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कवितायन:-माणिक,चित्तौडगढ,राजथान

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शुक्रवार, जनवरी 28, 2011 | शुक्रवार, जनवरी 28, 2011



माणिक 











वो शनि महाराज के बन्दे
अतीत में जाते रास्तों वाली
एक ही फिल्म जो 
दिखाती है वर्तमान का उघड़ा हुआ सच 
आती आँखों के समक्ष बारम्बार
मन दहलाती सुबहें शनिवार की 
जों आते शनिमहाराज का तेल माँगने
बच्चे भारत देश के
दया धरम के ज़िंदा होने की साप्ताहिक पुष्टी के साथ 
या कि जताने 
कौन कहता है कि 
हट्टे-कट्टों को भीख नहीं मिलती

हाँ बचपन में पिताजी के कहे पर
तेल देते रहे हम भी अतीत में
वो लाल तिलकधारी बाबा
पंचांग कांख दबाए आता था
रटी हुई कुछ भविष्यवाणियाँ
चिपकाए जुबां पर
आदमी दिखा कि उलट-पलट सूना देता
याद है इन छंटे हुए बन्दों में बंटे हुए गाँव
माँ,पिताजी,बहन और बड़ भैया सब मिलकर
मौहल्ले नापते थे देहरियाँ गिनते एकएक 

अब सब दारोमदार बच्चों पर है
बच्चे जो जल्दी में रहते हैं 
लाल टीका भूल से लगाते नहीं अक्षर
पंचांग कांख दबाने की कहाँ फुरसत उन्हें 
गिनती की गालियाँ रखी है होंठों के ठीक पास
जो दानपुण्य के बदले काम आती कभी

शनिवार की भोर मतलब
देहरी पर एकदम काली शक्लें 
कहती है बातों में मुझे यूं कई बार कि 
सवेरे जल्दी निकलने की सोचकर
शुक्र की रात से ही बैठा रखे थे शनिमहाराज
कड़ेदार टोकरे में पाड़े पर
नसेड़ी पिताजी और जुआरी माँ
के खातिर बचपन हवन है जनाब
जी कहता है उनका कि
आएगा कभी तो कोई शनिवार
जो मुक्ती मिलेगी घर के शनिदेवों से

अतीत में शनि महाराज से भय था जिनको
अब भय पंगु होते बच्चों की बदहाली से
जो मंगल,गुरु,शुक्र और सोम को 
चले आते हैं आस बाँध 
बदले हुए चौले में अधखुला दर्द छिपाते
अपनी घुमक्कड़ी के आगे
शत प्रतिशत नामांकन की बात जोहते
स्कूल के हथकंडों को ठेंगा दिखाते
वे बच्चे मिल जाएंगे यहीं कहीं 

विकास के सफ़ेद आंकड़ों पर
बारबार कोलतार से गरीबी गोदते हुए
जान पड़ते हैं किसी मौड़ पर
मिले पहचान के आदमी-से
बालश्रम पर की हुई हज़ारों घोष्ठियों के निष्कर्ष
को मटियामेट करते 
जहां हवा हो जाती है सभागारों की जुगाली
एक 

फुदकती गिलहरियों को हथियाने
की लगातार और बेकार कोशिशें
दुस्साहसों को ठेंगा दिखाती सफलताएं
अतीत ही हो सकती थी

कि भोर होते ही बिस्तर छोड़
बचपन में बच्चें चल पड़ते थे
हाल मौहल्ले में ब्याही कुतिया को
लापसी खिलाने
पिल्लों के पास जा डटते थे
बिना दांत मांझे,मूंह धोए
वो प्यार दुलार और गुत्थम-गुत्थी
सबकुछ बीती बातें हैं कहने को
उभरा दर्द पुराना 
जो पलटे पन्नें अतीत के 

