनमें अन्तर्निहित दर्शन के विशेषज्ञ महाजन कहे जाते हैं । महाजनों की दुनिया में लालन फकीर उन महान लोगों में से एक हैं । इन गीत-रचनाओं में रूपकों का प्रचुर प्रयोग मिलता है । जो गीत बाहर से आध्यत्मिक प्रतीत होते हैं यदि उनके अन्दर प्रवेश किया जाये तो समझ में आता है कि वे सामाजिक अन्याय के खिलाफ हैं । बाउल सदैव जातिवाद और धर्म की अवधारणाओं के खिलाफ लड़ते हैं । एक पंक्ति में यदि हम इन्हें परिभाषित करें तो इनमें धर्मरहित आध्यात्मिकता है ।

प्रथम सत्र
26 अप्रैल 2011

रात्रि 9                        `लोकरंग-2´ पुस्तक का लोकार्पण /कार्यक्रम का अनौपचारिक उद्घाटन ।
रात्रि 9.35 से 9.45       कुमारी मीरा कुशवाहा, मीना कुशवाहा, पुष्पा कुशवाहा, संस्कृति गुप्ता और
                                    भारतीय गुप्ता द्वारा सोहर और कजरी गायन ।
रात्रि 9.50 से 10.20     हिरावल द्वारा जनगीतों की प्रस्तुति ।
रात्रि 10.25 से 10.45   पोखर भिण्डा मटिहिनिया, जौरा बाजार के चिन्तामणि प्रजापति, बब्बन
                                    प्रसाद, लाल बिहारी प्रसाद, कैलाश प्रसाद, श्रीराम उपाध्याय द्वारा
                                    खजड़ी वादन एवं निर्गुन गायन ।
रात्रि 10.50 से 11.20  पश्चिम बंग गण सांस्कृतिक परिषद द्वारा बाउल नृत्य ।
रात्रि 11.25 से 12.55  निर्माण कला मंच की नाट्य प्रस्तुति : नाटक-बिदेशिया ।
रात्रि 1 से 1.20            अंटू तिवारी का गा
यन ।


द्वितीय सत्र
27 अप्रैल 2011
प्रात: 11 से अपराह्न 2 बजे तक वैचारिक गोष्ठी

विषय-लोक संस्कृतियों में मिथ की प्रासंगिकता
आयोजन के मुख्य अतिथि, प्रमुख आलोचक एवं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के भूतपूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, प्रो0मैनेजर पाण्डेय सत्र की अध्यक्षता करेंगे और डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव (भूतपूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय,खैरागढ़, छत्तीसगढ़), शंभु गुप्त(वरिष्ट आलोचक), डॉ गोरे लाल चन्देल(भूतपूर्व प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय,खैरागढ़, छत्तीसगढ़), डॉ0 प्रफुल्ल कुमार सिंह`मौन´ (वैशाली) विशिष्ट अतिथि होंगे ।
सहभागिता
दिनेश कुशवाह (रीडर, हिन्दी विभाग, रीवा विश्वविद्यालय), हृषिकेश सुलभ (वरिष्ठ साहित्यकार एवं रंगकर्मी), शंभु गुप्त (वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक),   बजरंग बिहारी तिवारी, चन्द्रेश्वर (वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक), मदनमोहन, नवीन जोशी (संपादक-दैनिक हिन्दुस्तान, लखनऊ), अनिल सिन्हा, शिवमूर्ति (लखनऊ), देवेन्द्र (लखीमपुर खीरी), (सभी वरिष्ठ हिन्दी कथाकार ), हरिनारायण (संपादक-कथादेश, दिल्ली), प्रणय कृष्ण (महासचिव जन संस्कृति मंच, प्रवक्ता हिन्दी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय), राजेन्द्र राव (साहित्य संपादक, दैनिक जागरण, कानपुर), राजेश कुमार (प्रसिद्ध रंगकर्मी, लखनऊ), डॉ0 तैयब हुसैन (पटना), मनोज सिंह, अशोक चौधरी(पत्रकार), अश्विनी कुमार आलोक(संपादक-सुरसरि), वी0के0सौनकिया, शिवपूजन त्रिपाठी, प्रियदर्शन मालवीय (साहित्यकार), कौशल किशोर (संयोजक-जसम, लखनऊ) एवं सभी आमन्त्रित रंगकर्मी और जनपद के अन्य साहित्यकार ।
 