भांत-भांत के खेल-खिलौनों से उबकते
आँगन में मांडने-सा बचपन फबता था
मीठा नीम,तुलसी और बारहमासी
सबकी छाया के सहारे अपना घर
बैल की माफिक छत चढ़ता था 
काम चलता था आस-पड़ौस का
आपसदारी के आंकड़ों से
जो आसमान छूते थे तब
सीना फुलाए घूमता था आपसी लेनदेन  
बिना लाभ का पूरा और पक्का 
घर-घर आवन-जावन था
अब बंद हुआ सब कुछ अतीत के बोरे में 

अनकही प्रेमपातियां पड़ी रह जाती थी
यदाकदा छप जाती कुछ भावों सहित
उतर आती कागज़ पर
कि फिर 
पेड़ में अटकी पतंग-सी देर तलक 
पकती थी जेबों में पातियाँ  
डाकवाले लाल डिब्बे तक जाते हाथ
कांपते-धूजते लौटते फिर घर को
बचा न ऐसा कुछ भी अब तो
खाली खाते मिले वर्तमान की बही में 

आज फिर भींत से उतरते लेवड़ों की मानिंद
परतें अतीत की खुलती जाती
जो थथेड़  दी थी हमने भूतकाल की दिवार पर
ख़ास यादें दिखती उपलों-सी उभरी
थोड़ी ऊंची मुंडेर के कौने में कुछ ऊपर

दिल करता है लौट जाएं फिर
उसी फुरसत में कि
जहां बने,रचे और सजे अतीत के पन्ने 
फड़फड़ाते हैं आज फिर

दो 

कभी सरपट सड़क पर फटफट दौड़ती कारों सी
धारदार बहती थी नदी मेरे शहर की
कभी मारे खुशी के वो बावरी
पूल तक जा थप्पी दे आती थी
किलकाराते बच्चों की मानिंद
उठती थी लहरें पंक्तिवार
सबकुछ कल की बात हुआ
कि
बेचिंता थे जलचर सारे
मछलियाँ डोलती फिरती थी बेचिंता
किनारों को चूमती हिलोरें
उठती-गिरती बारम्बार
ऐसा देखने आ उमड़ता शहर पूरा
आनन पर तेज छप जाता था
नदी इतराती थी उस दिन भरसक
जिस भोर
किले वाली पहाडी की ओट से सूरज झांकता था
जान पड़ता था मानो 
उठते घूंघट के हौलेपन-सा दीदार
धुलती हुई लगती
वक्त की जेबों में 
भर देता खुशियाँ
नदी और सूरज के मिलन से उपजी ताका-झांकी 
नूर बरसाती थी उस दौर में
याद है कुछ थोड़ा सा बस 
हाँ बचीकुची स्मृति के पल्ले से कहता हूँ
कि 
तलहटी के घरों में बसे 
तसल्ली और धीरज जैसे सादे लोग
घरबार छोड़छाड़ जाने कहाँ चले गए
हाँ उनकी आँखों में तैरता था
सूरज का अनुशासन और नदी की चपलता
बसता था कहीं उनके जीवन में ही
कम बदलावभरी आदतों का शहर
लिख दिया है सबकुछ अच्छा-अच्छा
हमने अतीत के पन्नों में 
फिसल गई है सारी राहें सुगम
यूं ही पर अब तो लगता है 
हाथों से वर्तमान भी रिपसता है मेरे