तृतीय और अन्तिम सत्र
27 अप्रैल, 2011


रात्रि 9.15 से 9.35      हिरावल द्वारा भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति ।
रात्रि 9.40 से 10.10    चन्द्रभान सिंह यादव और उनके साथियों का आल्हा गायन (महोबा शैली) 
रात्रि 10.15 से 10.45  अवधी लोक समूह, फैजाबाद द्वारा फरुवाही लोकनृत्य । कलाकार-शीतला 
                                    प्रसाद वर्मा (मुखिया/निर्देशन), मुकेश कुमार, सतीश कुमार, अजय कुमार, 
                                    महेश कुमार (प्रथम), पुष्पेन्द्र कुमार, सुजीत कुमार, शिवदीप मौर्य, विजय 
                                    यादव, आकाश कुमार, राजेश कुमार, जान्हवी, शालिनी, महेश कुमार (द्वितीय) 
                                    (सभी मंचीय कलाकार), दृग्पाल (नक्कार वादक), राजू रंगीला (हारमोनियम 
                                    वादक), विनोद कुमार (बांसुरी वादक), प्रमोद यादव (गायक), दिलीप 
                                     शर्मा (नाल/ढोलक वादक)।
रात्रि 10.50 से 11.10  बुन्देली कछवाहा समाज द्वारा अवधूती शब्दों का गायन (गायक-देवी दयाल 
                                    कुशवाहा, फूल सिंह, प्रताप सिंह, रामकरन कुशवाहा, बच्चा कुशवाहा, 
                                     रामरती कुशवाहा, रीता कुशवाहा और शिवदयाल कुशवाहा । टीम 
                                    नेतृत्व-डॉ0रामभजन सिंह, कोरियोग्राफर-जयदेवी ।
रात्रि 11.15 से 11.35  पश्चिम बंग गण सांस्कृतिक परिषद की प्रस्तुति 
रात्रि 11.40 से 1.10    निर्माण कला मंच की नाट्य प्रस्तुति : नाटक- हरसिंगार ।
रात्रि 1.15 से 1.35      मंगल मास्टर द्वारा भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति ।
रात्रि 1.35 बजे             लोकरंग 2011 का समापन हिरावल के समूहगान से । 
                                     स्मृति चिन्हों का वितरण / लोकरंग सांस्कृतिक समिति के सदस्यों का 
                                     परिचय/ग्रुप फोटोग्राफी ।

सांस्कृतिक कार्यक्रम संचालन-दिनेश कुशवाह, विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, रीवा विश्वविद्यालय,रीवा, म0प्र0 । गोष्ठी संचालन-कौशल किशोर, संयोजक, जन संस्कृति मंच, लखनऊ
आयोजक 
लोकरंग सांस्कृतिक समिति
संपर्क:- 9415582577 9984690938 

• प्रवेश नि:शुल्क है और यह सबके लिए आमन्त्रण है । हम औपचारिक बुलावे में विश्वास नहीं रखते । यह विवरणिका (फोल्डर) मात्र कार्यक्रमों की जानकारी के लिए है ।
• आप लोकरंग से जुडते हैं या सहयोग देते हैं तो हमें बल मिलेगा । नि:संकोच संपर्क करें । 
• लोकरंग परिवार- सुभाष चन्द्र कुशवाहा, आशा कुशवाहा, सुरेन्द्र शर्मा, विष्णुदेवराय, भुवनेश्वर राय, श्रीनरेश राय, रामकृष्ण कुशवाहा, राजदेव कुशवाहा, रामभरोसे कुशवाहा, हदीश अंसारी, इसरायल अंसारी, संजय कुशवाहा, मंजूर अली, बुनेली यादव, हरिनंदन, सुधीर कुशवाहा, अच्छे लाल । 
• क्षेत्र के गणमान्य व्यक्ति जो लोकरंग परिवार से जुड़े हैं-मनोज सिंह(वरिष्ठ पत्रकार, गोरखपुर), शैलेन्द्र दत्त शुक्ल (प्रधानाचार्य, हनुमान इंटर कालेज, पडरौना), बच्चा पांडेय (पत्रकार, पुरैना कटया), अमजद अली और कलीम खां (कप्तानगंज), अजय शाही (बनबीरा) ।

सूचना:-
सुभाष चन्द्र कुशवाहा  

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