तीन

घारे,बांस-बल्लियों से 
बनते थे मकान अतीत में 
थे अपनेपन से लथपथ पूरे
हाँ भुला नहीं हूँ मैं आज भी
अरसे पहले अलमारी में रखी डायरी
जो समेटती ज़रूरी तारीखें और अपनों के पते
एकाएक दिखी एडियों के बल उठती
अतीत के पन्नों से झांकती हुई
वर्तमान से उपजी उब
उकसाती है आज दिल को
कुछ देर की फुरसत पाकर
पन्ने अतीत के पलट लूं आज
जी कहता है कि
किसी पडत कविता को गुनगुनाऊँ कुछ देर
जहां छपे,लिखे और बने दिखे
संकड़ी गलियों में सटे हुए मकानों के
वो चौड़े दिल इंसान
धुंधलाती शक्लें ओढ़े
दीगर बात एक और कि
एक पेड़ केंसुले का दहकता था
महकते गुलमोहर से होड़ा-होड़ी में
अड़ा रहा बरसों
खेतों को जाते रास्ते
रामा भूरा के कुए वाले मुड़ाव पर
कहाँ फंस गया वो असल आनंद
अनूठा आभास रह गया कहाँ पिछे
जिसके नाम की हिचकियाँ भी नहीं रही बाकी
अटकी-भटकी कहाँ गले में राम जाने
कि
लकदक जिससे हम फुदकते थे
नापते नंगे पाँव पगडंडियाँ गांवों की
उछलती और उफनती हुई-सी आवारा आवाजें
हमारी ही हुआ करती थी
बेहिसाब और आवारा किस्म की
और झोड़-बाकी के गणित से बिल्कुल परे
स्नेह से लबरेज़
दे जाती थी कई अचरज एक साथ
कि
लोटपोट अतीत गुदगुदाता है
अतीत के पन्नों से आज भी 
जो करीब लगता आज भी मन के
गूंथा करता था पल-पल की यादें
बुना करता था सच के रिश्ते
बातों की आड़ी-तिरछी  चलती सलाइयों से
कभी पाठशाला की फाटक के पास
तो कभी जा बैठता था खेत की मेड़ पर
यूं उकेरता था बैले
कभी कनेर के फूल
बनकर कुशल चितेरा
मन के सपाट कागज़ पर
जीवन की महक दबा कर रखता था
अपनी सुघड़ मुठ्ठियों में
लुटा देता था सारा आनंद मेरे हित
एकटक देखता था किसी एकमात्र अपने की मानिंद
मुंडेर पर कुहनी टिकाए देर तलक
मेरे घर-आँगन से गली के छोर तक
सबकुछ उसकी नज़र की मिलकियत में था
याद है आज भी कि
पसंद थे उसे स्कूली युनिफोर्म में मिले
लाल रिब्बन से गूंथे फुग्गे
जो मेरी दोनों चोटियों पर फबते-इतराते थे
बीता बचपन,दिन बीते अब सारे
बीत गया वो झांकने-ताकने का दौर
अपलक आँखें लिए ढूंढता है वर्तमान
फिर भी एक आस थामे
कि पलटता है आज फिर अतीत के पन्ने बारी-बारी

रक्खा है बड़े दिल से 
दुकानों में लाभ का सामान
मिलता है,बिकता है,दिखता है
ठीक सामने छपता है मोटे अक्षरों में 
ज्यादा लाभ देता हुआ आइटम
सबसे आगे जगह पाता है जुगाड़ू आदमी
कला,संस्कृति यहाँ आकर रूप धरती है
झंझट-झमेला और फुरसतदारी के 
ये पक्के सौदों का दौर हैं
यहाँ घाटे का नही काम 
नैन बावरे हुए कि नज़र धुंधला गई  
हर तरफ दुकानें नज़र आती है

नियम,क़ानून-कायदे छत पर रक्खे हैं 
सूख जाने,तड़पने को धूप में 
रिश्तेदारी,जात-समाज,बिरादरी का अपनापन
कीमत सबकी तय हो गई है 
घर बाहर पाँव धरो तो संभलना भाई
भावों की मंडी में बिक जाएंगे भाव
कोई न लगा दे निलाम बोली राह चलते  
जितना बचाके रखा मान सम्मान

सब बिक जाएगा,चिंता रखो न कुछ भी  

यूं कूदा-फांदी करता है
मौल भाव सामने आकर 
चिढ़ाता है मन बसे मानव मूल्यों को
भड़काता है,उकसाता है
चरित्र की दीवार कूदने को देता सतत प्रेरण 
ये आज का दौर
शाश्वत गारंटीनुमा चिजें पिछे धकेलता
ये तुरत-फुरत का आदमी

बैठा गलतफहमी के पेड़ तले
मैं अब तक रहा अनजान 
बिकने लगे हैं बरगद तक
हम बबूल की क्या बिसात
हिलते,डुलते आदमी तक बिक गए 
टूट गए,सब हो लिए साथी
जिधर चला ज़माना दूकानदारी का  

अब भी आस बाकी है मन में
शायद जाग पड़े चेतना
मिले असल का ज्ञान 
खुद से बाहर झांके जल्दी 
अबतक सोया सुस्त अवाम 
कराहती है देश की हालत
मल्हमपट्टी को चले आओ
कि दुकानदारी अब यौवन पर है
मदन-मोहम्मद,घासी-गीता
इसी भांत के कुछ मज़दूर
विक्रम-बेताल से कन्धों पर बैठ
चढ़े-उतारे गीली रस्सी,बांस अनेक   
लटके घंटों लक्कड़छाप मचानों पर
साँसें लटकी अधरझूल में भटकी 
नानू-हीरा,मगना-मोती रहे रेत में घंटों
पहाड़ से बुढ़ापे के हाँपते पड़ाव ओढ़े 
देखे कई मज़ूर मज़बूरी के जाए
जुटे रहे सतत,दिन चढ़ा परवान
कोंपलें फूटी अब जाकर
नज़रों में आया दिवारों में उगा हुआ 
कहीं गुम्बदों पर छाया जिर्णोद्धार
यात्रा बेहद लम्बी है
बनने,बिगड़ने और सुधरने की
फुरसत में खुलेंगे राज़ कभी  
यूं ही नहीं चढ़ा नया रंग पुराने पर
जीवनसंकट उपजा भारी
चूल्हे का हाहाकार मचा
कि आते ही भर गया मस्टररोल
आए मज़ूर जब पूरब के गांवों से 
कि बल्लियों पर लटके युवा कई तीस के 
साठ-पैंसठ के धूजते कारीगरी हाथों से
छैनी हथोड़ें उछले-टकराए कई बार
चटका न एक पत्थर
सींच-खोदकर कोई धंसा धरती में
तब उमड़ा,कुछ उपर उठा 
आँगन बना बगीचा
वो शरीरहिलाऊ फ़िल्मी गीत
थकनमिटाते ,बनते दिनभर सहचर
मिलेजुले के उसी आलम से 
चमके महल-चौबारे
कुछ जंगल कुछ आँगन
क्यूं अब तक छूटे बाकी 
काट-छाँट की इस कतरन से
फिर भी निकला है जिर्णोद्धार
इधर तीन-चार की एक टोली 
केमिकल से धोती दीवार दिनभर
चुटकी में थूंक आई पान-तम्बाकू जहां 
संस्कारित समाज की युवा पीढ़ी
दूजी बन्दर जात तोड़ गई
कई महलों के पुराने छज्जे जिनकी
टुकड़ों में होती मल्हम-पट्टी लगती है 
रिपसपट्टी से फटी पेंट पर
लगे ठेगरों की मानिंद
देती बचपन की सपाट या सटीक परिभाषा
यहीं नज़ारा एक अनोखा
 जेक-चेक से मिले नौकरी
मेहनत रोती कौने में 
 चयनित मंदिर चमक उठे
यूं आपस की रिश्तेदारी से
कुछ मिनारें उपर उठ गई
कुछ के छज्जे बदल गए
बेचारे,कुछ बेबाप के से पतले गुम्बद
इस बारी भी खड़े रहे कतारों में
यहाँ न लगती बी.पी.एल.की पृथक पंक्ति
न मिलता राशन पंक्ति से माहवार
बस जितना हुआ,उतना हुआ 
बाकी अगले मस्टररोल की बाट
कितनी पीड़ा,कितनी मुश्किल
यहीं-कहीं भोर और दोपहरी के बीच
टिफिन तड़फता है लगातार
तब पनपता है जिर्णोद्धार
घड़ीभर सुस्ती,एक बाज़ी तास-पत्ती
और तीन पत्थरों पर
अलुमिनियम की तपीली में उफनती चाय
यही आराम बक्शा हमने उनकों 
जो उकेरते रहे अपनी उम्र पत्थरों पर
और ठेलते रहे अहसानों के थैले सिर पर
हमारी कथित पहचान के हित

पौ फटने से शाम ढलने तक
चलते रहे औरों की खातिर
निज घर भूले मज़दूर
रात भी खाली गई नहीं
कई तरह के सपने देखे
सीमेंट-चुने में मिला-मिलाकर 
लुटा दिया सब अपना प्यार 
जिनको समझा हमने केवल
मस्टररोल की हाज़री
वो हरपल बुनते मिले जिर्णोद्धार
भले कहानी लम्बी थी
पर वो कहने को आतुर था 
और मैं सुनने को बेताब
एक सुबह की संगत थी जब
वो कहता रहा देर तलक
 और मैं सुनता रहा घंटों
कि
बड़े मान से सूरज उगता था
पूरब का अपना रूतबा था
पहली दस्तक देता शहनाई का सुर
फिर कहीं पुरबिए गाए जाते थे
उसी लाडले पूरब से
अवशिष्ट स्मृतियों की बयार 
आज भी आती-जाती है  
छिटपुट गाँव कुछ फ़ैल गए आकार में 
खेतों की जोत सिमट गई
यहीं बसे हैं कुछ दोस्त मेरे बचपन के
कन्धों पर थामे प्रेमभाव की गठरी
आज भी चढ़ते हैं उसी दिशा से
जहां ईठलाता था आमुख किले का
तना रहता था साभिमान
 जाता रहा वो भी इतिहास के हिस्से
अपने खंडित साथी दरवाजों सहित  
केवल बची है सूरजपोल
पगडंडियों को पूछे कौन
जहां न आती लालबत्तीधारी कारें
यहाँ मिलेंगे आते-जाते खाली
कुछ अन्त्योदय परिवार 
या भूख के मारे ढोर-ढंगर
   मिमियाती बकरियों के बीच प्लास्टिक बिनते 
पाठशाला के अनामांकित-नामांकित बच्चे
हाँ राह बने एक मंदिर में 
लगती है आज भी यहाँ चौकी
भोपाजी,दो हज़ूरिए और कुछ भक्तगण 

यही बचा इस आँगन में 

दर्द कहूं क्या इससे ज्य़ादा  
हाँ पथरीला हूँ मैं, कहने को
मैंने भी दिन देखे हैं

यूंही नहीं ढला मैं
इतिहासी टकसाल के सांचे में  
इन दिनों जब भी देखा पूरब 
हलधर की खेतीबाड़ी में जूते हुए मज़दूर मिले 
 घुटनों तक पानी में फसल सिंचती अबलाएं
और देखी बाजू में 
ज़मीं में धंस रही खानों से पड़ी
गरीब के घर दरारें
कहने को पूरब रह गया बस
बाकी तो सूरज डूबा ही
गीली यादों के पन्ने पलटो तो सही
आज भी लिखा मिलेगा कि
बड़े मान से सूरज उगता था
पूरब का अपना रूतबा था
महंगाई के ग्राफ में उलझा
ये कमरा नहीं किराए का
यूं ही बिखरी पड़ी रहती है 
पुस्तों की मेहनत खुले में 
आते ही नहीं कोई जौहरी इधर
नासमझ को यहाँ बुलाएं क्या
विलग भाव सनी इमारतें ईठलाती है
अकेले एकदम अकेले,मन ही मन
अनूठा रंग लिए आमुख पर हर बार
मिल जाती है किले में आते जाते
आसपास के सब गूंगे-बहरे
किससे कहे और सुनाएं क्या
जुदा है दुनिया इनकी
गली के नुक्कड़ वाले घर से 
 यहाँ झाडू रोज़ नहीं लगती
न आती है पोछेवाली बाई
न मकान मालिक बड़बड़ाता है
सन्डे वाले सनातन श्लोक
दुःख: फिर भी अपार है इनका 
थोड़े में अब जताएं क्या
कौने-कौने धूल पसरती यहाँ
आँगन बसा है विराना
बच्चों की चिल्ल-पों और दौड़-झपट का
यहाँ न भरता आनंद-मेला
न आते ब्याज के मनके गिनते सेठ इधर 
दूधवाला देता न आवाज़ कभी भर्राकर 
फैंकता न कोई हॉकर अखबार
निशानेबाज़ के माफिक खंडहरों में
सब कुछ तो झोड़ दिया है
अब और हम घटाएं क्या
बिल के माने सांप-चूहों के घर है यहाँ
न बिज़ली,न नल,न केबल तार का झंझट
थोथे चने की मानिंद छनछनाते नहीं
ये महल,रास्ते और दिवारें किले की
जैसा सबकुछ देखा हमने बस्ती में
उलट भांत के रंगों वाली
इस बस्ती की न्यारी बात
बात नफे की एक रही इनके हिस्से
दुःख में हँसने वाले
स्थाई पड़ौसीजात का आदमी
मिला न एक किले में
न दफ्तरी चापलूस बसते यहाँ
जो बेवज़ह हामी भरते हरपल
मौसमी दूकान की तरह बदल जाते हैं
बस्ती में जहां मकान अपने
वैसा आलम यहाँ नहीं
सबकी एक ही ठोर
यूं सबकुछ तो लुटा दिया है
अब और हम छुपाएँ क्या
जो भी मिला सड़क पर 
बाएँ बना हुआ या दाएं खड़ा हुआ
था पूरा का पूरा पथरीला
निपट पुरातन ही पुरातन
नया न कोई ठोर
मेरी आँखों को लगता था
बेईमान अट्टालिकाओं से फकत ऊंचा
किले का स्वाभिमान
यूं शब्दों ने सबकुछ उगल दिया है
अब और हम छुपाएं क्या



झंडा रख दिया है गुरूजी ने पेटी में
 फिर छ: माह के लिए
और बच्चों ने मेल उतारने का पत्थर टांड पर
अगली छ: माही की बाट में 
जब दूसरा झंडा उत्सव आएगा
जिसके एक दिन पहले 
मिलेगी छुट्टी नहाने की
एकलौती स्कूल पौशाक 
धोने-झकोलने के हित
ठिठुरते हाथों की तालियों के बीच 
फिर फहरेगा तिरंगा
अगली छ: माही पर
नाचते कूदते शर्म पिगलेगी
धीरे धीरे नौनिहाल बच्चों की
शहीदों को याद करते हुए
भूल जाएंगे
देश के हालातों से उपजे पेट के मरोड़ों सा दर्द
आदत पनपती है भावी नागरिकों में
यहीं से कुम्भकरणी नींद की
घंटेभर का देशगान
बाकी अटरम-शटरम
 झंडे के बहाने स्कूली उत्सव का व्यायाम
और गरीबी में बमुश्किल ख़रीदे जुत्ते-मौजे
बहुत याद आएँगे
एक  लड्डू और बावन सेकण्ड का राष्ट्रगान
कुछ कुदाफान्दी 
बस हो गया झंडा
परिभाषाएं ऐसी 
फिर दोहराएंगे गुरूजी
छ: माही के बाद
पद्म सम्मानों से भी भारी
रहेगा वो दांत मांझने का ब्रश
कविता करने के बदले मिला जो ईनाम में

सर्द हवा में भी
बस्ती वाले बच्चों के गलों से
निकले रटेरटाए नारों पर टिकी

बस्ती में घूमती झंडा रैली
निस्वार्थ और बिना लागलपेट सने भावों वाली 
फिर निकलेगी
मगर छ: माही के बाद

लोग रैली देख

अचानक बतियाएंगे एकदूजे से
शायद आज झंडा है 
कितना विलग हैं ये झंडा दिवस

कभी बेचारगी के हवाले पड़ा कौने में

लगा कभी 
आधे दिन की छुट्टी
का आनंद देता त्यौंहार भी
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